ye kaam dono taraf hua hai | ये काम दोनों तरफ़ हुआ है

  - Shariq Kaifi

ये काम दोनों तरफ़ हुआ है
उसे भी आदत पड़ी है मेरी

  - Shariq Kaifi

Aadat Shayari

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    दुखी रहने की आदत यूंँ बना ली है कि अब कोई
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    मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी
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    एक दिन हम अचानक बड़े हो गए
    खेल में दौड़कर उसको छूते हुए
    Shariq Kaifi
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    ले आया मुझे मेरा तमाशाई यहाँ तक

    रस्ता हो अगर याद तो घर लौट भी जाऊँ
    लाई थी किसी और की बीनाई यहाँ तक

    शायद तह-ए-दरिया में छुपा था कहीं सहरा
    मेरी ही नज़र देख नहीं पाई यहाँ तक

    महफ़िल में भी तन्हाई ने पीछा नहीं छोड़ा
    घर में न मिला मैं तो चली आई यहाँ तक

    सहरा है तो सहरा की तरह पेश भी आए
    आया है इसी शौक़ में सौदाई यहाँ तक

    इक खेल था और खेल में सोचा भी नहीं था
    जुड़ जाएगा मुझ से वो तमाशाई यहाँ तक

    ये उम्र है जो उस की ख़ता-वार है 'शारिक़'
    रहती ही नहीं बातों में सच्चाई यहाँ तक
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    सब यार मेरे ख़ूब कमाने में लगे थे
    हम पिछली कमाई को लुटाने में लगे थे

    वो छत भी गई सर से जो दुनिया थी हमारी
    हम कौन सी दुनिया को बचाने में लगे थे

    रोने को जिन्हें आज सजाई है ये महफ़िल
    अच्छे वो किसी और ज़माने में लगे थे

    किस सच का उन्हें सामना करने से था इंकार
    क्यों लोग मिरा झूठ छुपाने में लगे थे

    मा'सूम थे इतने कि जुदा होने के दिन भी
    फूलों से तेरे घर को सजाने में लगे थे

    बैठे थे सभी दिल के दरीचों को किए बंद
    और घर को हवा-दार बनाने में लगे थे

    मैं किस को वहाँ क़ैद की रूदाद सुनाता
    सब अपने गिरफ़्तार गिनाने में लगे थे
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    Shariq Kaifi
    शिकारी से बचने में कैसा कमाल
    निशाने पे रहना बड़ी बात है
    Shariq Kaifi
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    बीनाई भी क्या क्या धोके देती है
    दूर से देखो सारे दरिया नीले हैं

    सहरा में भी गाऊँ का दरिया साथ रहा
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    Shariq Kaifi

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