Hafeez Banarasi

Hafeez Banarasi

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Hafeez Banarsi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hafeez Banarsi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

चले चलिए कि चलना ही दलील-ए-कामरानी है जो थक कर बैठ जाते हैं वो मंज़िल पा नहीं सकते — Hafeez Banarasi
आसान नहीं मरहला-ए-तर्क-ए-वफ़ा भी मुद्दत हुई हम इस को भुलाने में लगे हैं — Hafeez Banarasi
कुछ इस के सँवर जाने की तदबीर नहीं है दुनिया है तिरी ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर नहीं है — Hafeez Banarasi
समझ के आग लगाना हमारे घर में तुम हमारे घर के बराबर तुम्हारा भी घर है — Hafeez Banarasi
ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को हँसी लबों पे है सीने में ग़म का दफ़्तर है — Hafeez Banarasi
वफ़ा नज़र नहीं आती कहीं ज़माने में वफ़ा का ज़िक्र किताबों में देख लेते हैं — Hafeez Banarasi
जो पर्दों में ख़ुद को छुपाए हुए हैं क़यामत वही तो उठाए हुए हैं — Hafeez Banarasi
किस मुँह से करें उन के तग़ाफ़ुल की शिकायत ख़ुद हम को मोहब्बत का सबक़ याद नहीं है — Hafeez Banarasi
एक सीता की रिफ़ाक़त है तो सब कुछ पास है ज़िंदगी कहते हैं जिस को राम का बन-बास है — Hafeez Banarasi
समझ के आग लगाना हमारे घर में तुम हमारे घर के बराबर तुम्हारा भी घर है — Hafeez Banarasi
उस से बढ़ कर किया मिलेगा और इनआम-ए-जुनूँ अब तो वो भी कह रहे हैं अपना दीवाना मुझे — Hafeez Banarasi
मैं ने आबाद किए कितने ही वीराने 'हफ़ीज़' ज़िंदगी मेरी इक उजड़ी हुई महफ़िल ही सही — Hafeez Banarasi
हर हक़ीक़त है एक हुस्न 'हफ़ीज़' और हर हुस्न इक हक़ीक़त है — Hafeez Banarasi
मिले फ़ुर्सत तो सुन लेना किसी दिन मिरा क़िस्सा निहायत मुख़्तसर है — Hafeez Banarasi
उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया — Hafeez Banarasi
कभी ख़िरद कभी दीवानगी ने लूट लिया तरह तरह से हमें ज़िंदगी ने लूट लिया — Hafeez Banarasi
तदबीर के दस्त-ए-रंगीं से तक़दीर दरख़्शाँ होती है क़ुदरत भी मदद फ़रमाती है जब कोशिश-ए-इंसाँ होती है — Hafeez Banarasi
चले चलिए कि चलना ही दलील-ए-कामरानी है जो थक कर बैठ जाते हैं वो मंज़िल पा नहीं सकते — Hafeez Banarasi
गुमशुदगी ही अस्ल में यारो राह-नुमाई करती है राह दिखाने वाले पहले बरसों राह भटकते हैं — Hafeez Banarasi
सभी के दीप सुंदर हैं हमारे क्या तुम्हारे क्या उजाला हर तरफ़ है इस किनारे उस किनारे क्या — Hafeez Banarasi

