हमें अपनों से क्यूँँ लड़वा रहे हैं
सियासत बीच में क्यूँ ला रहे हैं
मसाइल और भी हैं शहर में पर
गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं
हमारी नींद कब की उड़ गई है
तुम्हारे दिन भी अच्छे आ रहे हैं
ख़मोशी इस लिए भी बढ़ रही है
ज़बाँ वाले तो मारे जा रहे हैं
हमारे आशियाने तोड़ कर वो
फ़रिश्तों के मकाँ बनवा रहे हैं
बनाई चाय ऐसी मीडिया ने
कमल के स्वाद जिस में आ रहे हैं
ग़रीबी को मिटाने वाले थे जो
ग़रीबों को मिटाते जा रहे हैं
नज़र आते जहाँ से काम काले
वहाँ पर्दे हरे लगवा रहे हैं
नई नस्लों को मज़हब में फँसा कर
क़लम से दूर करते जा रहे हैं
किसानी ख़ुद-कुशी कर लेगी इक दिन
किसानों पे वो दिन भी ला रहे हैं
— Kartik Bhalerao















