Ehsan Danish

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Ehsan Danish shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ehsan Danish's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

वफ़ा का अहद था दिल को सँभालने के लिए वो हँस पड़े मुझे मुश्किल में डालने के लिए — Ehsan Danish
हाँ आप को देखा था मोहब्बत से हमीं ने जी सारे ज़माने के गुनहगार हमीं थे — Ehsan Danish

Ghazal

मुझे पूछा है आ कर तुम ने उस अख़्लाक़-ए-कामिल से कि मैं शर्मिंदा हो कर रह गया अंदाज़ा-ए-दिल से नज़र के रुख़ को या तो दिल की जानिब फेर लेने दो नहीं तो सामने आ जाओ उठ कर पर्दा-ए-दिल से उमीदें उठ रही हैं सैकड़ों उम्मीदवारों की मैं तन्हा हूँ मगर तन्हा नहीं उठ्ठूँगा महफ़िल से अमीर-ए-कारवाँ जिस रौशनी के बल पे बढ़ता है निकलता है वो तारा सुब्ह होते ख़ाक-ए-मंज़िल से उन्हें दुनिया अब अश्क-ए-ग़म कहे या ख़ून की बूँदें मोहब्बत ने चराग़ आँखों में ला कर रख दिए दिल से अब उस नंग-ए-मोहब्बत से किनारा भी तो मुश्किल है मुझे जिस की मोहब्बत का यक़ीं आया था मुश्किल से अभी तो शाम है आग़ाज़ है परवाना-सोज़ी का कोई इस शम्अ' को आगाह कर दो सुब्ह-ए-महफ़िल से अभी तहक़ीक़ बेहतर है कि फिर शिकवा अबस होगा कि मीर-ए-कारवाँ वाक़िफ़ नहीं आदाब-ए-मंज़िल से मिटाने से कभी नक़्श-ए-मोहब्बत मिट नहीं सकता मिरा अफ़्साना निकलेगा तिरी रूदाद-ए-महफ़िल से ग़नीमत है नज़र रौशन है दिल अब तक धड़कता है मोहब्बत में तो ये आसानियाँ मिलती हैं मुश्किल से उफ़ुक़ के आइने में हो न हो धारे के साए में नज़र आती हैं तूफ़ानों की सरहद जैसे साहिल से तिरा जल्वा तो क्या तू ख़ुद भी तफ़रीह-ए-नज़र होता मिरी आँखों ने अब तक भीक माँगी ही नहीं दिल से सितम की आख़िरी मंज़िल पे इज़हार-ए-पशेमानी निकल आते हैं आँसू यूँँ तो हर दुखते हुए दिल से मैं इक ज़र्रा हूँ लेकिन वुसअ'त-ए-सहरा से वाक़िफ़ हूँ उठा सकता नहीं ख़ुद मीर-ए-महफ़िल मुझ को महफ़िल से तहय्या कर लिया तंग आ के गो तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का मगर अब फ़िक्र है ये ख़त उन्हें लिक्खेंगे किस दिल से मुझे 'एहसान' मेरे क़ाफ़िले वालों ने अब समझा कि ये ज़र्रा सितारा बन गया तक़दीर-ए-मंज़िल से — Ehsan Danish
