Hafeez Banarasi

Hafeez Banarasi

@hafeez-banarasi

Hafeez Banarasi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hafeez Banarasi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

0

Content

28

Likes

0

Shayari
Audios
  • Ghazal
  • Nazm
लहू की मय बनाई दिल का पैमाना बना डाला
जिगर-दारों ने मक़्तल को भी मय-ख़ाना बना डाला

हमारे जज़्बा-ए-तामीर की कुछ दाद दो यारो
कि हम ने बिजलियों को शम्अ' का शाना बना डाला

सितम ढाते हो लेकिन लुत्फ़ का एहसास होता है
इसी अंदाज़ ने दुनिया को दीवाना बना डाला

भरी महफ़िल में हम ने बात कर ली थी उन आँखों से
बस इतनी बात का यारों ने अफ़्साना बना डाला

मिरे ज़ौक़-ए-परस्तिश की करिश्मा-साज़ियाँ देखो
कभी का'बा कभी का'बे को बुत-ख़ाना बना डाला

शिकायत बिजलियों से है न शिकवा बाद-ए-सरसर से
चमन को ख़ुद चमन वालों ने वीराना बना डाला

चलो अच्छा हुआ दुनिया 'हफ़ीज़' अब दूर है हम से
मोहब्बत ने हमें दुनिया से बेगाना बना डाला
Read Full
Hafeez Banarasi
कोई बतलाए कि ये तुर्फ़ा तमाशा क्यूँ है
आदमी भीड़ में रहते हुए तन्हा क्यूँ है

पाँव फैलाए हुए ग़म का अंधेरा क्यूँ है
आ गई सुब्ह-ए-तमन्ना तो फिर ऐसा क्यूँ है

मैं तो इक ज़र्रा-ए-नाचीज़ हूँ और कुछ भी नहीं
वो जो सूरज है मिरे नाम से जलता क्यूँ है

तुझ को निस्बत है अगर नाम-ए-बराहीम से कुछ
आग को फूल समझ आग से डरता क्यूँ है

कौन सा अहद है जिस अहद में हम जीते हैं
दश्त तो दश्त है दरिया यहाँ प्यासा क्यूँ है

पी के बहकेगा तो रुस्वाई-ए-महफ़िल होगी
वो जो कम-ज़र्फ़ है मयख़ाने में आया क्यूँ है

कोई आसेब है या सिर्फ़ निगाहों का फ़रेब
एक साया मुझे हर सू नज़र आता क्यूँ है

याद किस की मह-ओ-ख़ुर्शीद लिए आई है
शब-ए-तारीक में आज इतना उजाला क्यूँ है

बद-हवासी का ये आलम कभी पहले तो न था
हश्र से पहले ही ये हश्र सा बरपा क्यूँ है
Read Full
Hafeez Banarasi
ये कैसी हवा-ए-ग़म-ओ-आज़ार चली है
ख़ुद बाद-ए-बहारी भी शरर-बार चली है

देखी ही न थी जिस ने शिकस्त आज तक अपनी
वो चश्म-ए-फ़ुसूँ-ख़ेज़ भी दिल हार चली है

अब कोई हदीस-ए-क़द-ओ-गेसू नहीं सुनता
दुनिया में वो रस्म-ए-रसन-ओ-दार चली है

तकता ही नहीं कोई मय ओ जाम की जानिब
क्या चाल ये तू ने निगह-ए-यार चली है

वो लोग कहाँ जाएँ जो काफ़िर हैं न दीं-दार
फिर कशमकश-ए-काफ़िर-ओ-दीन-दार चली है

बात और भी कुछ मय की मज़म्मत के अलावा
ये बात तो ऐ शैख़ कई बार चली है

दीवानगी-ए-शौक़ में जो कर गए हम लोग
मेयार-ए-ख़िरद बन के वो गुफ़्तार चली है

साज़िश न हो कुछ दैर ओ हरम वालों की इस में
सुनता हूँ कि मय-ख़ाने में तलवार चली है

कब याद किया हम को 'हफ़ीज़' अहल-ए-चमन ने
जब ज़ीस्त सू-ए-वादी-ए-पुर-ख़ार चली है
Read Full
Hafeez Banarasi
इक शगुफ़्ता गुलाब जैसा था
वो बहारों के ख़्वाब जैसा था

