सुलग रहे थे शजर दिल तमाम भँवरों केदिल अपना वार रहा था कोई रुख़-ए-गुल परबहुत मलाल हुआ देख कर गुलिस्ताँ मेंतमाचा मार रहा था कोई रुख़-ए-गुल पर— Shajar Abbas