नज़्म: कामयाब साज़िश

था कच्चा मकाँ सो खटकता था सब को
यूँ लगता था बारिश में गिर जाएगा अब
मगर नींव थी उस की मज़बूत इतनी
कई बारिशों तक खड़ा ही रहा वो

मगर फिर अचानक से ऐसा हुआ
नई बारिशों ने की साज़िश नई
गिराना है इस को तो हर एक सूरत
चलो साथ मिल कर के हमला करें

मगर याद रखना, जो हमला है करना
हो इक ही जगह पर, हो इक साथ वो भी
है मजबूत जितना बिखर जाएगा वो
धराशाही होकर किधर जाएगा वो

ज़मींदोज़ होगा वो अबकी, है दावा
ये दावा किया और लगे काम पर सब
उधर उस मकाँ को न मालूम था ये
वो अनजान, चुप-चाप, ख़ुश था बहुत ही

फिर इक रोज़ बिजली लगी कड़कड़ाने
लगा दिन में ही फिर अँधेरा सा छाने
था ऐसा ये मंज़र जो देखा न पहले
दुआ करते थे सब बचा ले बचा ले

न उस ने बचाया, न ये बच सके ख़ुद
वही फिर हुआ जो कि होता है सच में
पुराना मकाँ इक ज़मींदोज़ था और
दरारें पड़ी थीं क़रीबी मकाँ में

सुना है क़रीबी मकाँ भी था साज़िश का हिस्सा
जो इस का क़रीबी है दुश्मन है इस का

— Aqib khan

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