Ghazal

गुमराह कह के पहले जो मुझ से ख़फ़ा हुए आख़िर वो मेरे नक़्श-ए-क़दम पर फ़िदा हुए अब तक तो ज़िंदगी से तआ'रुफ़ न था कोई तुम से मिले तो ज़ीस्त से भी आश्ना हुए ऐसा नहीं कि दिल ही मुक़ाबिल नहीं रहा तीर-ए-निगाह-ए-नाज़ भी अक्सर ख़ता हुए मेरी नज़र ने तुम को जमाल-ए-आशना किया मुझ को दुआएँ दो कि तुम इक आईना हुए क्या होगा इस से बढ़ के कोई रब्त-ए-बाहमी मंज़िल हमारी वो तो हम उन का पता हुए अब क्या बताएँ किस की निगाहों की देन थी वो मय कि जिस के पीते ही हम पारसा हुए सुनता हूँ इक मुक़ाम-ए-ज़ियारत है आज कल वो ज़िंदगी का मोड़ जहाँ हम जुदा हुए वो आ गए दवाए-ए-ग़म-ए-जाँ लिए हुए लो आज हम भी क़ाइल-ए-दस्त-ए-दुआ हुए कब ज़िंदगी ने हम को नवाज़ा नहीं 'हफ़ीज़' कब हम पे बाब-ए-लुतफ़-ओ-इनायत न वा हुए — Hafeez Banarasi
ये और बात कि लहजा उदास रखते हैं ख़िज़ाँ के गीत भी अपनी मिठास रखते हैं कहें तो क्या कहें हम उन की सादा-लौही को जो क़ातिलों से तरह्हुम की आस रखते हैं किसी के सामने फैलाईं किस लिए दामन तुम्हारे दर्द की दौलत जो पास रखते हैं उन्हें हयात की तोहमत न दो अबस यारो जो अपना जिस्म न अपना लिबास रखते हैं क़रीब-ए-गुल-बदनाँ रह चुके हैं दीवाने ये ख़ार वो हैं जो फूलों की बास रखते हैं कहाँ भिगोए कोई अपने ख़ुश्क होंटों को ये दौर वो है कि दरिया भी प्यास रखते हैं ख़ुदा का शुक्र अदा कीजे ख़ुश-नसीबी पर 'हफ़ीज़' आप दिल-ए-ग़म-शनास रखते हैं — Hafeez Banarasi
ये हादसा भी शहर-ए-निगाराँ में हो गया बे-चेहरगी की भीड़ में हर चेहरा खो गया जिस को सज़ा मिली थी कि जागे तमाम उम्र सुनता हूँ आज मौत की बाँहों में सो गया हरकत किसी में है न हरारत किसी में है क्या शहर था जो बर्फ़ की चट्टान हो गया मैं उस को नफ़रतों के सिवा कुछ न दे सका वो चाहतों का बीज मिरे दिल में बो गया मरहम तो रख सका न कोई मेरे ज़ख़्म पर जो आया एक निश्तर-ए-ताज़ा चुभो गया या कीजिए क़ुबूल कि हर चेहरा ज़र्द है या कहिए हर निगाह को यरक़ान हो गया मैं ने तो अपने ग़म की कहानी सुनाई थी क्यूँँ अपने अपने ग़म में हर इक शख़्स खो गया उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं मेरा न हो सका वो किसी का तो हो गया इक माह-वश ने चूम ली पेशानी-ए-'हफ़ीज़' दिलचस्प हादसा था जो कल रात हो गया — Hafeez Banarasi
जो नज़र से बयान होती है क्या हसीं दास्तान होती है पत्थरों को न ठोकरें मारो पत्थरों में भी जान होती है जिस को छू दो तुम अपने क़दमों से वो ज़मीं आसमान होती है बे-पिए भी सुरूर होता है जब मोहब्बत जवान होती है ज़िंदगी तो उसी की है जिस पर वो नज़र मेहरबान होती है जितने ऊँचे ख़याल होते हैं उतनी ऊँची उड़ान होती है आरज़ू की ज़बाँ नहीं होती आरज़ू बे-ज़बान होती है जिस में शामिल हो तल्ख़ी-ए-ग़म भी कितनी मीठी वो तान होती है इन की नज़रों का हो फ़ुसूँ जिस में वो ग़ज़ल की ज़बान होती है ख़ार की ज़िंदगी-ए-बे-रौनक़ फूल की पासबान होती है कौन देता है रूह को आवाज़ जब हरम में अज़ान होती है इश्क़ की ज़िंदगी 'हफ़ीज़' न पूछ हर घड़ी इम्तिहान होती है — Hafeez Banarasi
इक शगुफ़्ता गुलाब जैसा था वो बहारों के ख़्वाब जैसा था पढ़ लिया हम ने हर्फ़ हर्फ़ उसे उस का चेहरा किताब कैसा था दूर से कुछ था और क़रीब से कुछ हर सहारा सराब जैसा था हम ग़रीबों के वास्ते हर रोज़ एक रोज़-ए-हिसाब जैसा था किस क़दर जल्द उड़ गया यारो वक़्त रंग-ए-शबाब जैसा था कैसे गुज़री है उम्र क्या कहिए लम्हा लम्हा अज़ाब जैसा था ज़हर था ज़िंदगी के साग़र में रंग रंग-ए-शराब जैसा था क्या ज़माना था वो ज़माना भी हर गुनह जब सवाब जैसा था कौन गर्दानता उसे क़ातिल वो तो इज़्ज़त-मआब जैसा था बे-हिजाबी के बावजूद भी कुछ इस के रुख़ पर हिजाब जैसा था जब भी छेड़ा तो इक फ़ुग़ाँ निकली दिल शिकस्ता रबाब जैसा था इस के रुख़ पर नज़र ठहर न सकी वो 'हफ़ीज़' आफ़्ताब जैसा था — Hafeez Banarasi
