Mohit Dixit

Mohit Dixit

@mohitdixit

Mohit Dixit shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Mohit Dixit's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

15

Content

53

Likes

205

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

Sher

ये जंग पे जाते हुए जाँ-बाज़ सिपाही जब हार के लौटेंगे तो कविताएँ लिखेंगे — Mohit Dixit
तुम्हारे बा'द इस आँगन में फूल खिलने पर ख़ुशी हुई भी तो ये दुख हुआ कि दें किस को — Mohit Dixit
वो लोग मुझ सेे कह रहे थे आप का दिन अच्छा हो उन्हें नहीं पता कि मेरी ज़िंदगी ख़राब है — Mohit Dixit
तुम्हें यक़ीन नहीं आएगा लेकिन मैं सच कहता हूँ मैं ने उस इंसान को देखा भी है और जिया भी है — Mohit Dixit
दयार-ए-ग़ैर में तुम ख़ुद से ख़ुद में तन्हा हो जो तुम को चाहते थे अब भी चाहते होंगे — Mohit Dixit
अब मोहब्बत से भागता हूँ मैं बात ये है कि डर गया हूँ मैं — Mohit Dixit
तुझ तक आने का सफ़र इतना भी आसाँ तो न था तू ने फेरी है नज़र हम सेे जिस आसानी से — Mohit Dixit
उन सेे कह दो कहानियाँ न कहें मैं कहानी में जैसे था ही नहीं — Mohit Dixit
हम जो हँसते थे हाल-ए-दुनिया पर हम को रोना सिखा गया कोई — Mohit Dixit