रिंदान-ए-तिश्ना-काम को जा कर ख़बर करें आई बहार अब्र-ए-करम पर नज़र करें हूँ मुन्फ़इल ज़रूर मगर ऐ गुनाह-ए-इश्क़ अब अश्क भी नहीं हैं जो दामन को तर करें बे-वज्ह कब है पुर्सिश-ए-हाल-ए-शब-ए-फ़िराक़ मक़्सद ये है इज़ाफ़ा-ए-दर्द-ए-जिगर करें फ़ुर्सत के दिन हैं साक़ी-ए-मय-कश-नवाज़ उठ क्यूँँ इंतिज़ार-ए-मौसम-ए-दीवाना-गर करें मुझ पर उठा रहे हैं जो महफ़िल में उँगलियाँ अपनी हक़ीक़तों पे तो आख़िर नज़र करें का'बे में ख़ामोशी है सनम-ख़ाने में सुकूत सूरत-परस्त अब तिरे सज्दा किधर करें उफ़ रे जमाल-ए-जल्वा-ए-जानाँ की ताबिशें देखें उन्हें कि मातम-ए-ताब-ए-नज़र करें औराक़-ए-दो-जहाँ पे भी होगा न इख़्तिताम 'एहसान' सरगुज़श्त-ए-अलम मुख़्तसर करें — Ehsan Danish
शब ख़ुमार‌‌‌‌-ए-हुस्न-ए-साक़ी हैरत-ए-मयख़ाना था आप ही मय आप ही ख़ुम आप ही पैमाना था का'बा-ओ-दैर कलीसा में अबस ढूँडा किए दिल का हर गोशा मक़ाम-ए-जल्वा-ए-जानाना था रंग लाया है बरा-ए-दीदा-ए-अंजाम जो शम्अ' हर हर ज़र्रा-ए-ख़ाक-ए-पर-ए-परवाना था ख़ामी-ए-ज़ौक़-ए-नज़र थी वर्ना ऐ नाकाम-ए-इश्क़ ज़र्रे ज़र्रे से नुमायाँ जल्वा-ए-जानाना था फिर वही सौत-ए-तरब-अफ़ज़ा बने फ़िरदौस-ए-गोश जिस से इक आलम शहीद-ए-नग़्मा-ए-मस्ताना था दीद के क़ाबिल तमाशा था ये हंगाम-ए-सहर शम्अ' का हर साँस महव-ए-मातम-ए-परवाना था फ़ित्ना-ए-मज़हब भी ख़ुद-बीनी का इक अंदाज़ है वर्ना किस को इम्तियाज़-ए-मस्जिद-ओ-बुत-ख़ाना था — Ehsan Danish
हौसले मायूस ज़ौक़-ए-जुस्तुजू नाकाम है ये दिल-ए-ना-महरम-ए-अंजाम का अंजाम है आँख क्या है हुस्न की रंगीनियों का आइना दिल है क्या ख़ून-ए-तमन्ना का छलकता जाम है दीजिए बीमार-ए-उलफ़त की जिगर-दारी की दाद नज़्अ' का आलम है होंटों पर तुम्हारा नाम है फिर वो याद आए हुई मदहोश दिल की काएनात फिर उठा दर्द-ए-जिगर फिर कुछ मुझे आराम है ख़ाक-दान-ए-दहर में तस्कीन का जूया न हो आह जब तक दिल धड़कता है कहाँ आराम है वो तो दिल में दर्द की दुनिया बसा कर चल दिए मुझ को हर तार-ए-नफ़स इक मौत का पैग़ाम है वासिल-ए-मिज़राब-ए-ख़ामोशी है हर तार-ए-नफ़स उस से कह दो अब तिरे बीमार को आराम है कर रहा हूँ दोस्तों के ज़ो'म पर तर्क-ए-वतन शायद अब आग़ाज़-ए-दौर-ए-गर्दिश-ए-अय्याम है — Ehsan Danish
जबीं की धूल जिगर की जलन छुपाएगा शुरू-ए-इश्क़ है वो फ़ितरतन छुपाएगा दमक रहा है जो नस नस की तिश्नगी से बदन इस आग को न तिरा पैरहन छुपाएगा तिरा इलाज शिफ़ा-गाह-ए-अस्र-ए-नौ में नहीं ख़िरद के घाव तू दीवाना-पन छुपाएगा हिसार-ए-ज़ब्त है अब्र-ए-रवाँ की परछाईं मलाल-ए-रूह को कब तक बदन छुपाएगा नज़र का फ़र्द-ए-अमल से है सिलसिला दरकार यक़ीं न कर ये सियाही कफ़न छुपाएगा किसे ख़बर थी कि ये दौर-ए-ख़ुद-ग़रज़ इक दिन जुनूँ से क़ीमत-ए-दार-ओ-रसन छुपाएगा तिरा ग़ुबार ज़मीं पर उतरने वाला है कहाँ तक अब ये बगूला थकन छुपाएगा खुलेगा बाद-ए-नफ़स से जो रुख़ पे नील-कँवल उसे कहाँ तिरा उजला बदन छुपाएगा तिरे कमाल के धब्बे तिरे उरूज के दाग़ छुपाएगा तो कोई अहल-ए-फ़न छुपाएगा जिसे है फ़ैज़ मिरी ख़ानक़ाह से 'दानिश' वो किस तरह मिरा रंग-ए-सुख़न छुपाएगा — Ehsan Danish
