Jaan Nisar Akhtar

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Jaan Nisar Akhtar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Jaan Nisar Akhtar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं — Jaan Nisar Akhtar
साँस लेती हूँ तो यूँँ महसूस होता है मुझे जैसे मेरे दिल की हर धड़कन में शामिल आप हैं — Jaan Nisar Akhtar
हर-चंद ए'तिबार में धोके भी हैं मगर ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए — Jaan Nisar Akhtar
लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से — Jaan Nisar Akhtar
आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो — Jaan Nisar Akhtar
लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से — Jaan Nisar Akhtar
सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी — Jaan Nisar Akhtar
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं — Jaan Nisar Akhtar
और क्या इस से ज़ियादा कोई नर्मी बरतूँ दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तिरे गालों की तरह — Jaan Nisar Akhtar

Ghazal

तुम्हारे जश्न को जश्न-ए-फ़रोज़ाँ हम नहीं कहते लहू की गर्म बूँदों को चराग़ाँ हम नहीं कहते अगर हद से गुज़र जाए दवा तो बन नहीं जाता किसी भी दर्द को दुनिया का दरमाँ हम नहीं कहते नज़र की इंतिहा कोई न दिल की इंतिहा कोई किसी भी हुस्न को हुस्न-ए-फ़रावाँ हम नहीं कहते किसी आशिक़ के शाने पर बिखर जाए तो क्या कहना मगर इस ज़ुल्फ़ को ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ हम नहीं कहते न बू-ए-गुल महकती है न शाख़-ए-गुल लचकती है अभी अपने गुलिस्ताँ को गुलिस्ताँ हम नहीं कहते बहारों से जुनूँ को हर तरह निस्बत सही लेकिन शगुफ़्त-ए-गुल को आशिक़ का गरेबाँ हम नहीं कहते हज़ारों साल बीते हैं हज़ारों साल बीतेंगे बदल जाएगी कल तक़दीर-ए-इंसाँ हम नहीं कहते — Jaan Nisar Akhtar
एक तो नैनाँ कजरारे और तिस पर डूबे काजल में बिजली की बढ़ जाए चमक कुछ और भी गहरे बादल में आज ज़रा ललचाई नज़र से उस को बस क्या देख लिया पग-पग उस के दिल की धड़कन उतरी आए पायल में प्यासे प्यासे नैनाँ उस के जाने पगली चाहे क्या तट पर जब भी जावे सोचे नदिया भर लूँ छागल में सुब्ह नहाने जूड़ा खोले नाग बदन से आ लिपटें उस की रंगत उस की ख़ुश्बू कितनी मिलती संदल में गोरी इस संसार में मुझ को ऐसा तेरा रूप लगे जैसे कोई दीप जला हो घोर अँधेरे जंगल में प्यार की यूँँ हर बूँद जला दी मैं ने अपने सीने में जैसे कोई जलती माचिस डाल दे पी कर बोतल में आज पता क्या कौन से लम्हे कौन सा तूफ़ाँ जाग उठे जाने कितनी दर्द की सदियाँ गूँज रही हैं पल पल में — Jaan Nisar Akhtar
वो लोग ही हर दौर में महबूब रहे हैं जो इश्क़ में तालिब नहीं मतलूब रहे हैं तूफ़ान की आवाज़ तो आती नहीं लेकिन लगता है सफ़ीने से कहीं डूब रहे हैं उन को न पुकारो ग़म-ए-दौराँ के लक़ब से जो दर्द किसी नाम से मंसूब रहे हैं हम भी तिरी सूरत के परस्तार हैं लेकिन कुछ और भी चेहरे हमें मर्ग़ूब रहे हैं अल्फ़ाज़ में इज़हार-ए-मोहब्बत के तरीक़े ख़ुद इश्क़ की नज़रों में भी मायूब रहे हैं इस अहद-ए-बसीरत में भी नक़्क़ाद हमारे हर एक बड़े नाम से मरऊब रहे हैं इतना भी न घबराओ नई तर्ज़-ए-अदास हर दौर में बदले हुए उस्लूब रहे हैं — Jaan Nisar Akhtar
हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे ये शहर मुझ को तो यारो कोई भँवर सा लगे अब उस के तर्ज़-ए-तजाहुल को क्या कहे कोई वो बे-ख़बर तो नहीं फिर भी बे-ख़बर सा लगे हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे नशात-ए-सोहबत-ए-रिंदाँ बहुत ग़नीमत है कि लम्हा लम्हा पुर-आशोब-ओ-पुर-ख़तर सा लगे किसे ख़बर है कि दुनिया का हश्र क्या होगा कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे वो तुंद वक़्त की रौ है कि पाँव टिक न सकें हर आदमी कोई उखड़ा हुआ शजर सा लगे जहान-ए-नौ के मुकम्मल सिंगार की ख़ातिर सदी सदी का ज़माना भी मुख़्तसर सा लगे — Jaan Nisar Akhtar
ज़मीं होगी किसी क़ातिल का दामाँ हम न कहते थे अकारत जाएगा ख़ून-ए-शहीदाँ हम न कहते थे इलाज-ए-चाक-ए-पैराहन हुआ तो इस तरह होगा सिया जाएगा काँटों से गरेबाँ हम न कहते थे तराने कुछ दिए लफ़्ज़ों में ख़ुद को क़ैद कर लेंगे अजब अंदाज़ से फैलेगा ज़िंदाँ हम न कहते थे कोई इतना न होगा लाश भी ले जा के दफ़ना दे इन्हीं सड़कों पे मर जाएगा इंसाँ हम न कहते थे नज़र लिपटी है शोलों में लहू तपता है आँखों में उठा ही चाहता है कोई तूफ़ाँ हम न कहते थे छलकते जाम में भीगी हुई आँखें उतर आईं सताएगी किसी दिन याद-ए-याराँ हम न कहते थे नई तहज़ीब कैसे लखनऊ को रास आएगी उजड़ जाएगा ये शहर-ए-ग़ज़ालाँ हम न कहते थे — Jaan Nisar Akhtar
