और क्या डूबते की मंज़िल है
रात ही दिन ढले की मंज़िल है
ज़ीस्त जिस रास्ते में पड़ती है
मौत उस रास्ते की मंज़िल है
पहले इंसान और फिर मज़हब
ये मेरे फ़लसफ़े की मंज़िल है
तुझ को बस ख़ुद के ग़म ही दिखते हैं
ये तेरे दायरे की मंजिल है
आदमी ख़ुद को भूल जाता है
इश्क़ उस हादसे की मंज़िल है
कैसे भी तुक में तुक भिड़ा डालो
क्या यही क़ाफ़िए की मंज़िल है
— Aqib khan