रुमूज़-ए-बे-ख़ुदी समझे न असरार-ए-ख़ुदी समझे बड़ी शय है अगर अपनी हक़ीक़त आदमी समझे ज़िया अंदर ज़िया तनवीर दर तनवीर ज़ौ दर ज़ौ कोई आख़िर कहाँ तक राज़-हा-ए-ज़िंदगी नहीं हटती नज़र अंजाम-ए-आलम से नहीं हटती उसे कोई ख़ुदी गर्दान ले या बे-ख़ुदी समझे बहुत मुश्किल है इस मेआ'र की रिंदी ज़माने में जो लग़्ज़िश को गुनह और बे-ख़ुदी को ज़िंदगी समझे जब एहसास-ए-बुलंदी पस्त कर देता है फ़ितरत को ये मुश्किल है फिर इंसाँ आदमी को आदमी समझे जुनूँ इक मंज़िल-ए-बे-नाम को तय करता जाता है किसे फ़ुर्सत है जो सूद-ओ-ज़ियान-ए-ज़िंदगी समझे हमें तो मुद्दतों से जुस्तुजू है ऐसे इंसाँ की हमारी ज़िंदगी को भी जो अपनी ज़िंदगी समझे जला पाती है इस से रूह दिल बेदार होता है बड़ी मुद्दत में हम 'एहसान' क़द्र-ए-मुफ़्लिसी समझे — Ehsan Danish
वफ़ाएँ कर के जफ़ाओं का ग़म उठाए जा इसी तरह से ज़माने को आज़माए जा किसी में अपनी सिफ़त के सिवा कमाल नहीं जिधर इशारा-ए-फ़ितरत हो सर झुकाए जा वो लौ रबाब से निकली धुआँ उठा दिल से वफ़ा का राग इसी धुन में गुनगुनाए जा नज़र के साथ मोहब्बत बदल नहीं सकती नज़र बदल के मोहब्बत को आज़माए जा ख़ुदी-ए-इश्क़ ने जिस दिन से खोल दीं आँखें है आँसुओं का तक़ाज़ा कि मुस्कुराए जा नहीं है ग़म तो मोहब्बत की तर्बियत नाक़िस हवादिस आएँ तो नरमी से पेश आए जा थी इब्तिदा में ये तादीब-ए-मुफ़लिसी मुझ को ग़ुलाम रह के ग़ुलामी पे मुस्कुराए जा बदल न राह ख़िरद के फ़रेब में आ कर जुनूँ के नक़्श-ए-क़दम पर क़दम बढ़ाए जा उम्मीद ओ यास में जीना है इश्क़ का मक़्सूद इसी मक़ाम-ए-मुक़द्दस पे तिलमिलाए जा चमन में फ़ुर्सत ओ तस्कीं है मौत का पैग़ाम सुकूँ पसंद न कर आशियाँ बनाए जा यही है लुत्फ़-ए-मोहब्बत यही है कैफ़-ए-हयात हक़ीक़तों की बिना पर फ़रेब खाए जा वफ़ा का ख़्वाब है 'एहसान' ख़्वाब-ए-बे-ताबीर वफ़ाएँ कर के मुक़द्दर को आज़माए जा — Ehsan Danish
हज़ारों ग़म हैं इस मंज़िल में मंज़िल देखने वाले कलेजा थाम ले अपना मिरा दिल देखने वाले ये दिल वालों को ता'लीम-ए-सुजूद पा-ए-जानाँ है सर-ए-हर-मौज को बरपा-ए-साहिल देखने वाले हर इक ज़र्रे में पोशीदा है इक तुग़्यान-ए-मदहोशी सँभल कर देखना पैमाना-ए-दिल देखने वाले मिटाता जा रहा हूँ नक़्श-ए-पा सहरा-नवर्दी में कहाँ ढूँडेंगे मुझ को मेरी मंज़िल देखने वाले तेरे दिल में हज़ारों महफ़िलें जल्वों की पिन्हाँ हैं फ़लक पर अंजुम-ए-ताबाँ की महफ़िल देखने वाले फ़िशार-ए-ज़ब्त से लैला कहीं मजनूँ न हो जाए न देख अब सू-ए-महमिल सू-ए-महमिल देखने वाले किसी का अक्स हूँ 'एहसान' मुराआत-ए-हक़ीक़त में मुझे समझेंगे क्या तस्वीर-ए-बातिल देखने वाले — Ehsan Danish
