पत्थरों को न ठोकरें मारो
पत्थरों में भी जान होती है
जिस को छू दो तुम अपने क़दमों से
वो ज़मीं आसमान होती है
बे-पिए भी सुरूर होता है
जब मोहब्बत जवान होती है
ज़िंदगी तो उसी की है जिस पर
वो नज़र मेहरबान होती है
जितने ऊँचे ख़याल होते हैं
उतनी ऊँची उड़ान होती है
आरज़ू की ज़बाँ नहीं होती
आरज़ू बे-ज़बान होती है
जिस में शामिल हो तल्ख़ी-ए-ग़म भी
कितनी मीठी वो तान होती है
इन की नज़रों का हो फ़ुसूँ जिस में
वो ग़ज़ल की ज़बान होती है
ख़ार की ज़िंदगी-ए-बे-रौनक़
फूल की पासबान होती है
कौन देता है रूह को आवाज़
जब हरम में अज़ान होती है
इश्क़ की ज़िंदगी 'हफ़ीज़' न पूछ
हर घड़ी इम्तिहान होती है
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दिल की आवाज़ में आवाज़ मिलाते रहिए
जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए
जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए
दौलत-ए-इश्क़ नहीं बाँध के रखने के लिए
इस ख़ज़ाने को जहाँ तक हो लुटाते रहिए
ज़िंदगी भी किसी महबूब से कुछ कम तो नहीं
प्यार है उस से तो फिर नाज़ उठाते रहिए
ज़िंदगी दर्द की तस्वीर न बनने पाए
बोलते रहिए ज़रा हँसते हँसाते रहिए
रूठना भी है हसीनों की अदा में शामिल
आप का काम मनाना है मनाते रहिए
फूल बिखराता हुआ मैं तौ चला जाऊँगा
आप काँटे मिरी राहों में बिछाते रहिए
बे-वफ़ाई का ज़माना है मगर आप 'हफ़ीज़'
नग़्मा-ए-मेहर-ओ-वफ़ा सब को सुनाते रहिए
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एक सीता की रिफ़ाक़त है तो सब कुछ पास है
ज़िंदगी कहते हैं जिस को राम का बन-बास है
ज़िंदगी कहते हैं जिस को राम का बन-बास है
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