साँस लेती हूँ तो यूँ महसूस होता है मुझे
    जैसे मेरे दिल की हर धड़कन में शामिल आप हैं
    Jaan Nisar Akhtar
    53 Likes
    जिस्म की हर बात है आवारगी ये मत कहो
    हम भी कर सकते हैं ऐसी शायरी ये मत कहो

    उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो
    एक सी होती है हर इक रागनी ये मत कहो

    हम से दीवानों के बिन दुनिया सँवरती किस तरह
    अक़्ल के आगे है क्या दीवानगी ये मत कहो

    कट सकी हैं आज तक सोने की ज़ंजीरें कहाँ
    हम भी अब आज़ाद हैं यारो अभी ये मत कहो

    पाँव इतने तेज़ हैं उठते नज़र आते नहीं
    आज थक कर रह गया है आदमी ये मत कहो

    जितने वादे कल थे उतने आज भी मौजूद हैं
    उन के वादों में हुई है कुछ कमी ये मत कहो

    दिल में अपने दर्द की छिटकी हुई है चाँदनी
    हर तरफ़ फैली हुई है तीरगी ये मत कहो
    Read Full
    Jaan Nisar Akhtar
    2 Likes
    तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है
    तुझे अलग से जो सोचूँ अजीब लगता है

    जिसे न हुस्न से मतलब न इश्क़ से सरोकार
    वो शख़्स मुझ को बहुत बद-नसीब लगता है

    हुदूद-ए-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा
    न कोई ग़ैर न कोई रक़ीब लगता है

    ये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस
    कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है

    उफ़ुक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा
    मुझे चराग़-ए-दयार-ए-हबीब लगता है
    Read Full
    Jaan Nisar Akhtar
    1 Like
    सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी
    तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी

    उन से यही कह आएँ कि अब हम न मिलेंगे
    आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात बनेगी

    ऐ नावक-ए-ग़म दिल में है इक बूँद लहू की
    कुछ और तो क्या हम से मुदारात बनेगी

    ये हम से न होगा कि किसी एक को चाहें
    ऐ इश्क़ हमारी न तिरे सात बनेगी

    ये क्या है कि बढ़ते चलो बढ़ते चलो आगे
    जब बैठ के सोचेंगे तो कुछ बात बनेगी
    Read Full
    Jaan Nisar Akhtar
    1 Like
    लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से
    तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से

    हाए उस वक़्त को कोसूँ कि दुआ दूँ यारो
    जिस ने हर दर्द मिरा छीन लिया है मुझ से

    दिल का ये हाल कि धड़के ही चला जाता है
    ऐसा लगता है कोई जुर्म हुआ है मुझ से

    खो गया आज कहाँ रिज़्क़ का देने वाला
    कोई रोटी जो खड़ा माँग रहा है मुझ से

    अब मिरे क़त्ल की तदबीर तो करनी होगी
    कौन सा राज़ है तेरा जो छुपा है मुझ से
    Read Full
    Jaan Nisar Akhtar
    1 Like
    हम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह
    हम ने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह

    ख़ुद-ब-ख़ुद नींद सी आँखों में घुली जाती है
    महकी महकी है शब-ए-ग़म तिरे बालों की तरह

    तेरे बिन रात के हाथों पे ये तारों के अयाग़
    ख़ूब-सूरत हैं मगर ज़हर के प्यालों की तरह

    और क्या इस से ज़ियादा कोई नरमी बरतूँ
    दिल के ज़ख़्मों को छुआ है तिरे गालों की तरह

    गुनगुनाते हुए और आ कभी उन सीनों में
    तेरी ख़ातिर जो महकते हैं शिवालों की तरह

    तेरी ज़ुल्फ़ें तिरी आँखें तिरे अबरू तिरे लब
    अब भी मशहूर हैं दुनिया में मिसालों की तरह

    हम से मायूस न हो ऐ शब-ए-दौराँ कि अभी
    दिल में कुछ दर्द चमकते हैं उजालों की तरह

    मुझ से नज़रें तो मिलाओ कि हज़ारों चेहरे
    मेरी आँखों में सुलगते हैं सवालों की तरह

    और तो मुझ को मिला क्या मिरी मेहनत का सिला
    चंद सिक्के हैं मिरे हाथ में छालों की तरह

    जुस्तुजू ने किसी मंज़िल पे ठहरने न दिया
    हम भटकते रहे आवारा ख़यालों की तरह

    ज़िंदगी जिस को तेरा प्यार मिला वो जाने
    हम तो नाकाम रहे चाहने वालों की तरह
    Read Full
    Jaan Nisar Akhtar
    3 Likes
    आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो
    साया कोई लहराए तो लगता है कि तुम हो

    जब शाख़ कोई हाथ लगाते ही चमन में
    शरमाए लचक जाए तो लगता है कि तुम हो

    संदल से महकती हुई पुर-कैफ़ हवा का
    झोंका कोई टकराए तो लगता है कि तुम हो

    ओढ़े हुए तारों की चमकती हुई चादर
    नद्दी कोई बल खाए तो लगता है कि तुम हो

    जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर
    चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो
    Read Full
    Jaan Nisar Akhtar
    4 Likes
    ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
    इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
    Jaan Nisar Akhtar
    67 Likes
    लोग कहते हैं कि तू अब भी ख़फ़ा है मुझ से
    तेरी आँखों ने तो कुछ और कहा है मुझ से
    Jaan Nisar Akhtar
    35 Likes
    अशआ'र मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं
    कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं

    अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें
    कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं

    सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की
    वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं

    आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे
    ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं

    देखूँ तेरे हाथों को तो लगता है तेरे हाथ
    मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं

    ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
    इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं
    Read Full
    Jaan Nisar Akhtar
    28 Likes

Top 10 of Similar Writers