jo hoti thii kabhi taqat hamaari | जो होती थी कभी ताक़त हमारी

  - Aqib khan

जो होती थी कभी ताक़त हमारी
उसे अब खा चुकी फ़ितरत हमारी

कि दरिया पार करके डूब जाना
है ऐसे साथ कुछ क़िस्मत हमारी

बिना माँगे जो तुमको मिल गए हैं
तुम्हें है क्या पता क़ीमत हमारी

हमारा फूल जब उसने कुबूला
तभी से आ गई शामत हमारी

वही इक कमरा, तन्हाई, उदासी
यही है अब तो बस दौलत हमारी

सुनो तुम राब्ता मत रक्खो हम सेे
सुनो अच्छी नहीं नीयत हमारी

जहाँ हम सेे ही सारी रौनकें थीं
वाँ ना-मंज़ूर है शिरकत हमारी

न हमको दर्द बतलाओ यूँँ अपना
है कब की मर गई शफ़क़त हमारी

  - Aqib khan

Phool Shayari

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