मैं अवाम में हूँ लेकिन नहीं ख़ू-ए-आमियाना न अमल ख़ुशामदाना न सुख़न ख़ुशामदाना तिरी और ज़िंदगी है मिरी और ज़िंदगी है मैं बुलंदियों का जूया तो असीर-ए-आशियाना मुझे रास ही न आई कभी नाक़िसों की सोहबत मिरे जिस्म-ए-ना-तवाँ में नहीं रूह-ए-ताजिराना मिरे ख़िज़्र के क़दम हैं मुझे मशअ'ल-ए-मनाज़िल मिरे दीदा-ए-तलब में है निगाह‌‌‌‌-ए-मुजरिमाना ग़म-ओ-रंज का छुपाना भी है कार-ए-ज़र्फ़ लेकिन है ख़ुशी को ज़ब्त करना रह-ओ-रस्म-ए-आक़िलाना तिरी तमकनत अगर है किसी दूसरे के बल पर ये चलन है बाग़ियाना ये क़दम है मुजरिमाना मुझे ख़िज़्र-ए-नौ की हाजत नहीं राह-ए-बंदगी में मिरे मस्लक-ए-वफ़ा में ये रविश है काफ़िराना — Ehsan Danish
ज़िंदगी में उस को कैफ़-ए-ज़िंदगी हासिल नहीं जिस का दिल राज़-ओ-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नहीं हुस्न के पर्दे में हो सकता नहीं हरगिज़ क़रार रोज़-ए-अव्वल से ये लैला ख़ूगर-ए-महमिल नहीं क़द्र कर दिल की कि दरगाह-ए-ख़ुदा में ऐ नदीम दो-जहाँ की ने'मतें हाज़िर हैं लेकिन दिल नहीं होशियार ऐ मस्त-ओ-मदहोश-ए-जवानी होशियार इश्क़ वो दरिया है जो मिन्नत-कश-ए-साहिल नहीं ज़ब्त-ए-नाला ज़ब्त-ए-गिर्या ज़ब्त-ए-उल्फ़त ज़ब्त-ए-शौक़ किस तरह कह दूँ कि ये आसानियाँ मुश्किल नहीं अपना रस्ता अपनी धुन अपना तसव्वुर अपना शौक़ कोई भी रहबरो यहाँ बेगाना-ए-मंज़िल नहीं है तसव्वुर इशरत-ए-माज़ी का आईना-ब-दस्त दिल वही दिल है मगर वो गर्मी-ए-महफ़िल नहीं देर क्या है आ मिरे दिल में समा जा बर्क़-ए-नाज़ शिकवा-संजी फ़ितरत-ए-एहसान में दाख़िल नहीं इल्तिमास-ए-शौक़ पर 'एहसान' महशर ढह गया उन का शरमा कर ये कहना मैं तिरे क़ाबिल नहीं — Ehsan Danish
जला है हाए किस जान-ए-चमन की शम-ए-महफ़िल से महक फूलों की आती है शरार-ए-आतिश-ए-दिल से ये दामान-ए-हवादिस से क़यामत तक न गुल होगा चराग़-ए-दिल मिरा रौशन है उन की शम-ए-महफ़िल से जनाब-ए-ख़िज़्र हम को ख़ाक रस्ते पर लगाएँगे कि मंज़िल बे-ख़ुदों की है मुअर्रा क़ैद-ए-मंज़िल से ठहर भी ऐ ख़याल-ए-हश्र और इक जाम पीने दे सरकता है अभी ज़ुल्मत का पर्दा ख़ाना-ए-दिल से सहर ने ले के अँगड़ाई तिलिस्म-ए-नाज़-ए-शब तोड़ा फ़लक पर हुस्न की शमएँ उठीं तारों की महफ़िल से बढ़ा है कौन ये गिर्दाब की ख़ूराक होने को कि उट्ठा शोर-ए-मातम यक-ब-यक अम्बोह-ए-साहिल से मिरी बालीं से उठ कर रोने वालो ये भी सोचा है चला हूँ किस की महफ़िल में उठा हूँ किस की महफ़िल से है उस कम्बख़्त को ज़िद सोज़-ए-बातिन से पिघल जाऊँ निगाहों ने तुम्हारी कह दिया