Shajar Abbas

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Shajar Abbas shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Shajar Abbas's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तस्लीम कैसे कर लूँ किसी को तेरी जगह दुनिया में तेरा कोई भी नेमुल-बदल नहीं — Shajar Abbas
यक़ीं है हम भी किसी रोज़ तुझ पे शहर-ए-सुख़न जनाब-ए-मीर की मानिंद ग़ालिब आएँगे — Shajar Abbas
छीन ली है मुझ सेे तेरे हिज्र ने दानिशवरी अब मैं ख़ुद से पूछता हूँ आख़िरश मैं कौन हूँ — Shajar Abbas
अहल-ए-नज़र दें मिल के मिरे हौसले की दाद परवाज़ कर रहा हूँ बिना बाल-ओ-पर के मैं — Shajar Abbas
ज़ीस्त जब मौत की आग़ोश में सो जाएगी हर हक़ीक़त मिरी इक वाक़िआ' हो जाएगी — Shajar Abbas
हाँ हमीं हैं वो बद-नसीब शजर जिस का कोई नहीं रफ़ीक़-ए-सफ़र — Shajar Abbas
बाँटने ग़म कोई नहीं आया हज़ उठाने हज़ार आए हैं — Shajar Abbas
उज़्न में कौकब को पहने माह पर टाके क़मर उस को कहना सब ये उस के ज़ेवरात-ए-हुस्न हैं — Shajar Abbas
दिल में तेरे अगर है हुब्ब-ए-वतन जश्न-ए-जमहूरियत में शामिल हो — Shajar Abbas
वक़्त-ए-मुश्किल में हूँ इमदाद करो कुछ मेरी उम्र भर आप का एहसान नहीं भूलूँगा — Shajar Abbas
दिल-ए-नादाँ इसे तस्लीम कर ले ग़म-ए-हस्ती रफ़ीक़-ए-ज़िंदगी है — Shajar Abbas
मुसलसल सोचते हैं हम-सफ़र में तलाश-ए-हम-सफ़र कब पूरी होगी — Shajar Abbas
रौनक़-ए-शहर-ए-सुख़न ताज़ा सुख़न-दान हैं हम मीर-ओ-ग़ालिब की तरह साहिब-ए-दीवान हैं हम — Shajar Abbas
ख़ुद बे-वफ़ाई कर के सितमगर ने इश्क़ में इल्ज़ाम-ए-बे-वफ़ाई मिरे सर पे रख दिया — Shajar Abbas

Ghazal

बिछड़ गए तो तमाशा नहीं किया हम ने तुम्हें जमाने में रुसवा नहीं किया हम ने तुम्हारे दिल से नज़र फेर कर चले आए तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-काबा नहीं किया हम ने हमारे साथ में धोखा हुआ ब-नाम-ए-शग़फ़ किसी के साथ में धोखा नहीं किया हम ने तुम्हारी ज़ीस्त जुड़ी है हमारी ज़ीस्त के साथ यूँँ ख़ुद-कुशी का इरादा नहीं किया हम ने हमारा दिल न झुका दिल से जब तलक वाइज़ ख़ुदा के सामने सज्दा नहीं किया हम ने मिली बुलंदी तो इंसानियत की हद में रहे रिवायतों से किनारा नहीं किया हम ने ख़ुलूस-ए-दिल से निभाए तअल्लुक़ात शजर क़राबतों में दिखावा नहीं किया हम ने — Shajar Abbas
भाई चारे का हसीं गुलदान होना चाहिए अम्न से लबरेज़ हिंदुस्तान होना चाहिए आज हर अहल-ए-नज़र हैरान होना चाहिए हुस्न तेरा नज़्म का उनवान होना चाहिए हिज्र के तूफ़ान हों या वस्ल की बरसात हो मुतमइन हरदम दिल-ए-नादान होना चाहिए दिल धड़क कर दे रहा है मेरे सीने में सदा तुझ को शहर-ए-हुस्न में मेहमान होना चाहिए चुन रहे हैं बैठ कर पलकों से हम फ़ुर्क़त के ख़ार अब तो राह-ए-इश्क़ को आसान होना चाहिए शा'इरी से इश्क़ करने की ये पहली शर्त है पास तेरे मीर का दीवान होना चाहिए क़तरा-ए-शबनम लब-ए-अबरू की ज़ीनत बन गया बज़्म-ए-अहल-ए-दिल में ये ऐलान होना चाहिए मुझ से ये शाना हिलाकर कहता है मेरा ज़मीर तेरे अंदर भी कोई इंसान होना चाहिए इश्क़ से महरूमियत है बद-नसीबी की दलील आप को इस बात का इरफ़ान होना चाहिए हुस्न ख़ुद बे-ताब बैठा है नुमाइश के लिए चश्म-ए-दिल को दीद का अरमान होना चाहिए मैं भी करता हूँ शजर हक़-गोई करने का गुनाह मेरी क़िस्मत में भी तो ज़िंदान होना चाहिए — Shajar Abbas
