ख़ुद को आज़माने में रूह को जलाने में
तुझ को याद करने में तुझ को भूल जाने में
दर्द को बढ़ाने में मुझ को यूँॅं सताने में
ज़िक्र तेरा काफ़ी है दिल को यूँॅं दुखाने में
इक क़दम ही काफ़ी था इक क़दम ही काफ़ी है
फ़ासला मिटाने में राबता बढ़ाने में
रंज-ओ-ग़म के पर्वत हैं रास्तों में काटे भी
कोई आएगा कैसे इस ग़रीब-ख़ाने में
साँस लेने की फ़ुर्सत तक नहीं मिली हम को
इस क़दर गुज़ारी है ज़िंदगी कमाने में
ईंट पत्थरों से तो बस मकान बनते हैं
'उम्रें बीत जाती हैं घर को घर बनाने में
आप का कमाल-ए-फ़न देखा तो हुई हैरत
आग को लगाने में आग को बुझाने में
— Kartik Bhalerao















