चाहा था जो भी मैं ने वो अक्सर नहीं हुआ
इक शख़्स था जो मेरा मुक़द्दर नहीं हुआ
यारो हक़ीक़तन तो बहुत दूर की है बात
वो ख़्वाब में भी मुझ को मुयस्सर नहीं हुआ
करना पड़ा मुझे भी तो इस दिल का एहतिराम
धोके हज़ार खा के जो पत्थर नहीं हुआ
इक उम्र तीरगी को हटाने में लग गई
दो दिन की कोशिशों से मुनव्वर नहीं हुआ
— Kartik Bhalerao