ये पहला काम रोज़-ए-क़यामत करेंगे हम रब से तेरी जफ़ा की शिकायत करेंगे हम जो ख़्वाब देखते हैं हक़ीक़त करेंगे हम जी भर के आज दश्त में वहशत करेंगे हम बाद-ए-फ़िराक़ दोस्तों हिम्मत करेंगे हम उठ्ठेंगे और फिर से मुहब्बत करेंगे हम आबाद मय-कदों को करेंगे जहान में और मजलिस-ए-फ़िराक़ में शिरकत करेंगे हम फ़रहाद वा'दा करते हैं तुम सेे तुम्हारे बा'द इस बज़्म-ए-आशिक़ी की क़यादत करेंगे हम होंगे निढाल ग़म से सब अहबाब-ओ-अक़रिबा जिस रोज़ अपने गाँव से हिजरत करेंगे हम अज्दाद की रिवायतें रक्खेंगे बर-क़रार ख़ुश हो के नोश जाम-ए-शहादत करेंगे हम भूखा न सोने देंगे यतीम-ओ-यसीर को हाकिम बने तो ऐसी हुकूमत करेंगे हम लैला को दो तसल्ली के हर हाल में शजर लैला तुम्हारे क़ैस की नुसरत करेंगे हम — Shajar Abbas
जब वो याद आते हैं हिज्र भूल जाते हैं अपना दिल जलाते हैं तीरगी मिटाते हैं लोग ज़ुल्म ढाते हैं और मुस्कुराते हैं उन का नाम लेने में होंठ थरथराते हैं चाँद जैसे चेहरे से वो रिदा हटाते हैं उतना याद आते हो जितना हम भुलाते हैं ख़ुद ही ज़ख़्म देते हैं ख़ुद दवा लगाते हैं चोर बनके आँखों से ख़्वाब वो चुराते हैं राह में मुहब्बत की लोग चोट खाते हैं आप की ग़ज़ल नज़्में रोज़ गुनगुनाते हैं सुब्ह ग़म में डूबी है ग़म में डूबी राते हैं आसमाँ के सीने पर तारे टिमटिमाते हैं गुल को चूमते हैं हम ख़ार तिलमिलाते हैं तैर क़ैद-ख़ाने में कैसे चैन पाते हैं आप दिल चुराने का फ़न कहाँ से लाते हैं वो हमें शजर कह कर क्यूँ नहीं बुलाते हैं — Shajar Abbas
दिल अगर हुस्न की तक़लीद पे अड़ जाएगा तो समझ लीजिए तकलीफ़ में पड़ जाएगा इश्क़ का बाग़ है आबाद उजड़ जाएगा तुम सेे बिछड़ा तो शजर ख़ुद से बिछड़ जाएगा रोज़ के जैसे ही ये फिर से हवा का झोंका ख़ाक सहरा की मिरे मुँह पे रगड़ जाएगा देखते रहना मिरे यार ज़मीन-ए-दिल से ख़ैमा-ए-इश्क़ किसी रोज़ उखड़ जाएगा जानता हूँ मैं तुझे अच्छे से जाते जाते ज़ेहन को याद की रस्सी से जकड़ जाएगा आप की ज़ुल्फ़ अगर आई परेशानी में जान-ए-जाँ शहर का माहौल बिगड़ जाएगा चंद रुपयों के लिए ख़ाक सी दौलत के लिए इक बरादर ही बरादर से झगड़ जाएगा प्यार का रोग अगर दिल को तिरे लग जाए जिस्म से दिल के 'शजर' माँस उधड़ जाएगा — Shajar Abbas
ख़ुशी के लम्हें ग़मों में बदल रहे होंगे कहीं पे फूल कहीं दिल कुचल रहे होंगे वो ज़ुल्फ़ें खोल के घर से निकल रहे होंगे हर एक गाम पे मौसम बदल रहे होंगे रह-ए-वफ़ा पे जो हम साथ चल रहे होंगे मुनाफ़िक़ीन की आँखों में खल रहे होंगे गवाही देता है किरदार आप का इस की बुज़ुर्ग आप के सब बा-अमल रहे होंगे कभी न सोचा था हम ज़िंदा लाश के जैसे तुम्हारी डोली के हमराह चल रहे होंगे जो नज़्र-ए-आतिश-ए-हिज्राँ हुए हैं ख़्वाब वो सब दयार-ए-चश्म पे दीपक से जल रहे होंगे कहीं पे होगा वो मसरूफ़ बाग़-बानी में चमन में उस के कई फूल-फल रहे होंगे हमारी तरह शजर क़ल्ब-ए-शाहज़ादी में विसाल-ए-यार के अरमाँ मचल रहे होंगे — Shajar Abbas
शब-ए-फ़ुर्क़त ग़म-ए-फ़ुर्क़त में रोना चाहता हूँ मैं लहू से दामन-ए-दिल को भिगोना चाहता हूँ मैं यूँँ अपने ज़ख़्म में नश्तर चुभोना चाहता हूँ मैं नमक से अपने ज़ख़्म-ए-दिल को धोना चाहता हूँ मैं मुकम्मल इश्क़ का उनवान होना चाहता हूँ मैं कि अपनी ज़ात को तुझ में समोना चाहता हूँ मैं मकान-ए-क़ल्ब में छोटा सा कोना चाहता हूँ मैं जहाँ पर बैठ कर दिन रात रोना चाहता हूँ मैं कमाल-ए-ज़ब्त क्या है इस का मुझ को इल्म हो जाए यूँँ पुश्त-ए-दिल पे बार-ए-हिज्र ढोना चाहता हूँ मैं ज़माना बिस्तर-ए-मख़मल का ख़्वाहिश-मंद है या रब मगर याँ ख़ाक के बिस्तर पे सोना चाहता हूँ मैं न होगा सर-फिरा मुझ सेा कोई भी इस ज़माने में वो जिस को पा लिया है उस को खोना चाहता हूँ मैं जो फ़र्श-ए-ख़ाक पर बिखरी पड़ी है इश्क़ की तस्बीह उसी को फिर से धागे में पिरोना चाहता हूँ मैं ज़माना मेरा होने के लिए बे-ताब है लेकिन ज़माने में तिरा बस तेरा होना चाहता हूँ मैं 'शजर' ख़ुद अपने हाथों से ये आँखों के समुंदर में हसीं ख़्वाबों की कश्ती क्यूँ डुबोना चाहता हूँ मैं — Shajar Abbas
