ab ye bhi nahin theek ki har dard mita den | अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें

  - Jaan Nisar Akhtar

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

  - Jaan Nisar Akhtar

Dard Shayari

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    बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
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    कोई अटका हुआ है पल शायद
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    इस का कोई नहीं है हल शायद
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    Gulzar
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    तुम से ही सीखा था हमने दिल दुखाने का हुनर
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    Kashif Sayyed
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    हम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह
    हम ने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह

    ख़ुद-ब-ख़ुद नींद सी आँखों में घुली जाती है
    महकी महकी है शब-ए-ग़म तिरे बालों की तरह

    तेरे बिन रात के हाथों पे ये तारों के अयाग़
    ख़ूब-सूरत हैं मगर ज़हर के प्यालों की तरह

    और क्या इस से ज़ियादा कोई नरमी बरतूँ
    दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तिरे गालों की तरह

    गुनगुनाते हुए और आ कभी उन सीनों में
    तेरी ख़ातिर जो महकते हैं शिवालों की तरह

    तेरी ज़ुल्फ़ें तिरी आँखें तिरे अबरू तिरे लब
    अब भी मशहूर हैं दुनिया में मिसालों की तरह

    हम से मायूस न हो ऐ शब-ए-दौराँ कि अभी
    दिल में कुछ दर्द चमकते हैं उजालों की तरह

    मुझ से नज़रें तो मिलाओ कि हज़ारों चेहरे
    मेरी आँखों में सुलगते हैं सवालों की तरह

    और तो मुझ को मिला क्या मिरी मेहनत का सिला
    चंद सिक्के हैं मिरे हाथ में छालों की तरह

    जुस्तुजू ने किसी मंज़िल पे ठहरने न दिया
    हम भटकते रहे आवारा ख़यालों की तरह

    ज़िंदगी जिस को तेरा प्यार मिला वो जाने
    हम तो नाकाम रहे चाहने वालों की तरह
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    Jaan Nisar Akhtar
    तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है
    तुझे अलग से जो सोचूँ अजीब लगता है

    जिसे न हुस्न से मतलब न इश्क़ से सरोकार
    वो शख़्स मुझ को बहुत बद-नसीब लगता है

    हुदूद-ए-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा
    न कोई ग़ैर न कोई रक़ीब लगता है

    ये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस
    कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है

    उफ़ुक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा
    मुझे चराग़-ए-दयार-ए-हबीब लगता है
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    Jaan Nisar Akhtar
    मय-कशी अब मिरी आदत के सिवा कुछ भी नहीं
    ये भी इक तल्ख़ हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं

    फ़ित्ना-ए-अक़्ल के जूया मिरी दुनिया से गुज़र
    मेरी दुनिया में मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं

    दिल में वो शोरिश-ए-जज़्बात कहाँ तेरे बग़ैर
    एक ख़ामोश क़यामत के सिवा कुछ भी नहीं

    मुझ को ख़ुद अपनी जवानी की क़सम है कि ये इश्क़
    इक जवानी की शरारत के सिवा कुछ भी नहीं
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    Jaan Nisar Akhtar
    बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है
    चमन माँगा था पर उस ने ब-मुश्किल इक कली दी है

    मिरे ख़ल्वत-कदे के रात दिन यूँही नहीं सँवरे
    किसी ने धूप बख़्शी है किसी ने चाँदनी दी है

    नज़र को सब्ज़ मैदानों ने क्या क्या वुसअतें बख़्शीं
    पिघलते आबशारों ने हमें दरिया-दिली दी है

    मोहब्बत ना-रवा तक़्सीम की क़ाएल नहीं फिर भी
    मिरी आँखों को आँसू तेरे होंटों को हँसी दी है

    मिरी आवारगी भी इक करिश्मा है ज़माने में
    हर इक दरवेश ने मुझ को दुआ-ए-ख़ैर ही दी है

    कहाँ मुमकिन था कोई काम हम जैसे दिवानों से
    तुम्हीं ने गीत लिखवाए तुम्हीं ने शाइरी दी है
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    Jaan Nisar Akhtar
    आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
    साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो

    जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
    शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो

    संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
    झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो

    ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
    नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो

    जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
    चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो
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    Jaan Nisar Akhtar

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