है क्या मिरे दिल से न दामन-गीर-ए-दिल हो ना-ख़ुदा फिर कोई नज़्ज़ारा ख़ुदा के वास्ते कश्ती बढ़ा आग़ोश-ए-साहिल से सिपुर्द-ए-बे-ख़ुदी कर दे फ़राएज़ अक़्ल-ए-ख़ुद-बीं के हटा दे इस सियह-बातिन का पहरा ख़ाना-ए-दिल से हर इक ज़र्रा है दिल ऐ जाने वाले देख कर चलना हज़ारों हस्तियाँ लिपटी पड़ी हैं ख़ाक-ए-मंज़िल से मिरी बेबाक नज़रें उन की जानिब उठ ही जाती हैं अभी 'एहसान' मैं वाक़िफ़ नहीं आदाब-ए-महफ़िल से — Ehsan Danish
करते करते इमतिज़ाज-ए-का'बा-ओ-बुतख़ाना हम उस जगह पहुँचे कि हो कर रह गए दीवाना हम साँस ले सकते नहीं अफ़्सोस आज़ादाना हम जाने कब से हैं असीर-ए-का'बा-ओ-बुतख़ाना हम वो मोहब्बत ही नहीं जिस में न हों शिकवे-गिले इक कहानी तुम सुनाए जाओ इक अफ़्साना हम देर-पा निकली न फ़ानूस-ए-ख़िरद की रौशनी बढ़ गई वहशत बिल-आख़िर हो गए दीवाना हम हर दो-जानिब एहतियात अच्छी है जब तक हो सके यूँँ तो मैं आगाह सब तुम शम्अ' हो परवाना हम अब हक़ीक़त क्या कहें किस से कहें क्यूँँ कर कहें कुछ तो देखा है कि जिस से हो गए दीवाना हम दामन-ए-दिल शबनम-ओ-गुल से पकड़ लेता है आग ख़िलक़तन हम हैं जवाब-ए-फ़ितरत-ए-परवाना हम पासबाँ मफ़हूम-ओ-मा'नी को बयाँ करते रहें सुनने वाले सुन चुके हैं कह चुके अफ़्साने हम आ चुका होगा सर-ए-तूर-ए-वफ़ा मूसा को होश अब तुझे तकलीफ़ देंगे जल्वा-ए-जानाना हम जीते-जी की अंजुमन है जीते-जी का सोज़-ओ-साज़ हो गईं जिस वक़्त बंद आँखें न फिर दुनिया न हम हम जो मिट जाएँ तो फ़र्क़-ए-दैर-ओ-काबा भी मिटे एक पर्दा हैं मियान-ए-का'बा-ओ-बुत-ख़ाना हम इल्तिजा ही इल्तिजा बाक़ी है शिकवा हो चुके अब मोहब्बत तुम से करते हैं परस्ताराना हम जब वो करते हैं मोहब्बत पर मुसलसल गुफ़्तुगू ऐसा कुछ महसूस होता है कि हैं बेगाना हम — Ehsan Danish
इश्क़ कब अपने मक़ासिद का निगहबाँ न हुआ कौन सा ग़म है जो आख़िर ग़म-ए-जानाँ न हुआ लाख चाहा मगर अफ़्सोस कि आँसू न थमें ज़ब्त-ए-ग़म मुझ से ब-क़द्र-ए-ग़म पिन्हाँ न हुआ तेरी इशरत है कि गर्दूं के दबाए न दबी मेरा ग़म है कि हँसी में भी नुमायाँ न हुआ ग़म-ए-दुनिया ग़म-ए-उक़्बा ग़म-ए-हस्ती ग़म-ए-मौत कोई ग़म भी तो हरीफ़-ए-ग़म-ए-जानाँ न हुआ ज़र्रे ज़र्रे से ये ऐलान-ए-परेशानी है मुतमइन ख़ाक वो होगा जो परेशाँ न हुआ जिस के दामन से है वाबस्ता मिरा ज़ौक़-ए-हयात वो भी काफ़िर मिरे मेआ'र का इंसाँ न हुआ मैं रहा गरचे हर एहसास पे मसरूफ़-ए-सुजूद कोई सज्दा भी तिरी शान के शायाँ न हुआ बर्फ़-ज़ार-ज़र-ओ-दौलत का हर अफ़्सुर्दा ज़मीर ज़मज़मों से मिरे कब शो'ला-ब-दामाँ न हुआ बर्क़ नाकाम मह-ओ-मेहर कवाकिब मायूस न हुआ मेरे नशेमन में चराग़ाँ न हुआ मेरे तख़्लीक़-ए-अदब में है क़सीदा मादूम मुझ से 'एहसान' किसी वक़्त ये इस्याँ न हुआ — Ehsan Danish