याँ शाह जिस के लिए शाह से लड़ा हुआ है वो तख़्त-ओ-ताज मिरे ज़ेर-ए-पा पड़ा हुआ है रुख़-ए-हसीन है उस का वो उस पे इक तिल है वो माहताब पे कौकब नहीं जड़ा हुआ है जो हो सके तो उठा लाना लाशा-ए-दिल को बुरीदा हाल सर-ए-दश्त वो पड़ा हुआ है ये ज़ख़्म क्या है सितम क्या है मत बताओ उसे जो ज़ख़्म खा के सितम सह के ही बड़ा हुआ है बताओ नज़रों की बातों में आन कर पागल क़ुलूब हुस्न की तक़लीद पर अड़ा हुआ है ख़ुदा तो अम्न का पैग़ाम दे रहा है शजर ख़ुदा के नाम पे फिर क्यूँ जहाँ लड़ा हुआ है सितम की तेज़ हवा आप थक के गिर गई है शजर का हौसला देखो शजर खड़ा हुआ है — Shajar Abbas

Nazm

“ख़त “ मेरी जो भी हालत है ख़त में वो इबारत है आज का जो ये ख़त है ख़त नहीं वसिय्यत है ऐ हबीब इस ख़त को आख़िरी वसिय्यत को इल्तिजा है पढ़ लेना और जवाब लिख देना ख़त पे नाम लिखता हूँ फिर सलाम लिखता हूँ ख़त की इब्तिदा यूँँ हैं लफ़्ज़ ग़म-ज़दा यूँँ हैं कर्ब है अँधेरा है रंज-ओ-ग़म ने घेरा है चार सू क़यामत है ज़िंदगी अज़िय्यत है दिल पे दाग़-ए-फ़ुर्क़त है मेरी ख़स्ता हालत है दर्द-ए-दिल इज़ाफ़ी है जाँ निकलनी बाक़ी है आ कभी अयादत को देख मेरी हालत को जब से तुम से बिछड़ा हूँ ख़ुद से रूठा रहता हूँ करवटे बदलता हूँ मुँह से ख़ूँ उगलता हूँ तुझ को याद करता हूँ रोज़ जीता मरता हूँ साँस लेना मुश्किल है ज़ख़्म की ग़िज़ा दिल है हाल पर तरस खाकर तू गले लगा आ कर दर्द की दवा दे दे अब मुझे शिफ़ा दे दे — Shajar Abbas
“वो हसीन शहज़ादी” वो हसीन शहज़ादी जो मिरी मुहब्बत थी उस की याद में खो कर आँखों से लहू रो कर नज़्म लिख रहा हूँ मैं उस के दूर जाने से जितने ग़म उठाए हैं जितना दर्द झेला है आज नज़्म में सारा दर्द लिख रहा हूँ मैं वो हसीन शहज़ादी जिस का मेरी ग़ज़लों में तुम को ज़िक्र मिलता है जिस के नाम से मेरी ग़ज़ले नूर पाती हैं वो हसीन शहज़ादी जो मिरी मुहब्बत थी उस ने चंद दिन पहले इस हक़ीर दुनिया से दोस्तों विदा ले कर दूसरे ही दुनिया में घर बसा लिया अपना वो हसीन शहज़ादी जो मिरी मुहब्बत थी उस ने इस ज़माने से जिस घड़ी विदा ली थी सिर्फ़ बीस साला थी आओ उस के बारे में आज नज़्म के ज़रिए मैं तुम्हें सराहत से सारे ग़म सुनाता हूँ उस का ख़ाल-ओ-ख़द क्या था मैं तुम्हें बताता हूँ उस ने इस ज़माने से जाते वक़्त जितनी भी चीज़े मुझ को सौंपी थीं सब तुम्हें दिखाता हूँ आओ साथ में आओ वो वहाँ जो चुप चुप सी इक बड़ी सी बस्ती है हम वहाँ पे चलते हैं वो वहाँ जो कोने में तीन चार टीले हैं उस में एक छोटा सा जो उदास टीला है उस की इस ज़माने में आख़िरी निशानी है उस की इस निशानी को जाने क्यूँ जहाँ वाले क़ब्र नाम देते हैं मैं नहीं समझता हूँ क़ब्र किस को को कहते हैं मैं सवाल करता हूँ तुम सेे ऐ मिरे भाई क्या मुझे बताओगे क़ब्र किस को कहते हैं इक मिनट रुको भाई एक चीज़ याद आई मैं हमेशा जिस दम भी इस जगह पे आता हूँ तो हमेशा के जैसे फूल साथ लाता हूँ माज़रत मिरे भाई सिर्फ़ इक मिनट देना वो वहाँ जो गुलशन हैं मैं वहाँ पे जाता हूँ फूल ले के आता हूँ फिर तुम्हें बताऊँगा फूल मैं क्यूँ लाया हूँ हाँ तो अब सुनो भाई फूल मैं यूँँ लाया हूँ वो वहाँ जो गुलशन हैं हम वहाँ पे जाते थे वो हमेशा तोहफ़े में फूल माँगा करती थी और तैश से मुझ सेे फूल ले के कहती थी ऐ शजर इधर देखो मैं जो तुम सेे कहती हूँ बात ज़ेहन में रखना देखो भूल मत जाना मुझ सेे मिलने जब आना फूल साथ में लाना बस यही सबब है अब जब यहाँ पे आता हूँ तो हमेशा गुलशन से फूल साथ लाता हूँ फिर मैं अपने हाथों से फूल रख के टीले पर अश्कबार होता हूँ बे-शुमार रोता हूँ अपनी जान खोता हूँ आज कल मिरे भाई मैं बहुत परेशाँ हूँ किस तरह सुकूँ पाऊँ कैसे दिल को बहलाऊँ कैसे ख़ुद को समझाऊँ सोच कर परेशाँ हूँ वो हसीन शहज़ादी जो मिरी मुहब्बत थी उस के बिन ज़माने में किस तरह जिऊँगा मैं — Shajar Abbas