तुलू-ए-सुब्ह है नज़रें उठा के देख ज़रा शिकस्त-ए-ज़ुल्मत-ए-शब मुस्कुरा के देख ज़रा ग़म-ए-बहार ओ ग़म-ए-यार ही नहीं सब कुछ ग़म-ए-जहाँ से भी दिल को लगा के देख ज़रा बहार कौन सी सौग़ात ले के आई है हमारे ज़ख़्म-ए-तमन्ना तू आ के देख ज़रा हर एक सम्त से इक आफ़्ताब उभरेगा चराग़-ए-दैर-ओ-हरम तो बुझा के देख ज़रा वजूद-ए-इश्क़ की तारीख़ का पता तो चले वरक़ उलट के तू अर्ज़ ओ समा के देख ज़रा मिले तो तू ही मिले और कुछ क़ुबूल नहीं जहाँ में हौसले अहल-ए-वफ़ा के देख ज़रा तिरी नज़र से है रिश्ता मिरे गिरेबाँ का किधर है मेरी तरफ़ मुस्कुरा के देख ज़रा — Jaan Nisar Akhtar
रंज-ओ-ग़म माँगे है अंदोह-ओ-बला माँगे है दिल वो मुजरिम है कि ख़ुद अपनी सज़ा माँगे है चुप है हर ज़ख़्म-ए-गुलू चुप है शहीदों का लहू दस्त-ए-क़ातिल है जो मेहनत का सिला माँगे है तू भी इक दौलत-ए-नायाब है पर क्या कहिए ज़िंदगी और भी कुछ तेरे सिवा माँगे है खोई खोई ये निगाहें ये ख़मीदा पलकें हाथ उठाए कोई जिस तरह दुआ माँगे है रास अब आएगी अश्कों की न आहों की फ़ज़ा आज का प्यार नई आब-ओ-हवा माँगे है बाँसुरी का कोई नग़्मा न सही चीख़ सही हर सुकूत-ए-शब-ए-ग़म कोई सदा माँगे है लाख मुनकिर सही पर ज़ौक़-ए-परस्तिश मेरा आज भी कोई सनम कोई ख़ुदा माँगे है साँस वैसे ही ज़माने की रुकी जाती है वो बदन और भी कुछ तंग क़बा माँगे है दिल हर इक हाल से बेगाना हुआ जाता है अब तवज्जोह न तग़ाफ़ुल न अदा माँगे है — Jaan Nisar Akhtar
ख़ुद-ब-ख़ुद मय है कि शीशे में भरी आवे है किस बला की तुम्हें जादू-नज़री आवे है दिल में दर आवे है हर सुब्ह कोई याद ऐसे जूँ दबे-पाँव नसीम-ए-सहरी आवे है और भी ज़ख़्म हुए जाते हैं गहरे दिल के हम तो समझे थे तुम्हें चारागरी आवे है एक क़तरा भी लहू जब न रहे सीने में तब कहीं इश्क़ में कुछ बे-जिगरी आवे है चाक-ए-दामाँ-ओ-गिरेबाँ के भी आदाब हैं कुछ हर दिवाने को कहाँ जामा-दरी आवे है शजर-ए-इश्क़ तो माँगे है लहू के आँसू तब कहीं जा के कोई शाख़ हरी आवे है तू कभी राग कभी रंग कभी ख़ुश्बू है कैसी कैसी न तुझे इश्वा-गरी आवे है आप-अपने को भुलाना कोई आसान नहीं बड़ी मुश्किल से मियाँ बे-ख़बरी आवे है ऐ मिरे शहर-ए-निगाराँ तिरा क्या हाल हुआ चप्पे चप्पे पे मिरे आँख भरी आवे है साहिबो हुस्न की पहचान कोई खेल नहीं दिल लहू हो तो कहीं दीदा-वरी आवे है — Jaan Nisar Akhtar
मुद्दत हुई उस जान-ए-हया ने हम से ये इक़रार किया जितने भी बदनाम हुए हम उतना उस ने प्यार किया पहले भी ख़ुश-चश्मों में हम चौकन्ना से रहते थे तेरी सोई आँखों ने तो और हमें होशियार किया जाते जाते कोई हम से अच्छे रहना कह तो गया पूछे लेकिन पूछने वाले किस ने ये बीमार किया क़तरा क़तरा सिर्फ़ हुआ है इश्क़ में अपने दिल का लहू शक्ल दिखाई तब उस ने जब आँखों को ख़ूँ-बार किया हम पर कितनी बार पड़े ये दौरे भी तन्हाई के जो भी हम से मिलने आया मिलने से इनकार किया इश्क़ में क्या नुक़सान नफ़ा है हम को क्या समझाते हो हम ने सारी उम्र ही यारो दिल का कारोबार किया महफ़िल पर जब नींद सी छाई सब के सब ख़ामोश हुए हम ने तब कुछ शे'र सुनाया लोगों को बेदार किया अब तुम सोचो अब तुम जानो जो चाहो अब रंग भरो हम ने तो इक नक़्शा खींचा इक ख़ाका तय्यार किया देश से जब प्रदेश सिधारे हम पर ये भी वक़्त पड़ा नज़्में छोड़ी ग़ज़लें छोड़ी गीतों का बेवपार किया — Jaan Nisar Akhtar
बहुत दिल कर के होंटों की शगुफ़्ता ताज़गी दी है चमन माँगा था पर उस ने ब-मुश्किल इक कली दी है मिरे ख़ल्वत-कदे के रात दिन यूँँही नहीं सँवरे किसी ने धूप बख़्शी है किसी ने चाँदनी दी है नज़र को सब्ज़ मैदानों ने क्या क्या वुसअतें बख़्शीं पिघलते आबशारों ने हमें दरिया-दिली दी है मोहब्बत ना-रवा तक़्सीम की क़ाएल नहीं फिर भी मिरी आँखों को आँसू तेरे होंटों को हँसी दी है मिरी आवारगी भी इक करिश्मा है ज़माने में हर इक दरवेश ने मुझ को दुआ-ए-ख़ैर ही दी है कहाँ मुमकिन था कोई काम हम जैसे दिवानों से तुम्हीं ने गीत लिखवाए तुम्हीं ने शा'इरी दी है — Jaan Nisar Akhtar
मौज-ए-गुल मौज-ए-सबा मौज-ए-सहर लगती है सर से पा तक वो समाँ है कि नज़र लगती है हम ने हर गाम पे सज्दों के जलाए हैं चराग़ अब हमें तेरी गली राह-गुज़र लगती है लम्हे लम्हे में बसी है तिरी यादों की महक आज की रात तो ख़ुशबू का सफ़र लगती है जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं देखना ये है कि अब आग किधर लगती है सारी दुनिया में ग़रीबों का लहू बहता है हर ज़मीं मुझ को मिरे ख़ून से तर लगती है कोई आसूदा नहीं अहल-ए-सियासत के सिवा ये सदी दुश्मन-ए-अरबाब-ए-हुनर लगती है वाक़िआ'' शहर में कल तो कोई ऐसा न हुआ ये तो अख़बार के दफ़्तर की ख़बर लगती है लखनऊ क्या तिरी गलियों का मुक़द्दर था यही हर गली आज तिरी ख़ाक-बसर लगती है — Jaan Nisar Akhtar
