ज़िन्दगी, यूँँ भी गुज़ारी जा रही हैजैसे, कोई जंग हारी जा रही हैजिस जगह पहले से ज़ख़्मों के निशां थेफिर वहीं पे चोट मारी जा रही है— Azm Shakri