कोई बतलाए कि ये तुर्फ़ा तमाशा क्यूँँ है आदमी भीड़ में रहते हुए तन्हा क्यूँँ है पाँव फैलाए हुए ग़म का अँधेरा क्यूँँ है आ गई सुब्ह-ए-तमन्ना तो फिर ऐसा क्यूँँ है मैं तो इक ज़र्रा-ए-नाचीज़ हूँ और कुछ भी नहीं वो जो सूरज है मिरे नाम से जलता क्यूँँ है तुझ को निस्बत है अगर नाम-ए-बराहीम से कुछ आग को फूल समझ आग से डरता क्यूँँ है कौन सा अहद है जिस अहद में हम जीते हैं दश्त तो दश्त है दरिया यहाँ प्यासा क्यूँँ है पी के बहकेगा तो रुस्वाई-ए-महफ़िल होगी वो जो कम-ज़र्फ़ है मयख़ाने में आया क्यूँँ है कोई आसेब है या सिर्फ़ निगाहों का फ़रेब एक साया मुझे हर सू नज़र आता क्यूँँ है याद किस की मह-ओ-ख़ुर्शीद लिए आई है शब-ए-तारीक में आज इतना उजाला क्यूँँ है बद-हवा सेी का ये आलम कभी पहले तो न था हश्र से पहले ही ये हश्र सा बरपा क्यूँँ है — Hafeez Banarasi
लहू की मय बनाई दिल का पैमाना बना डाला जिगर-दारों ने मक़्तल को भी मय-ख़ाना बना डाला हमारे जज़्बा-ए-तामीर की कुछ दाद दो यारो कि हम ने बिजलियों को शम्अ' का शाना बना डाला सितम ढाते हो लेकिन लुत्फ़ का एहसास होता है इसी अंदाज़ ने दुनिया को दीवाना बना डाला भरी महफ़िल में हम ने बात कर ली थी उन आँखों से बस इतनी बात का यारों ने अफ़्साना बना डाला मिरे ज़ौक़-ए-परस्तिश की करिश्मा-साज़ियाँ देखो कभी का'बा कभी का'बे को बुत-ख़ाना बना डाला शिकायत बिजलियों से है न शिकवा बाद-ए-सरसर से चमन को ख़ुद चमन वालों ने वीराना बना डाला चलो अच्छा हुआ दुनिया 'हफ़ीज़' अब दूर है हम से मोहब्बत ने हमें दुनिया से बेगाना बना डाला — Hafeez Banarasi
हमारे अहद का मंज़र अजीब मंज़र है बहार चेहरे पे दिल में ख़िज़ाँ का दफ़्तर है न हम-सफ़र न कोई नक़्श-ए-पा न रहबर है जुनूँ की राह में कुछ है तो जान का डर है हर एक लम्हा हमें डर है टूट जाने का ये ज़िंदगी है कि बोसीदा काँच का घर है इसी से लड़ते हुए एक उम्र बीत गई मेरी अना ही मेरे रास्ते का पत्थर है तमाम जिस्म हैं जिस के ख़याल में लर्ज़ां वो तीरगी का नहीं रौशनी का ख़ंजर है मैं एक क़तरा हूँ लेकिन मेरा नसीब तो देख कि बे-क़रार मेरे ग़म में इक समुंदर है उसी के पीछे रवाँ हूँ मैं पागलों की तरह वो एक शय जो मेरी दस्तरस से बाहर है इसी ख़याल से मिलता है कुछ सुकूँ दिल को कि ना-सुबूरी तो इस दौर का मुक़द्दर है कभी तो इस से मुलाक़ात की घड़ी आए जो मेरे दिल में बसा है जो मेरे अंदर है उक़ाब-ए-ज़ुल्म के पंजे अभी कहाँ टूटे अभी तो फ़ाख़्ता-ए-अमन ख़ून में तर है ख़ुदा की मार हो इस जेहल-ए-आगही पे 'हफ़ीज़' ब-ज़ो'म-ए-ख़ुद यहाँ हर शख़्स इक पयम्बर है — Hafeez Banarasi
लब-ए-फ़ुरात वही तिश्नगी का मंज़र है वही हुसैन वही क़ातिलों का लश्कर है ये किस मक़ाम पे लाई है ज़िंदगी हम को हँसी लबों पे है सीने में ग़म का दफ़्तर है यक़ीन किस पे करें किस को दोस्त ठहराएँ हर आस्तीन में पोशीदा कोई ख़ंजर है गिला नहीं मिरे होंटों पे तंग-दस्ती का ख़ुदा का शुक्र मिरा दिल अभी तवंगर है कोई तो है जो धड़कता है ज़िंदगी बन कर कोई तो है जो हमारे दिलों के अंदर है उसे क़रीब से देखा तो ये हुआ मालूम वो बू-ए-गुल नहीं शमशीर-ए-बाद-ए-सरसर है समझ के आग लगाना हमारे घर में तुम हमारे घर के बराबर तुम्हारा भी घर है मिरी जबीं को हक़ारत से देखने वाले मिरी जबीं से तिरा आस्ताँ मुनव्वर है तुम्हारे क़ुर्ब की लज़्ज़त नसीब है जिस को वो एक लम्हा हयात-ए-अबद से बेहतर है हमारा जुर्म यही है कि हक़-परस्त हैं हम हमारे ख़ून का प्यासा हर एक ख़ंजर है वो मेरे सामने आए तो किस तरह आए कोई लिबास है उस का न कोई पैकर है हर इक बला से बचाए हुए है जो हम को हमारे सर पे ये माँ की दुआ की चादर है भटक रहा हूँ मैं सदियों से दश्त-ए-ग़ुर्बत में कोई तो मुझ को बताए कहाँ मिरा घर है अभी 'हफ़ीज़' गुलाबों की बात मत कीजे लहू-लुहान अभी गुलसिताँ का मंज़र है — Hafeez Banarasi