आँखें चुरा के हम से बहार आए ये नहीं हिस्से में अपने सिर्फ़ ग़ुबार आए ये नहीं कू-ए-ग़म-ए-हयात में सब उम्र काट दी थोड़ा सा वक़्त वाँ भी गुज़ार आए ये नहीं ख़ुद इश्क़ क़ुर्ब-ए-जिस्म भी है क़ुर्ब-ए-जाँ के साथ हम दूर ही से उन को पुकार आए ये नहीं आँखों में दिल खुले हों तो मौसम की क़ैद क्या फ़स्ल-ए-बहार ही में बहार आए ये नहीं अब क्या करें कि हुस्न जहाँ है अज़ीज़ है तेरे सिवा किसी पे न प्यार आए ये नहीं वा'दों को ख़ून-ए-दिल से लिखो तब तो बात है काग़ज़ पे क़िस्मतों को सँवार आए ये नहीं कुछ रोज़ और कल की मुरव्वत में काट लें दिल को यक़ीन-ए-वादा-ए-यार आए ये नहीं — Jaan Nisar Akhtar

Nazm

तेरी पेशानी-ए-रंगीं में झलकती है जो आग तेरे रुख़्सार के फूलों में दमकती है जो आग तेरे सीने में जवानी की दहकती है जो आग ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे तेरी आँखों में फ़रोज़ाँ हैं जवानी के शरार लब-ए-गुल-रंग पे रक़्साँ हैं जवानी के शरार तेरी हर साँस में ग़लताँ हैं जवानी के शरार ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे हर अदा में है जवाँ आतिश-ए-जज़्बात की रौ ये मचलते हुए शो'ले ये तड़पती हुई लौ आ मिरी रूह पे भी डाल दे अपना परतव ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे कितनी महरूम निगाहें हैं तुझे क्या मालूम कितनी तरसी हुई बाहें हैं तुझे क्या मालूम कैसी धुँदली मिरी राहें हैं तुझे क्या मालूम ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे आ कि ज़ुल्मत में कोई नूर का सामाँ कर लूँ अपने तारीक शबिस्ताँ को शबिस्ताँ कर लूँ इस अँधेरे में कोई शम्अ' फ़रोज़ाँ कर लूँ ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे बार-ए-ज़ुल्मात से सीने की फ़ज़ा है बोझल न कोई साज़-ए-तमन्ना न कोई सोज़-ए-अमल आ कि मशअल से तिरी मैं भी जला लूँ मशअल ज़िंदगी की ये हसीं आग मुझे भी दे दे — Jaan Nisar Akhtar
आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ मेरे सीने में झिलमिलाती हैं कितने आरिज़ की झलकियाँ अब तक दिल में सीमीं वरक़ लुटाती हैं कितने हीरा-तराश जिस्मों की बिजलियाँ दिल में कौंद जाती हैं कितनी तारों से ख़ुश-नुमा आँखें मेरी आँखों में मुस्कुराती हैं कितने होंटों की गुल-फ़िशाँ आँचें मेरे होंटों में सनसनाती हैं कितनी शब-ताब रेशमी ज़ुल्फ़ें मेरे बाज़ू पे सरसराती हैं कितनी ख़ुश-रंग मोतियों से भरी बालियाँ दिल में टिमटिमाती हैं कितनी गोरी कलाइयों की लवें दिल के गोशों में जगमगाती हैं कितनी रंगीं हथेलियाँ छुप कर धीमे धीमे कँवल जलाती हैं कितनी आँचल से फूटती किरनें मेरे पहलू में रसमसाती हैं कितनी पायल की शोख़ झंकारें दिल में चिंगारियाँ उड़ाती हैं कितनी अंगड़ाइयाँ धनक बन कर ख़ुद उभरती हैं टूट जाती हैं कितनी गुल-पोश नक़्रई बाँहें दिल को हल्क़े में ले के गाती हैं आज भी कितनी अन-गिनत शमएँ मेरे सीने में झिलमिलाती हैं अपने इस जल्वा-गर तसव्वुर की जाँ-फ़ज़ा दिलकशी से ज़िंदा हूँ इन ही बीते जवान लम्हों की शोख़-ताबिंदगी से ज़िंदा हूँ यही यादों की रौशनी तो है आज जिस रौशनी से ज़िंदा हूँ आओ मैं तुम से ए'तिराफ़ करूँँ मैं इसी शा'इरी से ज़िंदा हूँ — Jaan Nisar Akhtar
उफ़ ये शबनम से छलकते हुए फूलों के अयाग़ इस चमन में हैं अभी दीदा-ए-पुर-नम कितने कितने ग़ुंचे हैं जिगर-चाक गुलिस्ताँ में अभी हर तरफ़ ज़ख़्म हैं बे-मिन्नत-ए-मरहम कितने कितने सीनों में शिकस्ता हैं अभी दिल के रबाब लब-ए-ख़ामोश पे हैं नग़्मा-ए-मातम कितने कितने माथों के अभी सर्द हैं रंगीन गुलाब गर्द अफ़्शाँ हैं अभी गेसू-ए-पुर-ख़म कितने ज़ेहन-ए-आदम में है अफ़्कार की दुनिया आबाद क़ल्ब-ए-इंसाँ में अमानत हैं अभी ग़म कितने धुँदले धुँदले से सितारे हैं उफ़ुक़ पर लर्ज़ां ज़िंदगानी के हसीं ख़्वाब हैं मुबहम कितने आज तो काकुल-ए-गीती न सँवर जाएगी सिलसिले शौक़ के होंगे अभी बरहम कितने जज़्ब होंगे अभी इस ख़ाक-ए-चमन में ऐ दोस्त अश्क बन बन के गुहर-रेज़ा-ए-शबनम कितने अभी गूंजेंगे सलासिल की सदाएँ कितनी और होंगे अभी ज़ंजीर से मातम कितने ज़िंदगी राह-ए-तसादुम में भटकती है अभी वक़्त के लब पे अभी उज़्र हैं पैहम कितने इक ज़रा सब्र कि इन सुर्ख़ घटाओं के तले सर-निगूँ होंगे यहाँ ख़ाक पे परचम कितने लाला-ओ-गुल के तबस्सुम से शफ़क़ फूलेगी हर तरफ़ रंग नज़र आएँगे बाहम कितने ख़ून-ए-दिल में है निहाँ शोला-ए-सद-रंग-ए-बहार इस गुलिस्ताँ में हैं इस राज़ के महरम कितने इन्ही ज़र्रों से उभर आएँगे कितने मह-ओ-मेहर इसी आलम से सँवर जाएँगे आलम कितने — Jaan Nisar Akhtar