कहाँ महफ़िल में मुझ तक बादा-ए-गुलफ़ाम आता है जो मेरा नाम आता है तो ख़ाली जाम आता है न आओ तुम तो फिर क्यूँँ हिचकियों पर हिचकियाँ आएँ इन्हें रोको ये क्यूँँ पैग़ाम पर पैग़ाम आता है ये सावन ये घटा ये बिजलियाँ ये टूटती रातें भला ऐसे में दिल वालों को कब आराम आता है अदब ऐ जज़्बा-ए-बेबाक ये आह-ओ-फ़ुग़ाँ कैसी कि ऐसी ज़िंदगी से मौत पर इल्ज़ाम आता है मदद ऐ मर्ग-ए-नाकामी नक़ाहत का ये आलम है बड़ी मुश्किल से होंटों तक किसी का नाम आता है ख़ुदा रक्खे तुझे ऐ सर-ज़मीन-ए-शहर-ए-ख़ामोशाँ यहीं आ कर हर इक बेचैन को आराम आता है मआ'ज़-अल्लाह मिरी आँखों का इज़हार‌‌‌-ए-तंग-ज़र्फ़ी टपक पड़ते हैं आँसू जब तुम्हारा नाम आता है ज़माने में नहीं दिल-दादा-ए-मेहर-ओ-वफ़ा कोई तुझे धोका है ऐ दिल कौन किस के काम आता है — Ehsan Danish
रहे जो ज़िंदगी में ज़िंदगी का आसरा हो कर वही निकले सरीर-आरा क़यामत में ख़ुदा हो कर हक़ीक़त-दर-हक़ीक़त बुत-कदे में है न काबे में निगाह-ए-शौक़ धोके दे रही है रहनुमा हो कर मआल-ए-कार से गुलशन की हर पत्ती लरज़ती है कि आख़िर रंग-ओ-बू उड़ जाएँगे इक दिन हवा हो कर अभी कल तक जवानी के ख़ुमिस्ताँ थे निगाहों में ये दुनिया दो ही दिन में रह गई है क्या से क्या हो कर मिरे सज्दों की या रब तिश्ना-कामी क्यूँँ नहीं जाती ये क्या बे-ए'तिनाई अपने बंदे से ख़ुदा हो कर सिरिश्त-ए-दिल में किस ने कूट कर भर दी है बे-ताबी अज़ल में कौन या रब मुझ से बैठा था ख़फ़ा हो कर ये पिछली रात ये ख़ामोशियाँ ये डूबते तारे निगाह-ए-शौक़ बहकी फिर रही है इल्तिजा हो कर बला से कुछ हो हम 'एहसान' अपनी ख़ू न छोड़ेंगे हमेशा बे-वफ़ाओं से मिलेंगे बा-वफ़ा हो कर — Ehsan Danish
मिरे मिटाने की तदबीर थी हिजाब न था वगरना कौन से दिन हुस्न बे-नक़ाब न था अगरचे नाज़कश-ए-साग़र-ए-शराब न था ख़ुमार-ख़ाने में मुझ सा कोई ख़राब न था खुला तिलिस्म-ए-तमन्ना तो खुल गया ये भी कि इक फ़रेब-ए-नज़र था तिरा शबाब न था ख़याल-ए-दोस्त तिरी जल्वा-ताबियों की क़सम जो तू न था मिरी दुनिया में आफ़्ताब न था तिरे फ़िराक़ की रातें थीं इस क़दर मग़्मूम कि दाग़-ए-ख़ातिर-ए-महज़ूँ था माहताब न था बुरा हो नाला-ए-पैहम का कुछ दिनों पहले ख़मोश रात के दिल में ये पेच-ओ-ताब न था निगाह मिलते ही ग़श खा के गिर पड़ीं नज़रें थी एक बर्क़-ए-मुशक्कल तिरा शबाब न था अज़ल के दिन से हैं हम मस्त-ए-जल्वा-ए-साक़ी हमारे सामने किस रोज़ आफ़्ताब न था कुछ अपने साज़-ए-नफ़स की न क़द्र की तू ने कि इस रबाब से बेहतर कोई रबाब न था दिल-ए-ख़राब का 'एहसान' अब ख़ुदा-हाफ़िज़ ख़राब था मगर ऐसा कभी ख़राब न था — Ehsan Danish
