Vikram Gaur Vairagi

Vikram Gaur Vairagi

@vikram-vairagi

Vikram Gaur Vairagi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Vikram Gaur Vairagi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वरना तो बेवफ़ाई किसे कब मुआ'फ़ है तू मेरी जान है सो तुझे सब मुआ'फ़ है — Vikram Gaur Vairagi
जब भी दीवाना कोई राह भटक जाता है सब से पहले तो मेरा आप पे शक जाता है — Vikram Gaur Vairagi
कुछ रिश्तों में दिल को आज़ादी नइँ होती कुछ कमरों में रौशनदान नहीं होता है — Vikram Gaur Vairagi
मैं अपनी हिजरत का हाल लगभग बता चुका था सभी को और बस तिरे मोहल्ले के सारे लड़के हवा बनाने में लग गए थे — Vikram Gaur Vairagi
हैरान हो के देख रहे हैं मुझे अज़ाब मैं मर रहा हूँ और बहुत इत्मीनान से — Vikram Gaur Vairagi
ज़िंदा रहने के तरीक़े न बताओ मुझ को ज़िंदा रखना है तो फिर आओ बचाओ मुझ को — Vikram Gaur Vairagi
टूटी चीज़ों को बदल देना था बेहतर वरना तू अगर चाहता दोबारा बना लेता हमें — Vikram Gaur Vairagi
इस तरह रोते हैं हम याद तुझे करते हुए जैसे तू होता तो सीने से लगा लेता हमें — Vikram Gaur Vairagi
यूँँ बे-तरतीब ज़ख़्मों ने बताया राज़ क़ातिल का सलीक़े से जो मेरा क़त्ल गर होता तो क्या होता — Vikram Gaur Vairagi
यक़ीन उस ने दोबारा बना लिया लेकिन वो मेरे ज़ेहन से धोखा नहीं निकाल सका — Vikram Gaur Vairagi
वरना तो बे-वफ़ाई किसे कब मुआ'फ़ है तू मेरी जान है तो तुझे सब मुआ'फ़ है — Vikram Gaur Vairagi
मिरे सीने पे सर रक्खा है तो ख़ामोश मत रह मुझे बतला तुझे जो भी सुनाई दे रहा है — Vikram Gaur Vairagi

Ghazal

तेरा बंदा चला गया मालिक ये तो काफ़ी बुरा हुआ मालिक तू ने दुनिया बता के भेजा था मैं जहन्नम में आ गया मालिक तेरे जैसों की होती थी दुनिया मेरे जैसों का कौन था मालिक किन ग़मों में उलझ गया था मैं कह रहा था कि शुक्रिया मालिक सारे नौकर बहुत परेशाँ थे ये ख़बर थी कि मर गया मालिक हाँ ये सच है कि मैं तसव्वुर हूँ इस तसव्वुर का दायरा मालिक तू मेरा दुख नहीं समझता है तू भी इंसान हो गया मालिक मैं ने बस उस के लब ही देखे थे हो गया था बहुत ख़फ़ा मालिक अब तो मैं तेरे काम का हूँ बस मुझ में अब कुछ नहीं बचा मालिक मैं ने वीरान कर लिया ख़ुद को मुझ में आबाद हो गया मालिक एक ही हैं तेरे मेरे ग़म भी एक ही है तेरा मेरा मालिक — Vikram Gaur Vairagi