फ़ज़ाओं में है सुब्ह का रंग तारी गई है अभी गर्ल्स कॉलेज की लारी गई है अभी गूँजती गुनगुनाती ज़माने की रफ़्तार का राग गाती लचकती हुई सी छलकती हुई सी बहकती हुई सी महकती हुई सी वो सड़कों पे फूलों की धारी सी बनती इधर से उधर से हसीनों को चुनती झलकते वो शीशों में शादाब चेहरे वो कलियाँ सी खुलती हुई मुँह अंधेरे वो माथे पे साड़ी के रंगीं किनारे सहरस निकलती शफ़क़ के इशारे किसी की अदा से अयाँ ख़ुश-मज़ाक़ी किसी की निगाहों में कुछ नींद बाक़ी किसी की नज़र में मोहब्बत के दोहे सखी री ये जीवन पिया बिन न सोहे ये खिड़की का रंगीन शीशा गिराए वो शीशे से रंगीन चेहरा मिलाए ये चलती ज़मीं पे निगाहें जमाती वो होंटों में अपने क़लम को दबाती ये खिड़की से इक हाथ बाहर निकाले वो ज़ानू पे गिरती किताबें सँभाले किसी को वो हर बार तेवरी सी चढ़ती दुकानों के तख़्ते अधूरे से पढ़ती कोई इक तरफ़ को सिमटती हुई सी किनारे को साड़ी के बटती हुई सी वो लारी में गूँजे हुए ज़मज़मे से दबी मुस्कुराहट सुबुक क़हक़हे से वो लहजों में चाँदी खनकती हुई सी वो नज़रों से कलियाँ चटकती हुई सी सरों से वो आँचल ढलकते हुए से वो शानों से साग़र छलकते हुए से जवानी निगाहों में बहकी हुई सी मोहब्बत तख़य्युल में बहकी हुई सी वो आपस की छेड़ें वो झूटे फ़साने कोई उन की बातों को कैसे न माने फ़साना भी उन का तराना भी उन का जवानी भी उन की ज़माना भी उन का — Jaan Nisar Akhtar
मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी जब पास तू नहीं होती ख़ुद को कितना उदास पाता हूँ गुम से अपने हवा से पाता हूँ जाने क्या धुन समाई रहती है इक ख़मोशी सी छाई रहती है दिल से भी गुफ़्तुगू नहीं होती मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी रह रह के मेरे कानों में गूँजती है तिरी हसीं आवाज़ जैसे नादीदा कोई बजता साज़ हर सदा नागवार होती है इन सुकूत-आश्ना तरानों में मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी शब की तवील ख़ल्वत में तेरे औक़ात सोचता हूँ मैं तेरी हर बात सोचता हूँ मैं कौन से फूल तुझ को भाते हैं रंग क्या क्या पसंद आते हैं खो सा जाता हूँ तेरी जन्नत में मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी एहसास से नजात नहीं सोचता हूँ तो रंज होता है दिल को जैसे कोई डुबोता है जिस को इतना सराहता हूँ मैं जिस को इस दर्जा चाहता हूँ मैं इस में तेरी सी कोई बात नहीं मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी शब की तवील ख़ल्वत में तेरे औक़ात सोचता हूँ मैं तेरी हर बात सोचता हूँ मैं कौन से फूल तुझ को भाते हैं रंग क्या क्या पसंद आते हैं खो सा जाता हूँ तेरी जन्नत में मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी एहसास से नजात नहीं सोचता हूँ तो रंज होता है दिल को जैसे कोई डुबोता है जिस को इतना सराहता हूँ मैं जिस को इस दर्जा चाहता हूँ मैं उस में तेरी सी कोई बात नहीं मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन — Jaan Nisar Akhtar
सीने से आधी रात के फूटी वो सूरज की किरन बरसे वो तारों के कँवल वो रक़्स में आया गगन आए मुबारकबाद को कितने शहीदाने- वतन आज़ाद है, आज़ाद है, आज़ाद है अपना वतन आज़ाद है अपना वतन अय रोदे-गंगा गीत गा इठला के चल मौजे-चमन हाँ, अय हिमाला झूम जा रक़्सां हो अय दश्तो-दिमन हाँ, अय इलौरा के बुतो नग़्मासरा हो, नग़्माजन आज़ाद है, आज़ाद है, आज़ाद है अपना वतन आज़ाद है अपना वतनअय परचमे-सहरंग तू अपने वतन की आबरू तू है हमारा नंगो-नाम हम तुझ को करते हैं सलाम ज़र्दी से तेरी रूनुमा बेलौस ख़िदमत की लगन सब्ज़ी से तेरी जल्वागर हिम्मत, जवानी, बांकपन तेरी सफ़ेदी से अयां इंसानियत, पाकीज़ापन अय परचमे-सहरंग तू अपने वतन की आबरू तू है हमारा नंगो-नाम हम तुझ को करते हैं सलाम हम तुझ को करते हैं सलाम — Jaan Nisar Akhtar
शिद्दत-ए-इफ़्लास से जब ज़िंदगी थी तुझ पे तंग इश्तिहा के साथ थी जब ग़ैरत ओ इस्मत की जंग घात में तेरी रहा ये ख़ुद-ग़रज़ सरमाया-दार खेलता है जो बराबर नौ-ए-इंसाँ का शिकार रफ़्ता रफ़्ता लूट ली तेरी मता-ए-आबरू ख़ूब चूसा तेरी रग रग से जवानी का लहू खेलते हैं आज भी तुझ से यही सरमाया-दार ये तमद्दुन के ख़ुदा तहज़ीब के परवरदिगार सामने दुनिया के तुफ़ करते हैं तेरे नाम पर ख़ल्वतों में जो तिरे क़दमों पे रख देते हैं सर रास्ते में दिन को ले सकते नहीं तेरा सलाम रात को जो तेरे हाथों से चढ़ा जाते हैं जाम तेरे कूचा से जिन्हें हो कर गुज़रना है गुनाह गर्म उन की साँस से रहती है तेरी ख़्वाब-गाह महफ़िलों में तुझ से कर सकते नहीं जो गुफ़्तुगू तेरे आँचल में बंधी है उन की झूटी आबरू पेट की ख़ातिर अगर तू बेचती है जिस्म आज कौन है नफ़रत से तुझ को देखने वाला समाज — Jaan Nisar Akhtar
