आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
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जिस्म की हर बात है आवारगी ये मत कहो
हम भी कर सकते हैं ऐसी शा'इरी ये मत कहो
हम भी कर सकते हैं ऐसी शा'इरी ये मत कहो
उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो
एक सी होती है हर इक रागनी ये मत कहो
हम से दीवानों के बिन दुनिया सँवरती किस तरह
अक़्ल के आगे है क्या दीवानगी ये मत कहो
कट सकी हैं आज तक सोने की ज़ंजीरें कहाँ
हम भी अब आज़ाद हैं यारो अभी ये मत कहो
पाँव इतने तेज़ हैं उठते नज़र आते नहीं
आज थक कर रह गया है आदमी ये मत कहो
जितने वादे कल थे उतने आज भी मौजूद हैं
उन के वादों में हुई है कुछ कमी ये मत कहो
दिल में अपने दर्द की छिटकी हुई है चाँदनी
हर तरफ़ फैली हुई है तीरगी ये मत कहो
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Jaan Nisar Akhtar
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सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी
तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी
उन से यही कह आएँ कि अब हम न मिलेंगे
आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात बनेगी
ऐ नावक-ए-ग़म दिल में है इक बूँद लहू की
कुछ और तो क्या हम से मुदारात बनेगी
ये हम से न होगा कि किसी एक को चाहें
ऐ इश्क़ हमारी न तिरे सात बनेगी
ये क्या है कि बढ़ते चलो बढ़ते चलो आगे
जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी
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लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
हाए उस वक़्त को कोसूँ कि दुआ दूँ यारो
जिस ने हर दर्द मिरा छीन लिया है मुझ से
दिल का ये हाल कि धड़के ही चला जाता है
ऐसा लगता है कोई जुर्म हुआ है मुझ से
खो गया आज कहाँ रिज़्क़ का देने वाला
कोई रोटी जो खड़ा माँग रहा है मुझ से
अब मिरे क़त्ल की तदबीर तो करनी होगी
कौन सा राज़ है तेरा जो छुपा है मुझ से
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आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो
जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो
संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो
ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो
जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो
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लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
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अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं
देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
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