नहीं रखते थे हम ग़म को सँजोकर तुम सेे पहले

हँसा करते थे हम भी शाद हो पर तुम से पहले

हमारा इश्क़ तुमपे बोझ था तो बोल देते
दिल अपना तोड़ देते हम सितमगर तुम से पहले

निकल आए तुम्हारे बा'द घर से ऊब कर के
रहा करते थे हम भी अपने भीतर तुम से पहले

मेरे हालात पूछे और फिर पूछा तुम आए
गए हैं लोग जितने मुझ से मिल कर तुम से पहले

कहा हो मैं ने कितनी बार भी पर झूठ है ये
नहीं देखा था मैं ने तुम से बेहतर तुम से पहले

न होंगी तुम से नम अब्रे-करम वो रेत आँखें
इसी कोशिश में आया था समुंदर तुम से पहले

नहीं होता किसी पर जो तुम्हारे बा'द मोहित
हुआ करता था शायद हर किसी पर तुम से पहले

— Mohit Dixit

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