laakhon sadme dheron gham phir bhi nahin hain aankhen nam | लाखों सदमें ढेरों ग़म फिर भी नहीं हैं आँखें नम

  - Azm Shakri

लाखों सदमें ढेरों ग़म फिर भी नहीं हैं आँखें नम
इक मुद्दत से रोए नहीं क्या पत्थर के हो गए हम

  - Azm Shakri

Udas Shayari

Our suggestion based on your choice

    जानता हूँ एक ऐसे शख़्स को मैं भी 'मुनीर'
    ग़म से पत्थर हो गया लेकिन कभी रोया नहीं
    Muneer Niyazi
    32 Likes
    दुख कम मिलें इस साल तुमको उस बरस से
    ये साल तुमको हौसला दे ये दुआ है
    Siddharth Saaz
    30 Likes
    अब क्या ही ग़म मनाएँ कि क्या क्या हुआ मियाँ
    बर्बाद होना ही था सो बर्बाद हो गए
    shaan manral
    उदास लोग इसी बात से हैं ख़ुश कि चलो
    हमारे साथ हुए हादसों की बात हुई
    Abhishar Geeta Shukla
    46 Likes
    हुआ जौन को पढ़ के मालूम ये
    उदासी का भी इक कलर होता है
    Viru Panwar
    लाज़िम है अब कि आप ज़ियादा उदास हों
    इस शहर में बचे हैं बहुत कम उदास लोग
    Bhaskar Shukla
    26 Likes
    मज़ाक सहना नहीं है हँसी नहीं करनी
    उदास रहने में कोई कमी नहीं करनी
    Swapnil Tiwari
    47 Likes
    वक़्त अच्छा भी आएगा 'नासिर'
    ग़म न कर ज़िंदगी पड़ी है अभी
    Nasir Kazmi
    54 Likes
    लोग हमसे सीखते हैं ग़म छुपाने का हुनर
    आओ तुमको भी सिखा दें मुस्कुराने का हुनर

    क्या ग़ज़ब है तजरबे की भेंट तुम ही चढ़ गए
    तुम से ही सीखा था हमने दिल दुखाने का हुनर
    Read Full
    Kashif Sayyed
    59 Likes
    हम अपने दुख को गाने लग गए हैं
    मगर इसमें ज़माने लग गए हैं
    Madan Mohan Danish
    37 Likes

More by Azm Shakri

As you were reading Shayari by Azm Shakri

    मेरे जिस्म से वक़्त ने कपड़े नोच लिए
    मंज़र मंज़र ख़ुद मेरी पोशाक हुआ
    Azm Shakri
    23 Likes
    ये मत कहो कि भीड़ में तन्हा खड़ा हूँ मैं
    टकरा के आबगीने से पत्थर हुआ हूँ मैं

    आँखों के जंगलों में मुझे मत करो तलाश
    दामन पे आँसुओं की तरह आ गया हूँ मैं

    यूँ बे-रुख़ी के साथ न मुँह फेर के गुज़र
    ऐ साहब-ए-जमाल तिरा आइना हूँ मैं

    यूँ बार बार मुझ को सदाएँ न दीजिए
    अब वो नहीं रहा हूँ कोई दूसरा हूँ मैं

    मेरी बुराइयों पे किसी की नज़र नहीं
    सब ये समझ रहे हैं बड़ा पारसा हूँ मैं

    वो बेवफ़ा समझता है मुझ को उसे कहो
    आँखों में उस के ख़्वाब लिए फिर रहा हूँ मैं
    Read Full
    Azm Shakri
    सारी रात के बिखरे हुए शीराज़े पर रक्खी हैं
    प्यार की झूटी उम्मीदें ख़ामियाज़े पर रक्खी हैं

    कोई तो अपना वा'दा ही आसानी से भूल गया
    और किसी की दो आँखें दरवाज़े पर रक्खी हैं

    उस के ख़्वाब हक़ीक़त हैं उस की ज़ात मुकम्मल है
    और हमारी सब ख़ुशियाँ अंदाज़े पर रक्खी हैं
    Read Full
    Azm Shakri
    ज़िंदगी यूँ भी गुज़ारी जा रही है
    जैसे कोई जंग हारी जा रही है

    जिस जगह पहले के ज़ख़्मों के निशाँ में
    फिर वहीं पर चोट मारी जा रही है

    वक़्त-ए-रुख़्सत आब-दीदा आप क्यूँ हैं
    जिस्म से तो जाँ हमारी जा रही है

    बोल कर तारीफ़ में कुछ लफ़्ज़ उस की
    शख़्सियत अपनी निखारी जा रही है

    धूप के दस्ताने हाथों में पहन कर
    बर्फ़ की चादर उतारी जा रही है
    Read Full
    Azm Shakri
    सारे दुख सो जाएँगे लेकिन इक ऐसा ग़म भी है
    जो मिरे बिस्तर पे सदियों का सफ़र रख जाएगा
    Azm Shakri
    33 Likes

Similar Writers

our suggestion based on Azm Shakri

Similar Moods

As you were reading Udas Shayari Shayari