कम से कम दिल पे मिरे रंज न छाया होता

वक़्त-ए-रुख़्सत तू अगर पास न आया होता

ऐ ख़ुदा ठीक ही रहता मैं ज़माने के लिए
तू ने गर दिल को मिरे दिल न बनाया होता

दश्त में अब जो अकेला हूँ तो रो पड़ता हूँ
काश मैं ने ही मिरा साथ निभाया होता

कोई मुश्किल तो न थी डूब के मर जाने में
बस मिरी राह में तैराक न आया होता

तू अगर साथ न होता तो भला क्या होता
बस यही होता मिरा वक़्त न ज़ाया' होता

— Aqib khan

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