“कहाँ हो माँ” तुम्हारे बा'द माँ चारों तरफ़ घर में उदासी है ये आँगन उजड़ा उजड़ा है ये आँगन सूना सूना है मुझे अब अपना ये घर मिस्ल-ए-क़ब्रिस्तान लगता है मकाँ में अब मकीं वीरानियाँ होने लगी हैं माँ ये मंज़र देख कर घर का मिरा दम घुटने लगता है मिरे सीने में दिल है दिल के अंदर बे-क़रारी है मिरी आँखों के दर से ख़ून का दरिया निकलता है ज़मीन-ए-लब पे जो पहले ख़ुशी के फूल खिलते थे वो सब मुरझा चुके हैं माँ समझ में ये नहीं आता बयाँ कैसे करूँँ इस को तुम्हारे दूर जाने से जो सदमा दिल पे गुज़रा है जो रंज-ओ-ग़म उठाए हैं जो मैं ने दर्द झेला है बयाँ कैसे करूँँ उस को मिरे लब कपकपाते हैं बदन भी थरथराता है मैं जब बाहरस आ कर घर के अंदर पाँव रखता हूँ तो मेरी नज़रें फ़ौरन घर में उस जानिब को जाती हैं जहाँ तुम बैठा करती थीं जहाँ तुम बैठ कर हर रोज़ मेरी राह तकती थीं मुझे जब वो जगह ख़ाली नज़र आती है मेरी माँ तो मेरे फूल से दिल पर ग़मों की बिजली गिरती है अचानक से बदन पर तेज़ लर्ज़ा तारी होता है ये मेरे पाँ ज़मीं के सद्र पर यूँँ लड़खड़ाते हैं मैं गिर पड़ता हूँ मेरी माँ मैं ग़श खाकर ज़मीं के सद्र पर ही हाल से बे-हाल होकर जान खोता हूँ मुझे जब होश आता है मैं अपने हाल की परवाह नहीं करता हूँ प्यारी माँ तुम्हारे दूर जाने का अलम दिल पर उठा कर मैं मुसलसल ख़ून रोता हूँ गिरेबाँ चाक करता हूँ तमाचे मार कर रुख़ पर मैं रुख़ को लाल करता हूँ मैं तुम को घर के हर हिस्से के अंदर ढूँढ़ता हूँ माँ तुम्हें घर में न पाकर लब से ये फ़िक़रा निकालता है कहाँ हो माँ अगर नाराज़ हो मुझ सेे तो मेरी इल्तिजा है माँ ख़ुदा के वास्ते नाराज़गी को दूर कर दो तुम ख़ुदारा रू-ब-रू आओ मुझे पहले के जैसे अपनी जाँ कह कर सदाएँ दो कहाँ हो माँ मुझे आग़ोश में ले लो मिरी माँ तुम मिरी पहले के जैसे फिर बलाएँ लो मिरी माँ प्यारी माँ फिर मेरी पेशानी पे अपने फूल से होंठों के पाँ फिर नक़्श कर दो तुम मुझे आराम आ जाए बड़ा बैचैन रहता हूँ मिरी माँ मुख़्तसर ये है तुम्हारे दूर जाने से तुम्हारे लाल का इस दुख भरी दुनिया के अंदर एक पल को दिल नहीं लगता तुम्हारी याद में बस बैठ कर मैं रोता रहता हूँ अरे हाँ याद आया माँ तुम्हारे बारे बाबा जान से जब पूछता हूँ मैं मिरे बाबा कहाँ है माँ तो बाबा जान की पलकों पे कुछ मोती नुमा सी शय नज़र आती है प्यारी माँ मैं फिर से पूछता हूँ प्यारे बाबा जाँ कहाँ है माँ तो बाबा पास आते हैं मुझे सीने लगाते हैं वो फिर गोदी में लेते हैं मिरे सर पर वो अपना हाथ रख कर मुझ सेे कहते हैं मिरे लख़्त-ए-जिगर नूर-ए-नज़र दिलबर मिरे हमदम सुनो सर को उठाओ आसमाँ की सिम्त देखो तुम वो जो महताब की करवट में एक रौशन सितारा है तुम्हारी प्यारी माँ है वो — Shajar Abbas
“फ़िलिस्तीनी” सोचता हूँ हर लम्हा ऐ मिरे ख़ुदा वंदा बे गुनाह फ़िलिस्तीनी तिफ़्ल नौ जवाँ बूढ़े बे सबब भला कब तक ऐसे मारे जाएँगे इन सितम रसीदा के ख़ूँ से ज़ुल्म के बानी मुस्कुरा के ओर कब तक ऐसे होली खेलेंगे ऐ मिरे ख़ुदा वंदा और कब तलक ऐसे बे गुनाह लोगों के घर उजाड़े जाएँगे कब तलक यूँँ माँओं से उन की गोद के पाले और छीने जाएँगे बूढ़े बाप मक़्तल से कब तलक जवानों के ख़ूँ में डूबे लाशों को बेबसी के आलम में ऐसे अपने काँधों पर और उठा के लाएँगे इस तरह यतीमी का दाग़ अपने सीने पर ग़मज़दा फ़िलिस्तीनी ऐ मिरे ख़ुदा वंदा कब तलक उठाएँगे सोचता हूँ हर लम्हा ऐ मिरे ख़ुदा वंदा बे गुनाह फ़िलिस्तीनी तिफ़्ल नौ जवाँ बूढ़े बे सबब भला कब तक ऐसे मारे जाएँगे — Shajar Abbas
