किया किरदार अपना क़त्ल जिन की हुक्मरानी में

वो कहते हैं कि हम थे ही नहीं उन की कहानी में

जिसे ख़ामोश रहने की ज़बाँ दी थी उसे कहना
जिए थे ख़ामुशी से हम मरे हैं बेज़ुबानी में

कहा बेचैन पा कर गाँव में हम से बुज़ुर्गों ने
रहे हैं अहल-ए-फ़ुर्क़त हम भी तो अपनी जवानी में

दिलासा ये दिया मल्लाह ने प्यासे दरख़्तों को
तुम्हें हम काटने के बा'द ले जाएँगे पानी में

हम ऐसे लोग गिनती से हटा देना सरल होगा
कभी जब फ़र्क़ करना इश्क़ में और राइगानी में

हम ऐसे लोग दुनिया को कहाँ भाए कभी 'मोहित'
उसे भाते हैं उस ने कह दिया होगा रवानी में

— Mohit Dixit

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