Nazm

"ज़िंदगी'' ज़िंदगी एक लड़के का मन है जिसे बस अकेले ही बीरां के गुबंद के पीछे बने लॉन में रक़्स करती हुई और बिखरती हुई नीम के पेड़ की पत्तियाँ देखनी हैं ज़िंदगी एक बच्चे की ज़िद है जिसे कोई दुनिया नहीं सिर्फ़ फूलों पे बैठी हुई तितलियाँ देखनी हैं ज़िंदगी एक जोगन के पैरों के पड़ने पे निकली हुई ताल से मात खाता हुआ एक मृदंग है ज़िंदगी ज़िंदगी के नशे में ही डूबे हुए एक मुसव्विर की कूची से छिटका हुआ रंग है ज़िंदगी अपने महबूब को अपनी बाँहों में बे-ख़ौफ़ सोते हुए देखना है और उसे चूमने की ख़्वाहिश का दिल में न आना है ज़िंदगी इक नदी के किनारे पे चुप-चाप बैठे हुए दिन बिताना है ज़िंदगी ज़िंदा रहने का अच्छा बहाना है ज़िंदगी मेरे कमरे के बाहर बनी बाल्कनी में बदलते हुए मौसमों का मज़ा ले रही बिल्लियाँ हैं ज़िंदगी बार बार आईना देख कर ख़ुद पे मरती हुई अपनी तस्वीरें लेती हुई बावली लड़कियाँ हैं ज़िंदगी अपनी मस्ती में डूबी हुई गुनगुनाती हुई लकड़ियाँ बीनने दूर जाती हुई एक पहाड़न के गालों पे बिखरी हुई धूप है ग़ौर से देखने पर पता चलता है ज़िंदगी हर जगह हर दफ़ा अपना ख़ुद का ही बदला हुआ रूप है ये किताबों का दुनिया का लोगों का कोई गणित उस के बिल्कुल भी पल्ले नहीं पड़ रहा ज़िंदगी एक नाराज़ बच्चा है जो मार खाकर भी स्कूल बस में नहीं चढ़ रहा ज़िंदगी मेरा दिल है जो हर इक नए ज़ख़्म पर मुझ सेे बिल्कुल नई शा'इरी चाहता है ज़िंदगी शा'इरी से भी आगे का कुछ है जहाँ लिखने वाला लिखे इस सेे पहले कई रोज़ तक ख़ामुशी चाहता है ज़िंदगी से मैं ज़्यादा मिला तो नहीं पर मुझे इतनी पहचान है ज़िंदगी शाहजादी के झुमके नहीं उस की मुस्कान है ज़िंदगी मेरे सीने में बरसों से फैला बयाबान है ज़िंदगी अपनी सूरत में सब कुछ है लेकिन इस पे अब भी यही एक इल्ज़ाम है ज़िंदगी मौत का दूसरा नाम है ख़ैर अब मैं चलूँ मुझ को तन्हाइयों से बहुत काम है — Vikram Gaur Vairagi
"मैं ने देखा" मैं ने देखा ख़ुश रहने की मुर्दा हवस के मारे हुए कुछ लोग थे जो तस्वीरों की झूठी दुनिया में सच्ची मोहब्बत ढूँढ़ रहे थे उन सेे कहना ऐसे किसी का दिल भरता है ज़ेहन पे कोई फिल्टर काम नहीं करता है मैं ने देखा इस दुनिया में सारे लोग बहुत झूठे हैं और मैं उन सेे ज़्यादा झूठा आख़िर एक दिन सपना टूटा फिर तो जैसे एक एक कर के सब कुछ छूटा मैं ने देखा आग नहाई आँखों के पीछे एक शख़्स का बिखरा दिल था जो फिर धड़केगा या नहीं कहना मुश्किल था मैं ने देखा कैसे हसीं ख़्वाबों की इमारत एक झटके में ढह जाती है मैं ने देखा कैसे किसी की मौत भी बस एक इंस्टाग्राम स्टोरी बनकर रह जाती है नज़्म को सुन कर ये न समझना मैं सब पर अपनी कोई ज़ाती राय बना रहा हूँ मैं फ़नकार हूँ सब कुछ देखता रहता हूँ और जो देखा है जैसा देखा वो मैं तुम को बता रहा हूँ — Vikram Gaur Vairagi
धरती माता आकाश पिता मैं मिट्टी में जन्मा, खेला,पनपा एक देवदार जिस ने खोली बाँहें अपार बाँटा प्रकृति का अमिट प्यार जिस ने मिट्टी ढहते देखी जिस ने बादल फटते देखे जिस ने जंगल की आग सही जिस की कुलमाता नदी रही जिस की छाया में बैठे कितने पथिक कई सैलानी भी कुछ चरवाहे, कुछ लेखक भी, कुछ दीवाने, कुछ ध्यानी भी कुछ पर आता था प्रेम मुझे कुछ पर होती हैरानी भी मैं नित्य सूर्य के ताप को छूने आगे बढ़ता मैं नित्य प्रयासों से कितनी ऊँचाई चढ़ता सर्दी की धूप पड़ी जब जब मेरे स्वर्णिम पत्ते चमके मुझ सेे मिल कर ही रंग खिले हर आने वाले मौसम के निचली घाटी के लोगों तक मेरे कुछ गीत पहुँच पाते पर हवा उड़ा ले जाती थी सब गीत मेरे अंतरतम के मैं मौन रहा विस्मय से सुनता रहता था व्याकुल से हिरणों की पुकार मैं ने क़रीब से देखा बाघिन का शिकार मैं मिट्टी में जन्मा, खेला, पनपा एक देवदार जिस ने खोली बाँहें अपार — Vikram Gaur Vairagi