"तसव्वुर में" आप को मुबारक हो और बहुत मुबारक हो आप के तसव्वुर में खोए खोए रहते हैं गुनगुनाते रहते हैं मुस्कुराते रहते हैं आप को मुबारक हो और बहुत मुबारक हो सुब्ह शाम जान-ए-मन आप के तसव्वुर में बैठ कर गुलिस्ताँ में ग़ज़लें लिखते रहते हैं शे'र कहते रहते हैं नज़्में लिखते रहते हैं आप को मुबारक हो और बहुत मुबारक हो आप के तसव्वुर में खोए खोए रहते हैं इस नए तरीक़े से आन बान लिखते हैं इब्तिदा में काग़ज़ पर लफ़्ज़-ए-जान लिखते हैं संदलीं बदन को हम दो जहान लिखते हैं गुलसितान लिखते हैं आसमान लिखते हैं इस तरह से ज़ुल्फ़ों पे तब्सिरा करे हैं हम ज़ुल्फ़-ए-अम्बरीं हर पल ज़ुल्फ़ को लिखे हैं हम इन हसीन अबरू को आबशार लिखते हैं बे शुमार लिखते हैं बार बार लिखते हैं इस तरह से आँखों की दास्ताँ लिखे हैं हम आप की दो आँखों को कहकशाँ लिखे हैं हम यूँँ नफ़ीस होंठों को जान-ए-जाँ लिखे हैं हम पत्तियाँ लिखे हैं हम तितलियाँ लिखे हैं हम जब नया तसव्वुर में कोई बाब लिखते हैं इस हसीन चेहरे को माहताब लिखते हैं आप को मुबारक हो और बहुत मुबारक हो आप के तसव्वुर में खोए खोए रहते हैं गुनगुनाते रहते हैं मुस्कुराते रहते हैं आप को मुबारक हो और बहुत मुबारक हो — Shajar Abbas
"सवाल" तुम्हीं बताओ मैं कैसे तुम पर यक़ीन कर लूँ तुम्हारे जैसी ही एक लड़की थी तुम से पहले सदा जो हम सेे ये बोलती थी बिना तुम्हारे न जी सकूँगी यक़ीन कर लो ये बात सच है क़सम ख़ुदा की मैं ख़ुद से ज़ियादा यक़ीन करती हूँ यार तुम पर मैं जान दे दूँगी तुम जो कह दो कि जान दे दो गुरेज़ बिल्कुल नहीं करूँँगी मैं मुस्कुरा कर ये जान दूँगी यक़ीन कर लो ये बात सच है मैं चाहती हूँ तुम्हें मैं ख़ुद से क़रीब कर लूँ तुम्हें मैं अपना हबीब कर लूँ अगर हो बस में मिरे तो तुम को मैं अपनी आँखों का नूर कर लूँ तुम्हें मैं धड़कन बना लूँ दिल की तुम्हें मैं अपना हुज़ूर कर लूँ यक़ीन कर लो ये बात सच है बिना तुम्हारे न जी सकूँगी मगर वो इक दिन क़रीब आई क़रीब आ कर वो मुझ से बोली मुआ'फ़ करना कि हम तुम्हारे न हो सकेंगे तुम्हें न अपना बना सकेंगे मुआ'फ़ करना जो हम ने वादे किए थे तुम सेे वफ़ा नहीं कर सकेंगे उन को मुआ'फ़ करना तुम्हारे दिल को दुखा रहे हैं तुम्हें दग़ा दे के जा रहे हैं हैं अपनी ग़लती पे दिल से नादिम मुआ'फ़ कर दो क़सम की ख़ुदा की ख़बर नहीं थी कि ऐसा होगा कि अपने दोनों न मिल सकेंगे क़सम ख़ुदा की यक़ीन कर लो तो तुम सेे वादे कभी न करते कभी न कहते कि जान दे देंगे तुम जो कह दो हबीब तुम को बनाएँगे हम कभी न कहते कभी न कहते तुम्हें बना लेंगे दिल की धड़कन क़सम की ख़ुदा की यक़ीन कर लो कि तुम सेे वादे कभी न करते अगरचे हम को ख़बर ये होती ज़माना हम पर सितम करेगा हमें कभी भी न मिलने देगा क़सम ख़ुदा की तो तुम सेे वादे कभी न करते मुआ'फ़ करना हम आज तुम सेे बिछड़ रहे हैं हमारा दिल तो नहीं हैं लेकिन ज़माने वाले ये चाहते हैं गले लगाया ये हम सेे बोली हमारे बस में नहीं है कुछ भी मुआ'फ़ करना हम अपने वादे निभा न पाए तुम्हें हम अपना बना न पाए हसीन आँखों में अश्क ला कर वो फिर ये बोली अगर बुरा नईं लगे जो तुम को तो चंद बातें कहूँ मैं तुम सेे तो मैं ये बोला तुम्हें इजाज़त है जो भी चाहो वो हम से कह दो तो रोके बोली मैं चाहती हूँ बिछड़ के मुझ सेे सदा ही अपना ख़याल रखना कभी न ख़ुद को निढाल करना कभी न ख़ुद को उदास करना हमारे ग़म में हसीन आँखों को मत भिगोना हमारी फ़ुर्क़त में तुम न रोना हमें ख़ुदा पर यक़ीं है पूरा हर एक मुश्किल वो हल करेगा तुम्हारे सारे ग़मों से तुम को नजात देगा वो तुम को लंबी हयात देगा वो रोके बोली तुम्हारे हक़ में दुआ करूँँगी कोई भी मुश्किल तुम्हें न आए बिछड़ के हम सेे तुम्हारे होंठों का ये तबस्सुम कभी न जाए वो रोके बोली मुआ'फ़ कर दो मैं इस मुहब्बत के रास्ते पर मलाल है कि तुम्हारे हमराह चल न पाई मैं अपने वादे निभा न पाई मुआ'फ़ कर दो वो इतना कह कर जो चुप हुई तो मैं उस सेे बोला यूँँ राह में मुँह जो मोड़ती हो हमें जो तुम ऐसे छोड़ती हो हमारे ख़्वाबों को तोड़ती हो करोगी ऐसा ख़बर नहीं थी यक़ीन मानो ख़बर जो होती तो तुम से हरगिज़ न दिल लगाते यक़ीन मानो क़सम ख़ुदा की तो तुम से हरगिज़ न दिल लगाते चलो ये माज़ी की बात छोड़ो सवाल करता हूँ तुम बताओ तुम्हारी बातें हैं उस की जैसी तुम्हारे वादे हैं उस के जैसे तुम्हारा लहजा है उस के जैसा हो यार तुम भी तो एक लड़की मुझे बताओ मैं कैसे तुम पर यक़ीन कर लूँ तुम्हीं बताओ मैं कैसे तुम पर यक़ीन कर लूँ — Shajar Abbas
