है हमारा दिल भी तुम्हारा घर यहाँ जैसे चाहो रहा करो
कभी ज़ख़्म दे के सताओ तुम कभी दर्द-ए-दिल की दवा करो
कभी दिल-लगी न ये ख़त्म हो न ही गुफ़्तुगू का ये सिलसिला
कभी दिल की बात सुनाओ तुम कभी हाल-ए-दिल भी सुना करो
ये जो चाहतों के ख़िलाफ़ हैं ये ही आशिक़ों पे अज़ाब हैं
कोई ज़हर इन का उतार दो कोई अक़्ल इन को अता करो
कई राज़ दिल में दबाए हो कई बोझ दिल पे उठाए हो
कहीं बन न जाओ मरीज़-ए-दिल ज़रा दोस्तों से मिला करो
— Kartik Bhalerao















