"गिनती : इन्तेज़ार के दिनों की"
तब से अब तक ये भयानक सिलसिला था
उस से पिछली बार मिलना जब हुआ था
तब से अब तक जो भी दिन मैं ने गुज़ारे
गिन के उँगली पर रखे सारे के सारे
दिन, महीनों बा'द पहुँचा साल ही में
साल निकले उँगलियों से हाल ही में
उम्र गुज़री तो समझ आया यहाँ पर
ख़त्म होगा इन्तेज़ार उस का कहाँ पर
तब नहीं जब ख़त्म होती उँगलियों से,
गिनतियाँ जब ख़त्म होंगी गिनतियों से
— Mohit Dixit















