मेरा दिया जलाते हुए ख़त्म हो गई
वो लौ भी डगमगाते हुए ख़त्म हो गई
कुछ सीख इन अँधेरों से ले लेती रौशनी
फिर दायरा बनाते हुए ख़त्म हो गई
देखो इक और शख़्स के चेहरे की ताज़गी
बे-वज्ह मुस्कुराते हुए ख़त्म हो गई
इन रेत के समुन्दरों में फिर से इक नदी
आबादियों तक आते हुए ख़त्म हो गई
हद से भी लंबी रात थी 'मोहित' मगर है शुक्र
इक वाक़िआ' भुलाते हुए ख़त्म हो गई
— Mohit Dixit















