सबक़ वफ़ा का पढ़ाना तुम अपने बेटे को
हमारे जैसा बनाना तुम अपने बेटे को
हर एक बुज़ुर्ग का दुनिया के एहतराम करे
अदब नवाज़ उठाना तुम अपने बेटे को
जो पूछे कौन तुम्हें सबसे बढ़ के चाहता था
तो नाम मेरा बताना तुम अपने बेटे को
अगर ऐ जान जो दुनिया से मैं गुज़र जाऊँ
तो मेरी क़ब्र पे लाना तुम अपने बेटे को
वो तुमसे रूठे अगर तो मना लिया करना
मेरी तरह न सताना तुम अपने बेटे को
किसी की जान की ऐ जान तुम इधर आओ
ये कहके पास बुलाना तुम अपने बेटे को
ऐ शाहज़ादी हर एक रात गाके लोरी में
हमारी ग़ज़लें सुनाना तुम अपने बेटे को
हर एक लड़की का दुनिया की एहतराम करे
शऊर इतना सिखाना तुम अपने बेटे को
जहाँ जहाँ पे मुलाक़ात होती थी अपनी
हर उस जगह पे घुमाना तुम अपने बेटे को
वो घर से निकले तो दम करना उसपे नाद-ए-अली
यूँ नज़र-ए-बद से बचाना तुम अपने बेटे को
हर एक शब ऐ मेरी शाहज़ादी याद रहे
शजर की ग़ज़लें पढ़ाना तुम अपने बेटे को
कमज़र्फ़ मेरे दिल से उतर क्यों नहीं जाते
उतरे हो मेरे दिल से तो मर क्यों नहीं जाते
बेहिस से नज़र आते हो हर बार मुझे तुम
बेहिस भला दुनिया से गुज़र क्यों नहीं जाते
वो फूल जो गुलशन में पड़ा है वहाँ तन्हा
तुम उससे गले लग के निखर क्यों नहीं जाते
महरूम हैं बरसों से ये आगोश हमारी
ख़ुशियों से इसे आन के भर क्यों नहीं जाते
कब तक यूँ भला रोओगे सहरा में शजर तुम
इक अरसा हुआ घर गए घर क्यों नहीं जाते
मुझ पर निगाह-ए-नाज़ का जब जादू चल गया
मैं रफ़्ता रफ़्ता क़ैस की सोहबत में ढल गया
ज़ुल्फें उन्होंने खोल के बिखराई थी शजर
फिर देखते ही देखते मौसम बदल गया