Azm Shakri

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Azm Shakri shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Azm Shakri's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मुझे एक लाश कह कर न बहाओ पानियों में मेरा हाथ छू के देखो मेरी नब्ज़ चल रही है — Azm Shakri
मेरे जिस्म से वक़्त ने कपड़े नोच लिए मंज़र मंज़र ख़ुद मेरी पोशाक हुआ — Azm Shakri
सारे दुख सो जाएँगे लेकिन इक ऐसा ग़म भी है जो मिरे बिस्तर पे सदियों का सफ़र रख जाएगा — Azm Shakri
अजीब हालत है जिस्म-ओ-जाँ की हज़ार पहलू बदल रहा हूँ वो मेरे अंदर उतर गया है मैं ख़ुद से बाहर निकल रहा हूँ — Azm Shakri
ज़िंदगी मेरी मुझे क़ैद किए देती है इस को डर है मैं किसी और का हो सकता हूँ — Azm Shakri
आँसुओं से लिख रहे हैं बेबसी की दास्ताँ लग रहा है दर्द की तस्वीर बन जाएँगे हम — Azm Shakri
मैं ने इक शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया लेकिन उस शहर को आँखों में बसा लाया हूँ — Azm Shakri
जो बच गए हैं चराग़ उन को बचाए रक्खो मैं चाहता हूँ हवा से रिश्ता बनाए रक्खो — Azm Shakri
अगर साए से जल जाने का इतना ख़ौफ़ था तो फिर सहर होते ही सूरज की निगहबानी में आ जाते — Azm Shakri
शब की आग़ोश में महताब उतारा उस ने मेरी आँखों में कोई ख़्वाब उतारा उस ने — Azm Shakri
ये जो दीवार अँधेरों ने उठा रक्खी है मेरा मक़्सद इसी दीवार में दर करना है — Azm Shakri
ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा ज़िंदगी में क्या बचेगा ज़ख़्म भर जाने के बा'द — Azm Shakri
यूँँ बार बार मुझ को सदाएँ न दीजिए अब वो नहीं रहा हूँ कोई दूसरा हूँ मैं — Azm Shakri
वक़्त-ए-रुख़्सत आब-दीदा आप क्यूँँ हैं जिस्म से तो जाँ हमारी जा रही है — Azm Shakri
आज की रात दिवाली है दिए रौशन हैं आज की रात ये लगता है मैं सो सकता हूँ — Azm Shakri
हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी — Azm Shakri

Ghazal

चाहता ये हूँ कि बेनाम-ओ-निशाँ हो जाऊँ शाम की तरह जलूँ और धुआँ हो जाऊँ पहले दहलीज़ पे रौशन करूँँ आँखों के चराग़ और फिर ख़ुद किसी पर्दे में निहाँ हो जाऊँ तोड़ कर फेंक दूँ ये फ़िरक़ा-परस्ती के महल और पेशानी पे सज्दे का निशाँ हो जाऊँ दिल से फिर दर्द महकने की सदाएँ उट्ठें काश ऐसा हो मैं तेरी रग-ए-जाँ हो जाऊँ बस तिरे ज़िक्र में कट जाएँ मिरे रोज़-ओ-शब नूर की शाख़ पे चिड़ियों की ज़बाँ हो जाऊँ ख़ाक जिस कूचे की मलते हैं फ़रिश्ते आ कर मैं उसी ख़ाक के ज़र्रों में निहाँ हो जाऊँ मेरी आवारा-मिज़ाजी को सुकूँ मिल जाए दर्द बन कर तिरे सीने में रवाँ हो जाऊँ — Azm Shakri