छत किसी का तो किसी का आसमाँ होने के बा'द
आइने में देखता हूँ मेहरबाँ होने के बा'द
सारी दुनिया में लुटाता हूँ मुहब्बत अपनी और
ढूँढ़ता फिरता हूँ ख़ुद को राएगाँ होने के बा'द
हम को बहनों की सदा माँ की दुआ भी है अज़ीज़
घर में मातम क्यूँ मनाएँ बेटियाँ होने के बा'द
मेरा दुख तो तेरे दुख से भी ज़ियादा है रक़ीब
मैं ने तो औलाद खोई है जवाँ होने के बा'द
बस मुझे इक ही गिला रह जाएगा आख़िर में यार
चैन से सोया नहीं मैं आशियाँ होने के बा'द
बस यही कह कर निकल आया हूँ तन्हा घर से मैं
लौट कर आऊँगा इक दिन कारवाँ होने के बा'द
— Kartik Bhalerao