Ghazal

इक राज़ है जो मुझ पे अभी तक खुला नहीं उस को किसी से इश्क़ हुआ भी है या नहीं उस की हथेलियों पे ज़रा ग़ौर तो करो उन में निशाँ कहीं भी किसी हाथ का नहीं वो जानता है लोग उसे पूजते भी हैं ता'रीफ़ वो करो जो ख़ुद उस को पता नहीं वो इक मुक़द्दस आग है जिस में जले हैं सब सब या'नी सब के सब कोई भी बच सका नहीं उस आग में जले हुओं का हाल क्या कहूँ वो आग जिस सेे बनना था सूरज बना नहीं अपनी बनाई सोच में रह कर न सोच उसे उस जैसा इस जहाँ में कोई दूसरा नहीं कितनी अजीब बात है ये भी कि मैं उसे वैसे तो चाहता हूँ मगर चाहता नहीं 'मोहित' हर एक शख़्स हुआ उस की शक्ल पर और शक्ल पर ही रुक गया दिल तक गया नहीं — Mohit Dixit
किया किरदार अपना क़त्ल जिन की हुक्मरानी में वो कहते हैं कि हम थे ही नहीं उन की कहानी में जिसे ख़ामोश रहने की ज़बाँ दी थी उसे कहना जिए थे ख़ामुशी से हम मरे हैं बेज़ुबानी में कहा बेचैन पा कर गाँव में हम सेे बुज़ुर्गों ने रहे हैं अहल-ए-फ़ुर्क़त हम भी तो अपनी जवानी में दिलासा ये दिया मल्लाह ने प्यासे दरख़्तों को तुम्हें हम काटने के बा'द ले जाएँगे पानी में हम ऐसे लोग गिनती से हटा देना सरल होगा कभी जब फ़र्क़ करना इश्क़ में और राइगानी में हम ऐसे लोग दुनिया को कहाँ भाए कभी 'मोहित' उसे भाते हैं उस ने कह दिया होगा रवानी में — Mohit Dixit
नहीं रखते थे हम ग़म को सँजोकर तुम सेे पहले हँसा करते थे हम भी शाद हो पर तुम सेे पहले हमारा इश्क़ तुमपे बोझ था तो बोल देते दिल अपना तोड़ देते हम सितमगर तुम सेे पहले निकल आए तुम्हारे बा'द घर से ऊब कर के रहा करते थे हम भी अपने भीतर तुम सेे पहले मेरे हालात पूछे और फिर पूछा तुम आए गए हैं लोग जितने मुझ सेे मिल कर तुम सेे पहले कहा हो मैं ने कितनी बार भी पर झूठ है ये नहीं देखा था मैं ने तुम सेे बेहतर तुम सेे पहले न होंगी तुम सेे नम अब्रेे-करम वो रेत आँखें इसी कोशिश में आया था समुंदर तुम सेे पहले नहीं होता किसी पर जो तुम्हारे बा'द मोहित हुआ करता था शायद हर किसी पर तुम सेे पहले — Mohit Dixit
हो अगर बस में ज़रा सा भी तो कर जाऊँ मैं उस की गलियों से उठूँ लौट के घर जाऊँ मैं यार तू बात समझ देख उसे और बता ऐसे कैसे ग़म-ए-हिज्राँ से उभर जाऊँ मैं उस का चेहरा मेरी आँखों में दिखा होगा तुझे बोल फिर कैसे मोहब्बत से मुकर जाऊँ मैं वो बस इक बार बिना बात निहारे मुझ को और इस बात पे इक उम्र ठहर जाऊँ मैं एक जंगल है जहाँ झील है तुम भी शायद बैठी मिल जाओ किनारे पे अगर जाऊँ मैं अपने सीने पे ये पत्थर न अगर ले के चलूँ आ के जज़्बात में पन्नों सा बिखर जाऊँ मैं एक तस्वीर बनानी है मुझे जीते जी ऐसी तस्वीर जिसे देख के मर जाऊँ मैं सपने आते हैं बिछड़ने के ही अक्सर 'मोहित' तुम जगा दोगे अगर नींद में डर जाऊँ मैं — Mohit Dixit
हम ने इक ज़ख़्म को बचपन से हरा रक्खा है उस की तस्वीर को सीने से लगा रक्खा है इस लिए भी न कही बात कभी दिल की उसे दिल वो देखेगा नहीं बात में क्या रक्खा है नींद में भूल गया उस ने बुझाया न दिया हम नहीं सोए कि खिड़की पे दिया रक्खा है आस में कितने परिंदे हैं उसे इल्म नहीं आज भी पेड़ के नीचे वो घड़ा रक्खा है एक लड़की है फ़क़त एक ही लड़की मेरे दोस्त शहर के शहर को दीवाना बना रक्खा है वो ही देता है मेरे ग़म के शजर को पानी मैं ने जिस शख़्स को आँखों में बसा रक्खा है हम को मालूम है 'मोहित' वो नहीं आएगा हम ने जिस के लिए दरवाज़ा खुला रक्खा है — Mohit Dixit

Nazm

"ज़िंदगी और चले" शाम को तारे कभी गिनते हुए या देख कर के ख़ूब-सूरत सी सहर को राह पे यूँँ ही कभी चलते हुए या याद कर के ज़िंदगी भर के सफ़र को जिस जगह जिस मोड़ पर तुम को लगेगा वक़्त थम जाए इसी पल में यहीं पे ठहर जाए दिन निकलना, शाम ढलना और मौसम का बदलना भी वहीं पे बस वही पल है जहाँ जी भर जिए तुम सिर्फ़ ज़िंदा ही रहे बाक़ी सभी दिन ख़याल अच्छा है कि थम जाए समाँ ये पर हक़ीक़त में नहीं ये बात मुमकिन ठहर जाना वक़्त की फ़ितरत नहीं है रुक गई जो ज़िंदगी तो ज़िंदगी क्या वक़्त है रुकता न रूकती ज़िंदगी तो सोच लो मोहित ठहरना है सही क्या रुक गए जो उन सभी को भूल कर के बढ़ रहा है आज का ये दौर आगे चल जहाँ पर आस्माँ मिलता ज़मीं से फिर वहाँ से और आगे और आगे — Mohit Dixit