“वसीयत“ हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मैं अब से पहले ख़ुतूत लिखता रहा हूँ तुझ को तुझे पता है मैं अब से पहले सभी ख़तों में ख़ुशी के अफ़्साने लिख रहा था हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मगर ज़माना बदल गया अब ये ख़त जो मैं ने तुझे लिखा है पुराने वाले ख़तों के जैसा ये ख़त नहीं है तमाम ख़त से ये ख़त जुदा है हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ये ख़त नहीं है ये ख़त की सूरत में मैं ने क़ासिद के हाथ तुझ को वसीयतें हैं जो मेरी मैं ने वो सब की सब लिख के भेज दी हैं हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मिरी गुज़ारिश है अब ये तुझ सेे वसीयतें जो लिखी हैं मैं ने हर इक वसीयत को मेरी पढ़ना हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत मिरे जनाज़े पे जब भी आना कफ़न को रुख़ से मिरे हटाना ग़मों की मारी हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ख़याल रखना मिरी वसीयत का मान रखना लिपट के मय्यत से जाँ न खोना जुदाई में मत निढाल होना हसीन आँखों से ख़ूँ न रोना लहू से दामन को मत भिगोना तड़प तड़प के न जान खोना ग़मों की मारी हसीन लकड़ी मिरी मुहब्बत ख़याल रखना मिरी वसीयत का मान रखना — Shajar Abbas
"शिकवा-ए-फ़िलिस्तीन" बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र जलते हुए ख़याम ये उठता हुआ धुआँ टूटे हुए मकान ये वीरान बस्तियाँ कुछ कह रही हैं अहल-ए-जहाँ ग़ौर से सुनो मज़लूम कर रहे हैं बयाँ ग़ौर से सुनो बाक़ी है दिल में थोड़ी सी इंसानियत अगर अहल-ए-नज़र तो करिए फ़िलिस्तीन पे नज़र हर रोज़ सुब्ह-ओ-शाम याँ बे-जुर्म-ओ-बे-ख़ता होती है बे-गुनाहों पे बे-इंतिहा जफ़ा मेरा मुतालबा है हर इक हक़-शनास से मरते हैं रोज़ लोग यहाँ भूख प्यास से मंज़र ये देख देख के दम घुटता है मिरा माँएँ पिसर की लाश पे पढ़ती हैं मर्सिया आती है शौर-ओ-शैन की हर सिम्त से सदा तिफ़्ल-ओ-जवान बूढ़ों के लाशे हैं जा-ब-जा कोई नहीं है बेकस-ओ-मुज़्तर का हम-नवाँ ज़ुल्म-ओ-सितम ये देख के ख़ामोश है जहाँ कहते हैं ख़ुद को उम्मत-ए-मुस्लिम का रहनुमा हामी नहीं है कोई मुसीबत में पर मिरा अहल-ए-अरब से आज ये मेरा ख़िताब है शिकवे का मेरे क्या कोई तुम पर जवाब है — Shajar Abbas
"सिगरेट" तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या मुझे जब इश्क़ था तुझ सेे तो सिगरेट से अदावत थी मैं सिगरेट से हमेशा हाथ अपने दूर रखता था कभी सिगरेट न छूता था मुझे सिगरेट से सिगरेट पीने वालों से अदावत थी जो सिगरेट पीते थे मुझ को वो लड़के ज़हर लगते थे मैं उन लड़कों की यारी दोस्ती से दूर रहता था तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या हमेशा मेरी सिगरेट के धुएँ में साँस घुटती थी मिरी आँखें उबलती थीं लहू आँखों में आता था मिरी जब साँस घुटती थी तो तू बेचैन होती थी मिरी हालत पे रोती थी तिरे चेहरे के ऊपर इक उदासी तारी होती थी तिरे सीने में दिल तेरा बिना पानी की मछली की तरह पल पल तड़पता था भुलाकर दर्द को अपने मिरे आराम की ख़ातिर मिरे हक़ में ख़ुदा से तू दुआएँ करने लगती थी दुआएँ रंग लाती थीं धुआँ सिगरेट का छटता था मिरी हालत सुधरती थी मुझे सब याद है अब तक मैं माज़ी को नहीं