वो बहारें न रहीं और वो मौसम न रहे

ज़ख़्म-ए-दिल भरते थे जो अब तो वो मरहम न रहे

बहते जाते थे मगर रास्ते में छूट गए
छूटे ऐसे कि जो हम होते थे पैहम न रहे

ख़ुद से ही कट गए हम दुनिया के होने के लिए
मुत्मइन लोग रहे हम से मगर हम न रहे

पहले जैसा तो वहाँ खेल तमाशा न रहा
और तो और यहाँ पहले से मातम न रहे

अब जो बंजर हुआ है दिल तो भला क्या शिकवा
अपनी कोशिश भी यही थी कि ज़मीं नम न रहे

ना-समझ ख़ुद को तू इतना भी समझदार न कर
हो जवाँ ख़ून मगर लहजे में दम-खम न रहे

— Aqib khan

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