वो अफ़्साने किया है चाँद तारों का सफ़र जिन में ये दुनिया एक धुँदली गेंद आती है नज़र जिन में वो जिन में मुल्क-ए-बर्क़-ओ-बाद तक तस्ख़ीर होता है जहाँ इक शब में सोने का महल तामीर होता है अछूते-साहिलों के वो सहर-आलूद वीराने तिलिस्मी-क़स्र में गुमनाम शहज़ादी के अफ़्साने वो अफ़्साने जो रातें चाँद के बरबत पे गाती हैं वो अफ़्साने जो सुब्हें रूह के अंदर जगाती हैं फ़ज़ा करती है जिन मौहूम अफ़्सानों की तामीरें भटकते अब्र में जिन की मिलीं मुबहम सी तस्वीरें सर-ए-साहिल जो बहती शम्अ' की लौ गुनगुनाती है दिमाग़ ओ दिल में जिन से इक किरन सी दौड़ जाती है वो अफ़्साने जो दिल को बे-कहे महसूस होते हैं जो होंटों की हसीं गुलनार मेहराबों में सोते हैं किसी की नर्गिस-ए-शरसार के मुबहम से अफ़्साने किसी की ज़ुल्फ़-ए-अम्बर-बार के बरहम से अफ़्साने वो जिन को इस तरह कुछ जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ सुनाती है कि जैसे ख़्वाब में भूली हुई इक याद आती है रहा हूँ गुम इन्ही मौहूम अफ़्सानों की बस्ती में इन्ही दिलकश मगर गुमनाम रूमानों की बस्ती में किसी ने तोड़ डाला ये तिलिस्म-ए-कैफ़-ओ-ख़्वाब आख़िर मिरी आँखों के आगे आए शमशीर ओ शबाब आख़िर — Jaan Nisar Akhtar
जून का तपता महीना तिम्तिमाता आफ़्ताब ढल चुका है दिन के साँचे में जहन्नम का शबाब दोपहर इक आतिश-ए-सय्याल बरसाती हुई सीना-ए-कोहसार में लावा सा पिघलाती हुई वो झुलसती घास वो पगडंडियाँ पामाल सी नहर के लब ख़ुश्क से ज़र्रों की आँखें लाल सी चिलचिलाती धूप में मैदान को चढ़ता बुख़ार आह के मानिंद उठता हल्का हल्का सा ग़ुबार देख वो मैदान में है इक बगूला बे-क़रार आँधियों की गोद में हो जैसे मुफ़लिस का मज़ार चाक पर जैसे बनाए जा रहे हों ज़लज़ले या जुनूँ तय कर रहा हो गर्दिशों के मरहले ढालना चाहे ज़मीं जिस तरह कोई आसमाँ जैसे चक्कर खा के निकले तोप के मुँह से धुआँ मिल रहा हो जिस तरह जोश-ए-बग़ावत को फ़राग़ जंग छिड़ जाने पे जैसे एक लीडर का दिमाग़ ख़शमगीं अबरू पे डाले ख़ाक-आलूदा नक़ाब जंगलों की राह से आए सफ़ीर-ए-इंक़लाब यूँँ बगूले में हैं तपते सुर्ख़ ज़र्रे बे-क़रार जिस तरह अफ़्लास के दिल में बग़ावत के शरार कस क़दर आज़ाद है ये रूह-ए-सहरा ये भी देख कस तरह ज़र्रों में है तूफ़ान बरपा ये भी देख उठ बगूले की तरह मैदान में गाता निकल ज़िंदगी की रूह हर ज़र्रे में दौड़ाता निकल — Jaan Nisar Akhtar
लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन तेरे गहवारा-ए-आग़ोश में ऐ जान-ए-बहार अपनी दुनिया-ए-हसीं दफ़्न किए जाता हूँ तू ने जिस दिल को धड़कने की अदा बख़्शी थी आज वो दिल भी यहीं दफ़्न किए जाता हूँ दफ़्न है देख मिरा अहद-ए-बहाराँ तुझ में दफ़्न है देख मिरी रूह-ए-गुलिस्ताँ तुझ में मेरी गुल-पोश जवाँ-साल उमंगों का सुहाग मेरी शादाब तमन्ना के महकते हुए ख़्वाब मेरी बेदार जवानी के फ़िरोज़ाँ मह ओ साल मेरी शामों की मलाहत मिरी सुब्हों का जमाल मेरी महफ़िल का फ़साना मिरी ख़ल्वत का फ़ुसूँ मेरी दीवानगी-ए-शौक़ मिरा नाज़-ए-जुनून मेरे मरने का सलीक़ा मिरे जीने का शुऊ'र मेरा नामूस-ए-वफ़ा मेरी मोहब्बत का ग़ुरूर मेरी नब्ज़ों का तरन्नुम मिरे नग़्मों की पुकार मेरे शे'रों की सजावट मिरे गीतों का सिंगार लखनऊ अपना जहाँ सौंप चला हूँ तुझ को अपना हर ख़्वाब-ए-जवाँ सौंप चला हूँ तुझ को अपना सरमाया-ए-जाँ सौंप चला हूँ तुझ को लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा दफ़्न हैं इस में मोहब्बत के ख़ज़ाने कितने एक उनवान में मुज़्मर हैं फ़साने कितने इक बहन अपनी रिफ़ाक़त की क़सम खाए हुए एक माँ मर के भी सीने में लिए माँ का गुदाज़ अपने बच्चों के लड़कपन को कलेजे से लगाए अपने खिलते हुए मासूम शगूफ़ों के लिए बंद आँखों में बहारों के जवाँ ख़्वाब बसाए ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा एक साथी भी तह-ए-ख़ाक यहाँ सोती है अरसा-ए-दहर की बे-रहम कशाकश का शिकार जान दे कर भी ज़माने से न माने हुए हार अपने तेवर में वही अज़्म-ए-जवाँ-साल लिए ये मिरे प्यार का मदफ़न ही नहीं है तन्हा देख इक शम-ए-सर-ए-राह-गुज़र चलती है जगमगाता है अगर कोई निशान-ए-मंज़िल ज़िंदगी और भी कुछ तेज़ क़दम चलती है लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन देख इस ख़्वाब-गह-ए-नाज़ पे कल मौज-ए-सबा ले के नौ-रोज़-ए-बहाराँ की ख़बर आएगी सुर्ख़ फूलों का बड़े नाज़ से गूँधे हुए हार कल इसी ख़ाक पे गुल-रंग सहर आएगी कल इसी ख़ाक के ज़र्रों में समा जाएगा रंग कल मिरे प्यार की तस्वीर उभर आएगी ऐ मिरी रूह-ए-चमन ख़ाक-ए-लहद से तेरी आज भी मुझ को तिरे प्यार की बू आती है ज़ख़्म सीने के महकते हैं तिरी ख़ुश्बू से वो महक है कि मिरी साँस घुटी जाती है मुझ से क्या बात बनाएगी ज़माने की जफ़ा मौत ख़ुद आँख मिलाते हुए शरमाती है मैं और इन आँखों से देखूँ तुझे पैवंद-ए-ज़मीं इस क़दर ज़ुल्म नहीं हाए नहीं हाए नहीं कोई ऐ काश बुझा दे मिरी आँखों के दिए छीन ले मुझ से कोई काश निगाहें मेरी ऐ मिरी शम-ए-वफ़ा ऐ मिरी मंज़िल के चराग़ आज तारीक हुई जाती हैं राहें मेरी तुझ को रोऊँ भी तो क्या रोऊँ कि इन आँखों में अश्क पत्थर की तरह जम से गए हैं मेरे ज़िंदगी अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल ही सही एक लम्हे को क़दम थम से गए हैं मेरे फिर भी इस अर्सा-गह-ए-जोहद-ए-मुसलसल से मुझे कोई आवाज़ पे आवाज़ दिए जाता है आज सोता ही तुझे छोड़ के जाना होगा नाज़ ये भी ग़म-ए-दौराँ का उठाना होगा ज़िंदगी देख मुझे हुक्म-ए-सफ़र देती है इक दिल-ए-शोला-ब-जाँ साथ लिए जाता हूँ हर क़दम तू ने कभी अज़्म-ए-जवाँ बख़्शा था! मैं वही अज़्म-ए-जवाँ साथ लिए जाता हूँ चूम कर आज तिरी ख़ाक-ए-लहद के ज़र्रे अन-गिनत फूल मोहब्बत के चढ़ाता जाऊँ जाने इस सम्त कभी मेरा गुज़र हो कि न हो आख़िरी बार गले तुझ को लगाता जाऊँ लखनऊ मेरे वतन मेरे चमन-ज़ार वतन देख इस ख़ाक को आँखों में बसा कर रखना इस अमानत को कलेजे से लगा कर रखना — Jaan Nisar Akhtar
तुम मिरी ज़िंदगी में आई हो मेरा इक पाँव जब रिकाब में है दिल की धड़कन है डूबने के क़रीब साँस हर लहजा पेच-ओ-ताब में है टूटते बे-ख़रोश तारों की आख़िरी कपकपी रुबाब में है कोई मंज़िल न जादा-ए-मंज़िल रास्ता गुम किसी सराब में है तुम को चाहा किया ख़यालों में तुम को पाया भी जैसे ख़्वाब में है तुम मिरी ज़िंदगी में आई हो मेरा इक पाँव जब रिकाब में है मैं सोचता था कि तुम आओगी तुम्हें पा कर मैं इस जहान के दुख-दर्द भूल जाऊँगा गले में डाल के बाँहें जो झूल जाओगी मैं आसमान के तारे भी तोड़ लाऊँगा तुम एक बेल की मानिंद बढ़ती जाओगी न छू सकेंगी हवादिस की आँधियाँ तुम को मैं अपनी जान पे सौ आफ़तें उठा लूँगा छुपा के रक्खूँगा बाँहों के दरमियाँ तुम को मगर मैं आज बहुत दूर जाने वाला हूँ बस और चंद नफ़स को तुम्हारे पास हूँ मैं तुम्हें जो पा के ख़ुशी है तुम उस ख़ुशी पे न जाओ तुम्हें ये इल्म नहीं किस क़दर उदास हूँ मैं क्या तुम को ख़बर इस दुनिया की क्या तुम को पता इस दुनिया का मासूम दिलों को दुख देना शेवा है इस दुनिया का ग़म अपना नहीं ग़म इस का है कल जाने तुम्हारा क्या होगा परवान चढ़ोगी तुम कैसे जीने का सहारा क्या होगा आओ कि तरसती बाँहों में इक बार तो तुम को भर लूँ मैं कल तुम जो बड़ी हो जाओगी जब तुम को शुऊर आ जाएगा कितने ही सवालों का धारा एहसास से टकरा जाएगा सोचोगी कि दुनिया तबक़ों में तक़्सीम है क्यूँँ ये फेर है क्या इंसान का इंसाँ बैरी है ये ज़ुल्म है क्या अंधेर है क्या ये नस्ल है क्या ये ज़ात है क्या ये नफ़रत की ता'लीम है क्यूँँ दौलत तो बहुत है मुल्कों में दौलत की मगर तक़्सीम है क्यूँँ तारीख़ बताएगी तुम को इंसाँ से कहाँ पर भूल हुई सरमाए के हाथों लोगों की किस तरह मोहब्बत धूल हुई सदियों से बराबर मेहनत-कश हालात से लड़ते आए हैं छाई है जो अब तक धरती पर उस रात से लड़ते आए हैं दुनिया से अभी तक मिट न सका पर राज इजारा-दारी का ग़ुर्बत है वही अफ़्लास वही रोना है वही बेकारी का मेहनत की अभी तक क़द्र नहीं मेहनत का अभी तक मोल नहीं ढूँडे नहीं मिलतीं वो आँखें जो आँखें हो कश्कोल नहीं सोचा था कि कल इस धरती पर इक रंग नया छा जाएगा इंसान हज़ार बरसों की मेहनत का समर पा जाएगा जीने का बराबर हक़ सब को जब मिलता वो पल आ न सका जिस कल की ख़ातिर जीते-जी मरते रहे वो कल आ न सका लेकिन ये लड़ाई ख़त्म नहीं ये जंग न होगी बंद कभी सौ ज़ख़्म भी खा कर मैदाँ से हटते नहीं जुरअत-मंद कभी वो वक़्त कभी तो आएगा जब दिल के चमन लहराएँगे मर जाऊँ तो क्या मरने से मिरे ये ख़्वाब नहीं मर जाएँगे ये ख़्वाब ही मेरी दौलत हैं ये ख़्वाब तुम्हें दे जाऊँगा इस दहर में जीने मरने के आदाब तुम्हें दे जाऊँगा मुमकिन है कि ये दुनिया की रविश पल भर को तुम्हारा साथ न दे काँटों ही का तोहफ़ा नज़्र करे फूलों की कोई सौग़ात न दे मुमकिन है तुम्हारे