भूला मिरी हालत सुधरती थी तो तुझ को चैन आता था तुझे जब चैन आता था तो तू सज्दे में सर रख कर ख़ुदा का शुक्र करती थी ख़ुदा का शुक्र कर के तू गले से मेरे लगती थी गले लग कर मिरे तू धीमे धीमे मुस्कुराती थी तिरे सीने में दिल तेरा सुकूँ की साँस लेता था मुझे सब याद है अब तक मैं माज़ी को नहीं भूला मगर अब कुछ बताना है मैं जब से तुझ सेे बिछड़ा हूँ ये मेरी ज़िंदगी तब से मुसीबत में गिरिफ़्ता है परेशाँ हूँ बहुत ज़्यादा बहुत ज़्यादा परेशाँ हूँ परेशानी सिवा होती है तो दिल में ये आता है कि सिगरेट हाथ में ले लूँ मैं सिगरेट हाथ में लेने को जब ये हाथ आगे को बढ़ाता हूँ तो तू आ कर तसव्वुर में मिरा ये हाथ अपने हाथ से ख़ुद थाम लेती है पकड़ कर हाथ मेरा तैश में मुझ सेे ये कहती है अरे छोड़ो ये सब क्या है शजर सिगरेट नहीं पीते तिरी गल मान लेता हूँ मैं सिगरेट तोड़ देता हूँ तिरे दीदार से दिल को ज़रा सा चैन आता है मैं कुछ पल के लिए अपने सभी ग़म भूल जाता हूँ मगर फिर से तिरी फ़ुर्क़त ये मन पर ग़ालिब आती है मिरी हालत बिगड़ती है परेशानी सिवा होती है तो दिल में ये आता है कि सिगरेट हाथ में ले लूँ मगर फिर ध्यान आता है तुझे सिगरेट से सिगरेट पीने वाले से मिरे जैसे अदावत है तो अब सिगरट भला क्यूँ अपने इन हाथों से छू लूँ मैं तुझे नाराज़ क्यूँ कर दूँ तुझे मुझ सेे मुहब्बत अब नहीं बाक़ी तो क्या शिकवा करूँँ तुझ सेे मुझे तुझ सेे मुहब्बत है मैं सिगरेट तोड़ देता हूँ ले सिगरेट फेंक देता हूँ मुहब्बत को निभाता हूँ मैं हर लम्हा तिरी यादों में गुम-सुम बैठा रहता हूँ तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या — Shajar Abbas
"वो भी क्या ज़माना था" वो भी क्या ज़माना था तुझ को याद करने से ज़ेहन चैन पाता था दिल के ज़ख़्म भरते थे तेरा नाम लेने से इन उदास होंठो पर झट से मुस्कुराहट के ढेरो फूल खिलते थे तेरा दीद करने से कोर चश्म आँखों को रौशनाई मिलती थी तेरा ज़िक्र करने से गाँव की फ़ज़ा सारी ख़ुश गवार होती थी एक ये ज़माना है तुझ को याद करने से ज़ेहन तंग होता है दिल के ज़ख़्म खुलते हैं इन लतीफ़ होंठो पर ग़म की बिजली गिरती है होंठ अब मिरे ग़म की आग में झुलसते हैं तेरा दीद करने से सिर्फ़ दर्द मिलता हैं तेरा चेहरा आँखों में तीर बन के चुभता है तेरा ज़िक्र करने से गाँव की फ़ज़ा सारी दिल मलूल होती है ये अजब ज़माना है सिर्फ़ इस ज़माने में दर्द हाथ आया है अब मैं बस ये सोचूँ हूँ वो भी क्या ज़माना था — Shajar Abbas
"मशवरा" सुना है हम से बिछड़ के अक्सर उदास रहती हो आज कल तुम उदास रहना सही नहीं है उदासी जो है बुरी बला है हमारी मानों उदासी छोड़ो उदास रहना सही नहीं है उदास क्यूँ हो उदास रहना सही नहीं है सुना है सारी सहेलियों ने तुम्हें हँसाने की कोशिशे की मगर कोई भी हँसा न पाई तुम्हारे नाज़ुक लबों पे कोई ज़रा तबस्सुम भी ला न पाई हर इक सहेली ने हाल देखा उदास देखा उदास देखा तुम्हें तुम्हारी सहेलियों ने तो ख़ूब रोयीं मलाल कर के ये सोच कर के हमारी प्यारी सखी को आख़िर ये क्या हुआ है हमेशा हँसती थी जो सहेली उदास होकर वो बैठती है न मुस्कुराती है पहले जैसी न अब किसी से भी बोलती है उदास रहती है बस हमेशा किसी के बारे में सोचती है सखी ये रो कर सखी से बोली वो कौन लड़का है जिस की यादों ने इस को दीवाना कर दिया है हर एक से बे गाना कर दिया है सखी ये रो कर सखी से बोली दुआएँ माँगो सखी के हक़ में दुआएँ माँगो सुना है मिल कर तुम्हारे हक़ में ख़ुदा से सब ने दुआएँ माँगीं सुना है मैं ने दुआएँ ये थीं कोई भी हो वो कहीं भी हो वो ख़ुदा करे वो सही सलामत पलट के आए इसे वो अपने गले लगाए इसे हमेशा वो साथ रक्खे वो इस सेे या रब कभी न बिछड़े हमेशा इस को रखे मुहब्ब्त के साएबाँ में हमेशा इस के लबों की ज़ीनत को वो