ख़त्म क्या हम भी ज़िन्दगी कर लें
मन ये करता है ख़ुदकुशी कर लें
और ज़्यादा उलझते जाते हैं
जब भी सोचा के सब सही कर लें
हम मुहब्बत लुटाए जाते हैं
जो सियासत है... आप ही कर लें
हदस ज़्यादा तो कुछ भी ठीक नहीं
ख़ुद में अब आपकी कमी कर लें
फिर न जाने के मैं मिलूँ न मिलूँ
सारे शिकवे गिले अभी कर लें
आपसे 'इश्क़ तो नहीं होना
आप बस अपनी नौकरी कर लें
बहर की ठन गई ख़यालों से
जब भी सोचा के शायरी कर लें
वैसे दुश्मन नहीं तुम्हारा मैं
ऐसे ही मन था मुख़्बरी कर लें
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