रस्ते में हर ज़ुल्म-ओ-सितम दीवार बने सीने में दहकते शो'ले हों हर साँस कोई आज़ार बने ऐसे में न खुल कर रह जाना अश्कों से न आँचल भर लेना ग़म आप बड़ी इक ताक़त है ये ताक़त बस में कर लेना हो अज़्म तो लौ दे उठता है हर ज़ख़्म सुलगते सीने का जो अपना हक़ ख़ुद छीन सके मिलता है उसे हक़ जीने का लेकिन ये हमेशा याद रहे इक फ़र्द की ताक़त कुछ भी नहीं जो भी हो अकेले इंसाँ से दुनिया की बग़ावत कुछ भी नहीं तन्हा जो किसी को पाएँगे ताक़त के शिकंजे जकड़ेंगे सौ हाथ उठेंगे जब मिल कर दुनिया का गरेबाँ पकड़ेंगे इंसान वही है ताबिंदा उस राज़ से जिस का सीना है औरों के लिए तो जीना ही ख़ुद अपने लिए भी जीना है जीने की हर तरह से तमन्ना हसीन है हर शर के बावजूद ये दुनिया हसीन है दरिया की तुंद बाढ़ भयानक सही मगर तूफ़ाँ से खेलता हुआ तिनका हसीन है सहरा का हर सुकूत डराता रहे तो क्या जंगल को काटता हुआ रस्ता हसीन है दिल को हिलाए लाख घटाओं की घन-गरज मिट्टी पे जो गिरा है वो क़तरा हसीन है दहशत दिला रही हैं चटानें तो क्या हुआ पत्थर में जो सनम है वो कितना हसीन है रातों की तीरगी है जो पुर-हौल ग़म नहीं सुब्हों का झाँकता हुआ चेहरा हसीन है हों लाख कोहसार भी हाएल तो क्या हुआ पल पल चमक रहा है जो तेशा हसीन है लाखों सऊबतों का अगर सामना भी हो हर ज़ोहद हर अमल का तक़ाज़ा हसीन है चमन से चंद ही काँटे मैं चुन सका लेकिन बड़ी है बात जो तुम रंग-ए-गुल निखार सको ये दूर दौर-ए-जहाँ काश तुम को रास आए तुम इस ज़मीन को कुछ और भी सँवार सको अमल तुम्हारा ये तौफ़ीक़ दे सके तुम को कि ज़िंदगी का हर इक क़र्ज़ तुम उतार सको सफ़र हयात का आसान हो ही जाता है अगर हो दिल को सहारा किसी की चाहत का वो प्यार जिस में न हो अक़्ल ओ दिल की यक-जेहती किसी तरीक़ से जज़्बा नहीं मोहब्बत का हज़ारों साल में तहज़ीब-ए-जिस्म निखरी है बजा कि जिंस तक़ाज़ा है एक फ़ितरत का तुम्हें कल अपने शरीक-ए-सफ़र को चुनना है वो जिस से तुम को मोहब्बत मिले रिफ़ाक़त भी हज़ार एक हों दो ज़ेहन मुख़्तलिफ़ होंगे ये बात तल्ख़ है लेकिन है ऐन-फ़ितरत भी बहुत हसीन है ज़ेहनी मुफ़ाहमत लेकिन बड़ी अज़ीम है आदर्श की हिफ़ाज़त भी कभी ये गुल भी नज़र को फ़रेब देते हैं हर एक फूल में तमईज़-ए-रंग-ओ-बू रखना ख़याल जिस का गुज़र-गाह-ए-सद-बहाराँ है हर इक क़दम उसी मंज़िल की आरज़ू रखना कोई भी फ़र्ज़ हो ख़्वाहिश से फिर भी बरतर है तमाम उम्र फ़राएज़ की आबरू रखना तुम एक ऐसे घराने की लाज हो जिस ने हर एक दौर को तहज़ीब ओ आगही दी है तमाम मंतिक़ ओ हिकमत तमाम इल्म ओ अदब चराग़ बन के ज़माने को रौशनी दी है जिला-वतन हुए आज़ादी-ए-वतन के लिए मरे तो ऐसे कि औरों को ज़िंदगी दी है ग़म-ए-हयात से लड़ते गुज़ार दी मैं ने मगर ये ग़म है तुम्हें कुछ ख़ुशी न दे पाया वो प्यार जिस से लड़कपन के दिन महक उट्ठें वो प्यार भी मैं तुम्हें दो घड़ी न दे पाया मैं जानता हूँ कि हालात साज़गार न थे मगर मैं ख़ुद को तसल्ली कभी न दे पाया ये मेरी नज़्म मिरा प्यार है तुम्हारे लिए ये शे'र तुम को मिरी रूह का पता देंगे यही तुम्हें मिरे अज़्म ओ अमल की देंगे ख़बर यही तुम्हें मिरी मजबूरियाँ बता देंगे कभी जो ग़म के अँधेरे में डगमगाओगी तुम्हारी राह में कितने दिए जला देंगे अब मिरे पास और वक़्त नहीं साँस हर लहजा इज़्तिराब में है लर्ज़ां लर्ज़ां कोई धुँदलका सा डूबते ज़र्द आफ़्ताब में है मौत को किस लिए हिजाब कहें किस को मालूम क्या हिजाब में है जिस्म-ओ-जाँ का ये आरज़ी रिश्ता कितना मिलता हुआ हुबाब में है आज जो है वो कल नहीं होगा आदमी कौन से हिसाब में है ख़ुद ज़माने बदलते रहते हैं ज़िंदगी सिर्फ़ इंक़लाब में है आओ आँखों में डाल दो आँखें रूह अब नज़'अ के अज़ाब में है थरथराता हुआ तुम्हारा अक्स कब से इस दीदा-ए-पुर-आब में है रौशनी देर से आँखों की बुझी जाती है ठीक से कुछ भी दिखाई नहीं देता मुझ को एक चेहरा मिरे चेहरे पे झुका आता है कौन है ये भी सुझाई नहीं देता मुझ को सिर्फ़ सन्नाटे की आवाज़ चली आती है और तो कुछ भी सुनाई नहीं देता मुझ को आओ उस चाँद से माथे को ज़रा चूम तो लूँ फिर न होगा तुम्हें ये प्यार नसीब आ जाओ आख़िरी लम्हा है सीने पे मिरे सर रख दो दिल की हालत हुई जाती है अजीब आ जाओ न अइज़्ज़ा न अहिब्बा न ख़ुदा है न रसूल कोई इस वक़्त नहीं मेरे क़रीब आ जाओ तुम तो क़रीब आ जाओ! — Jaan Nisar Akhtar