बढ़ाए सखी ये रो कर सखी से बोली दुआएँ माँगो सखी के हक़ में कभी हमारी सखी को कोई अलम नहीं हो सखी कभी भी न ग़म-ज़दा हो सदा तबस्सुम रहे हमारी सखी के लब पर ये मुस्कुराती रही हमेशा उठा के हाथों को साथ मिल कर दुआएँ माँगो सखी हमेशा ही मुस्कुराए ये सब दुआएँ तुम्हारी सखियों ने रब से माँगी मलाल हाए मलाल जानाँ हमें हमेशा ये ग़म रहेगा दुआएँ उन की न होंगी पूरी पलट के अब हम न आ सकेंगे गले न तुम को लगा सकेंगे न अपने हमराह रख सकेंगे न अब तुम्हारे लबों पे शायद कभी तबस्सुम सजा सकेंगे न रख सकेंगे मुआ'फ़ करना कभी मोहब्बत के साएबाँ में मुआ'फ़ करना जो हो सके तो ख़ुदा की ख़ातिर मुआ'फ़ करना अरे हाँ अच्छा ख़याल आया सुनो हमारी ये बात सुन लो तमाम बातों को तर्क कर दो ये बात सुन लो हमारा मिलना न हो सकेगा न एक दूजे को हम मिलेंगे लिखा था क़िस्मत में जो ख़ुदा ने वो हो गया है फ़िराक़ लिक्खा था अपनी क़िस्मत में अपने दोनों बिछड़ गए हैं मलाल है पर मुझे बताओ मलाल करने से क्या है हासिल था जो भी होना वो हो गया है बिछड़ चुके हैं मलाल छोड़ो उदासी छोड़ो तुम्हें हमारी क़सम है समझीं उदासी छोड़ो अरे हाँ मेरी ये बात सुन लो तुम्हारे दिल को सुकूँ मिलेगा बुज़ुर्ग लोगों से जो सुना है सुनो मैं तुम को बता रहा हूँ बुज़ुर्ग लोगों ने ये कहा है ख़ुदा की मर्ज़ी के आगे नईं तो किसी की चलती है नईं चलेगी ये सच है तो बात मानो उदासी छोड़ो उदास रहने से ये तुम्हारे ज़माना सारा उदास होगा तुम्हारी सखियाँ उदास होंगी सभी अक़ारिब उदास होंगे परिंद दरिया उदास होंगे शजर समुंदर उदास होंगे ये फूल कलियाँ उदास होंगी ये चाँद तारे उदास होंगे ये फ़र्श सारा उदास होगा ये अर्श सारा उदास होगा तुम्हें हमारी क़सम है समझीं उदासी छोड़ो तुम्हारे होंठों के वास्ते ही हँसी बनाई है किब्रिया ने तुम्हारा हक़ है ये अपना हक़ लो हसीं लबों पर हँसी सजाओ लबों पे अपने हँसी सजाकर हँसी की ज़ीनत को तुम बढ़ाओ हमारी मानो तुम्हें हमारी क़सम हैं समझीं हमारी मानो उदासी छोड़ो उदास रहना सही नहीं है उदासी जो है बुरी बला है तुम्हें हमारी क़सम हैं समझीं उदासी छोड़ो उदास रहना सही नहीं है — Shajar Abbas
"इंतिज़ार" कब तक ये बार हिज्र का दिल पर उठाऊँ मैं कब तक ग़म-ए-फ़िराक़ का मातम मनाऊँ मैं कब तक जहाँ से दर्द-ए-मोहब्बत छुपाऊँ मैं कब तक लबों पे झूठा तबस्सुम सजाऊँ मैं कब तक बता दे और ये रंज-ओ-अलम सहूँ कब तक यूँँ तेरी याद में गिर्या-कुनाँ रहूँ कब तक उदासियों में बसर ज़िंदगी करूँँ कब तक ये दिल जला के बता रौशनी करूँँ कब तक जहाँ से दूर मैं यूँँ तीरगी करूँँ कब तक तिरे फ़िराक़ में मैं शा'इरी करूँँ कब तक रखूँ सवाल दिल-ए-बे क़रार में कब तक बिछाऊँ पलकें तिरे इंतिज़ार में कब तक ये तेरी याद गले से लगाऊँ मैं कब तक उदास शामों में आँसू बहाऊँ मैं कब तक ये तेरा चेहरा लहू से बनाऊँ मैं कब तक यूँँ नाम लिख के तिरा और मिटाऊँ मैं कब तक यूँँ तिश्ना तड़पूँ बता दीद-ए-आब को कब तक पढ़ूँ मैं और जुदाई के बाब को कब तक करेगा इश्क़ में रुसवा मुझे जहाँ कब तक ग़म-ए-जुदाई में निकलेगी मेरी जाँ कब तक जहाँ में भटकूँगा आख़िर यहाँ वहाँ कब तक मिलेगी आशिक़-ए-बीमार को अमाँ कब तक ये ऐसे ठोकरे दर दर की खाएगा कब तक सुकून ये दिल-ए-बीमार पाएगा कब तक यूँँ मुब्तिला मैं रहूँगा सवाल में कब तक जकड़ के रक्खेगा यादों के जाल में कब तक ख़याल बन के रहेगा ख़याल में कब तक हयात गुज़रेगी मेरी ज़वाल में कब तक भला ये रंज-ओ-अलम मैं उठाऊँगा कब तक बता दे और ये ग़म मैं उठाऊँगा कब तक रह-ए-फ़िराक़ पे करता रहूँ सफ़र कब तक मैं सुबह-ओ-शाम फिरूँ और दर-ब-दर कब तक न जाने लाएगी मेरी दुआ असर कब तक ग़म-ए-हयात मिरी होगी मुख़्तसर कब तक दिल-ए-शजर में रहेगी ये बेकली कब तक बता तू आएगा ऐ बारहवें अली — Shajar Abbas