ख़ून आँसू बन गया आँखों में भर जाने के बा'द
आप आए तो मगर तूफ़ाँ गुज़र जाने के बा'द
आप आए तो मगर तूफ़ाँ गुज़र जाने के बा'द
चाँद का दुख बाँटने निकले हैं अब अहल-ए-वफ़ा
रौशनी का सारा शीराज़ा बिखर जाने के बा'द
होश क्या आया मुसलसल जल रहा हूँ हिज्र में
इक सुनहरी रात का नश्शा उतर जाने के बा'द
ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा
ज़िंदगी में क्या बचेगा ज़ख़्म भर जाने के बा'द
शाम होते ही चराग़ों से तुम्हारी गुफ़्तुगू
हम बहुत मसरूफ़ हो जाते हैं घर जाने के बा'द
ज़िंदगी के नाम पर हम उमर भर जीते रहे
ज़िंदगी को हम ने पाया भी तो मर जाने के बा'द
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चाहता ये हूँ कि बेनाम-ओ-निशाँ हो जाऊँ
शाम की तरह जलूँ और धुआँ हो जाऊँ
शाम की तरह जलूँ और धुआँ हो जाऊँ
पहले दहलीज़ पे रौशन करूँ आँखों के चराग़
और फिर ख़ुद किसी पर्दे में निहाँ हो जाऊँ
तोड़ कर फेंक दूँ ये फ़िरक़ा-परस्ती के महल
और पेशानी पे सज्दे का निशाँ हो जाऊँ
दिल से फिर दर्द महकने की सदाएँ उट्ठें
काश ऐसा हो मैं तेरी रग-ए-जाँ हो जाऊँ
बस तिरे ज़िक्र में कट जाएँ मिरे रोज़-ओ-शब
नूर की शाख़ पे चिड़ियों की ज़बाँ हो जाऊँ
ख़ाक जिस कूचे की मलते हैं फ़रिश्ते आ कर
मैं उसी ख़ाक के ज़र्रों में निहाँ हो जाऊँ
मेरी आवारा-मिज़ाजी को सुकूँ मिल जाए
दर्द बन कर तिरे सीने में रवाँ हो जाऊँ
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ज़िंदगी यूँ भी गुज़ारी जा रही है
जैसे कोई जंग हारी जा रही है
जैसे कोई जंग हारी जा रही है
जिस जगह पहले के ज़ख़्मों के निशाँ में
फिर वहीं पर चोट मारी जा रही है
वक़्त-ए-रुख़्सत आब-दीदा आप क्यूँ हैं
जिस्म से तो जाँ हमारी जा रही है
बोल कर ता'रीफ़ में कुछ लफ़्ज़ उस की
शख़्सियत अपनी निखारी जा रही है
धूप के दस्ताने हाथों में पहन कर
बर्फ़ की चादर उतारी जा रही है
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ज़िन्दगी, यूँ भी गुज़ारी जा रही है
जैसे, कोई जंग हारी जा रही है
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