पढ़ लिया हम ने हर्फ़ हर्फ़ उसे
उस का चेहरा किताब कैसा था

दूर से कुछ था और क़रीब से कुछ
हर सहारा सराब जैसा था

हम ग़रीबों के वास्ते हर रोज़
एक रोज़-ए-हिसाब जैसा था

किस क़दर जल्द उड़ गया यारो
वक़्त रंग-ए-शबाब जैसा था

कैसे गुज़री है उम्र क्या कहिए
लम्हा लम्हा अज़ाब जैसा था

ज़हर था ज़िंदगी के साग़र में
रंग रंग-ए-शराब जैसा था

क्या ज़माना था वो ज़माना भी
हर गुनह जब सवाब जैसा था

कौन गर्दानता उसे क़ातिल
वो तो इज़्ज़त-मआब जैसा था

बे-हिजाबी के बावजूद भी कुछ
इस के रुख़ पर हिजाब जैसा था

जब भी छेड़ा तो इक फ़ुग़ाँ निकली
दिल शिकस्ता रबाब जैसा था

इस के रुख़ पर नज़र ठहर न सकी
वो 'हफ़ीज़' आफ़्ताब जैसा था
Read Full
Hafeez Banarasi
क्या जुर्म हमारा है बता क्यूँ नहीं देते
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँ नहीं देते

क्या जल्वा-ए-मअ'नी है दिखा क्यूँ नहीं देते
दीवार-ए-हिजाबात गिरा क्यूँ नहीं देते

तुम को तो बड़ा नाज़-ए-मसीहाई था यारो
बीमार है हर शख़्स दवा क्यूँ नहीं देते

किस दश्त में गुम हो गए अहबाब हमारे
हम कान लगाए हैं सदा क्यूँ नहीं देते

कम-ज़र्फ़ हैं जो पी के बहुत के हैं सर-ए-बज़्म
महफ़िल से उन्हें आप उठा क्यूँ नहीं देते

क्यूँ हाथ में लर्ज़ा है तुम्हें ख़ौफ़ है किस का
हम हर्फ़-ए-ग़लत हैं तो मिटा क्यूँ नहीं देते

कुछ लोग अभी इश्क़ में गुस्ताख़ बहुत हैं
आदाब-ए-वफ़ा उन को सिखा क्यूँ नहीं देते

नग़्मा वही नग़्मा है उतर जाए जो दिल में
दुनिया को 'हफ़ीज़' आप बता क्यूँ नहीं देते
Read Full
Hafeez Banarasi
जो नज़र से बयान होती है
क्या हसीं दास्तान होती है

पत्थरों को न ठोकरें मारो
पत्थरों में भी जान होती है

जिस को छू दो तुम अपने क़दमों से
वो ज़मीं आसमान होती है

बे-पिए भी सुरूर होता है
जब मोहब्बत जवान होती है

ज़िंदगी तो उसी की है जिस पर
वो नज़र मेहरबान होती है

जितने ऊँचे ख़याल होते हैं
उतनी ऊँची उड़ान होती है

आरज़ू की ज़बाँ नहीं होती
आरज़ू बे-ज़बान होती है

जिस में शामिल हो तल्ख़ी-ए-ग़म भी
कितनी मीठी वो तान होती है

इन की नज़रों का हो फ़ुसूँ जिस में
वो ग़ज़ल की ज़बान होती है

ख़ार की ज़िंदगी-ए-बे-रौनक़
फूल की पासबान होती है

कौन देता है रूह को आवाज़
जब हरम में अज़ान होती है

इश्क़ की ज़िंदगी 'हफ़ीज़' न पूछ
हर घड़ी इम्तिहान होती है
Read Full
Hafeez Banarasi
लब-ए-फ़ुरात वही तिश्नगी का मंज़र है
वही हुसैन वही क़ातिलों का लश्कर है

ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को
हँसी लबों पे है सीने में ग़म का दफ़्तर है

यक़ीन किस पे करें किस को दोस्त ठहराएँ
हर आस्तीन में पोशीदा कोई ख़ंजर है

गिला नहीं मिरे होंटों पे तंग-दस्ती का
ख़ुदा का शुक्र मिरा दिल अभी तवंगर है

कोई तो है जो धड़कता है ज़िंदगी बन कर
कोई तो है जो हमारे दिलों के अंदर है

उसे क़रीब से देखा तो ये हुआ मालूम
वो बू-ए-गुल नहीं शमशीर-ए-बाद-ए-सरसर है

समझ के आग लगाना हमारे घर में तुम
हमारे घर के बराबर तुम्हारा भी घर है

मिरी जबीं को हक़ारत से देखने वाले
मिरी जबीं से तिरा आस्ताँ मुनव्वर है

तुम्हारे क़ुर्ब की लज़्ज़त नसीब है जिस को
वो एक लम्हा हयात-ए-अबद से बेहतर है

हमारा जुर्म यही है कि हक़-परस्त हैं हम
हमारे ख़ून का प्यासा हर एक ख़ंजर है

वो मेरे सामने आए तो किस तरह आए
कोई लिबास है उस का न कोई पैकर है

हर इक बला से बचाए हुए है जो हम को
हमारे सर पे ये माँ की दुआ की चादर है

भटक रहा हूँ मैं सदियों से दश्त-ए-ग़ुर्बत में
कोई तो मुझ को बताए कहाँ मिरा घर है

अभी 'हफ़ीज़' गुलाबों की बात मत कीजे
लहूलुहान अभी गुलसिताँ का मंज़र है
Read Full
Hafeez Banarasi

LOAD MORE