लाखों सद
में ढेरों ग़म, फिर भी नहीं हैं आँखें नम
इक मुद्दत से रोए नहीं, क्या पत्थर के हो गए हम
यूँ पलकों पे हैं आँसू, जैसे फूलों पर शबनम
ख़्वाब में वो आ जाते हैं, इतना तो रखते हैं भरम
हम उस बस्ती में हैं जहाँ, धूप ज़ियादा साए कम
अब ज़ख़्मों में ताब नहीं, अब क्यूँ लाए हो मरहम
— Azm Shakri