कितने दिन में आए हो साथी मेरे सोते भाग जगाने मुझ से अलग इस एक बरस में क्या क्या बीती तुम पे न जाने देखो कितने थक से गए हो कितनी थकन आँखों में घुली है आओ तुम्हारे वास्ते साथी अब भी मिरी आग़ोश खुली है चुप हो क्यूँँ? क्या सोच रहे हो आओ सब कुछ आज भुला दो आओ अपने प्यारे साथी फिर से मुझे इक बार जिला दो बोलो साथी कुछ तो बोलो कब तक आख़िर आह भरूँगी तुम ने मुझ पर नाज़ किए हैं आज मैं तुम से नाज़ करूँँगी आओ मैं तुम से रूठ सी जाऊँ आओ मुझे तुम हँस के मना लो मुझ में सच-मुच जान नहीं है आओ मुझे हाथों पे उठा लो तुम को मेरा ग़म है साथी कैसे अब इस ग़म को भुलाऊँ अपना खोया जीवन बोलो आज कहाँ से ढूँड के लाऊँ ये न समझना मेरे साजन दे न सकी मैं साथ तुम्हारा ये न समझना मेरे दिल को आज तुम्हारा दुख है गवारा ये न समझना मैं ने तुम से जान के यूँँ मुँह मोड़ लिया है ये न समझना मैं ने तुम से दिल का नाता तोड़ लिया है ये न समझना तुम से मैं ने आज किया है कोई बहाना दुनिया मुझ से रूठ चुकी है साथी तुम भी रूठ न जाना आज भी साजन मैं हूँ तुम्हारी आज भी तुम हो मेरे अपने आज भी इन आँखों में बसे हैं प्यारे के अनमिट गहरे सपने दिल की धड़कन डूब भी जाए दिल की सदाएँ थक न सकेंगी मिट भी जाऊँ फिर भी तुम से मेरी वफ़ाएँ थक न सकेंगी ये तो पूछो मुझ से छुट कर तेरे दिल पर क्या क्या गुज़री तुम बिन मेरी नाव तो साजन ऐसी डूबी फिर न उभरी एक तुम्हारा प्यार बचा है वर्ना सब कुछ लुट सा गया है एक मुसलसल रात कि जिस में आज मिरा दम घुट सा गया है आज तुम्हारा रस्ता तकते मैं ने पूरा साल बिताया कितने तूफ़ानों की ज़द पर मैं ने अपना दीप जलाया तुम बिन सारे मौसम बीते आए झोंके सर्द हवा के नर्म गुलाबी जाड़े गुज़रे मेरे दिल में आग लगा के सावन आया धूम मचाता घिर-घिर काले बादल छाए मेरे दिल पर जम से गए हैं जाने कितने गहरे साए चाँद से जब भी बादल गुज़रा दिल से गुज़रा अक्स तुम्हारा फूल जो चटके मैं ने जाना तुम ने शायद मुझ को पुकारा आईं बहारें मुझ को मनाने तुम बिन मैं तो मुँह न बोली लाख फ़ज़ा में गीत से गूँजे लेकिन मैं ने आँख न खोली कितनी निखरी सुब्हें गुज़रीं कितनी महकी शा में छाईं मेरे दिल को दूर से तकने जाने कितनी यादें आईं इतनी मुद्दत ब'अद तो प्रीतम आज कली हृदय की खिली है कितनी रातें जाग के साजन आज मुझे ये रात मिली है बोलो साथी कुछ तो बोलो कुछ तो दिल की बात बताओ आज भी मुझ से दूर रहोगे आओ मिरे नज़दीक तो आओ आओ मैं तुम को बहला लूँगी बैठ तो जाओ मेरे सहारे आज तुम्हें क्यूँँ ग़म है बोलो आज तो मैं हूँ पास तुम्हारे अच्छा मेरा ग़म न भुलाओ मेरा ग़म हर ग़म में समोलो इस से अच्छी बात न होगी ये तो तुम्हें मंज़ूर है बोलो मेरे ग़म को मेरे शाएर अपने जवाँ गीतों में रचा लो मेरे ग़म को मेरे शाएर सारे जग की आग बना लो मेरे ग़म की आँच से साथी चौंक उठेगा अज़्म तुम्हारा बात तो जब है लाखों दिल को छू ले अपने प्यार का धारा मैं जो तुम्हारे साथ नहीं हूँ दिल को मत मायूस करो तुम तुम हो तन्हा तुम हो अकेले ऐसा क्यूँँ महसूस करो तुम आज हमारे लाखों साथी साथी हिम्मत हार न जाओ आज करोड़ों हाथ बढ़ेंगे एक ज़रा तुम हाथ बढ़ाओ अच्छा अब तो हँस दो साथी वर्ना देखो रो सी पड़ूँगी बोलो साथी कुछ तो बोलो आज मैं सच-मुच तुम से लड़ूँगी जाग उठी लो दुनिया मेरी आई हँसी वो लब पे तुम्हारे देखो देखो मेरी जानिब दौड़ पड़े हैं चाँद सितारे झिलमिल झिलमिल किरनें आईं मुझ को चंदन-हार पहनाने जगमग जगमग तारे आए फिर से मेरी माँग सजाने आईं हवाएँ झाँझ बजाती गीतों मोरा अंगना जागा मोरे माथे झूमर दमका मोरे हाथों कंगना जागा जाग उठा है सारा आलम जाग उठी है रात मिलन की आओ ज़मीं की गोद में साजन सज सजी है आज दुल्हन की आओ जाती रात है साथी प्यार तुम्हारा दिल में भर लूँ आओ तुम्हारी गोद में साजन थक कर आँखें बंद सी कर लूँ उट्ठो साथी दूर उफ़ुक़ का नर्म किनारा काँप उठा है मेरे दिल की धड़कन बन कर सुब्ह का तारा काँप उठा है दिल की धड़कन डूब के रह जा जागी नबज़ो थम सी जाओ फिर से मेरी बे-नम आँखों पत्थर बन कर जम सी जाओ मेरे ग़म का ग़म न करो तुम अच्छा अब से ग़म न करूँँगी मेरे इरादों वाले साथी जाओ मैं हिम्मत कम न करूँँगी तुम को हँस कर रुख़्सत कर दूँ सब कुछ मैं ने हँस के सहा है तुम बिन मुझ में कुछ न रहेगा यूँँ भी अब क्या ख़ाक रहा है देखो! कितने काम पड़े हैं अच्छा अब मत देर करो तुम कैसे जम कर रह से गए हो इतना मत अंधेर करो तुम बोलो तुम को कैसे रोकूँ दुनिया सौ इल्ज़ाम धरेगी ऐसे पागल प्यार को साथी सारी ख़िल्क़त नाम धरेगी आओ मैं उलझे बाल संवारूँ मुझ से कोई काम तो ले लो फिर से गले इक बार लगा के प्यार से मेरा नाम तो ले लो अच्छा साथी! जाओ सिधारो अब की इतने दिन न लगाना प्यासी आँखें राह तकेंगी! लेकिन ठहरो ठहरो साथी दिल को ज़रा तय्यार तो कर लूँ आओ मिरे परदेसी साजन! आओ मैं तुम को प्यार तो कर लूँ — Jaan Nisar Akhtar