कुछ इस तरह से तसव्वुर में आ रहा है कोई चराग़ रूह में जैसे जला रहा है कोई कोई कलीम उठे वर्ना इंतिज़ार के बा'द चराग़-ए-तूर-ए-मोहब्बत बुझा रहा है कोई वो दैर का था कि का'बे का ये नहीं मा'लूम मिरी ख़ुदी का मुहाफ़िज़ ख़ुदा रहा है कोई जो रोकना हो तो आ बढ़ के रोक ले वर्ना तिरे हदूद-ए-तग़ाफ़ुल से जा रहा है कोई रवाँ-दवाँ नहीं बे-वज्ह कारवान-ए-हयात मुझे ज़रूर कहीं से बुला रहा है कोई बदल रहे हैं जुनून-ओ-ख़िरद के पैमाने किस एहतिमाम-ए-तग़य्युर से आ रहा है कोई न कुछ मलाल-ए-असीरी न ख़तरा-ए-सय्याद क़फ़स समझ के नशेमन बना रहा है कोई ज़मीन-ओ-चर्ख़ ने इनकार कर दिया जिस से वो बार दोश-ए-वफ़ा पर उठा रहा है कोई जहान-ए-नौ में ब-रंग-ए-कशाकश-ए-पैहम हयात-ए-नौ के सलीक़े सिखा रहा है कोई ख़बर करो ये हक़ाएक़ के पासबानों को मजाज़ खो के हक़ीक़त में आ रहा है कोई न जाने कौन सी मंज़िल में इश्क़ है कि मुझे मिरे हुदूद से बाहर बुला रहा है कोई डरो ख़ुदा से बड़ा बोल बोलने वालो क़रीब हम से भी बे-इंतिहा रहा है कोई मुझे सितम में इज़ाफ़े का ग़म नहीं लेकिन यक़ीन कर कि मिरे बा'द आ रहा है कोई निगाह-ओ-लब में हँसी की सकत नहीं लेकिन ब-जब्र-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा मुस्कुरा रहा है कोई ये सुब्ह-ओ-शाम की यूरिश ये मौसमों की रविश कि जैसे मेरे तआ'क़ुब में आ रहा है कोई किसी को इस की ख़बर ही नहीं थी कुछ 'एहसान' कि मिट के अपना ज़माना बना रहा है कोई — Ehsan Danish
बिछड़ कर उन से यूँँ ग़म में गुज़ारी ज़िंदगी हम ने सहर तारीक देखी सुर्ख़ पाई चाँदनी हम ने हमें दा'वा नहीं तन्हा निबाही दोस्ती हम ने मोहब्बत को सँभाला है कभी तुम ने कभी हम ने ख़ुशी ग़म में नज़र आई ख़ुशी में ग़म नज़र आया अभी दुनिया पे डाली थी निगाह-ए-सरसरी हम ने बड़ी बेचारगी निकली बहुत ही नारसी पाई अज़ल के रोज़ बढ़ कर ले तो ली थी बंदगी हम ने जहाँ साज़-ए-मोहब्बत पर मुग़न्नी गा नहीं सकता वहाँ नग़्मा अलापा है कभी तुम ने कभी हम ने तुम्हें होगे निगाह-ए-शौक़ का मरकज़ तुम्हीं होगे अगर इस ज़िंदगी के बा'द पाई ज़िंदगी हम ने हमारे सामने हर-वक़्त अंजाम-ए-शिकायत थी कही को अन-कही कर दी सुनी को अन-सुनी हम ने भरेगी इस में रंग 'एहसान' दुनिया इंक़िलाबों से लहू से अपने इक तस्वीर ऐसी खींच दीं हम ने — Ehsan Danish
आँख में आँसू हैं एहसास-ए-मसर्रत दिल में है एक फ़िरदौस-ए-नज़ारा आप की महफ़िल में है हर जफ़ा तेरी मुनासिब हर सितम तेरा दुरुस्त अब वही मेरी तमन्ना है जो तेरे दिल में है जब ब-जुज़ महबूब हो जाती है ओझल काएनात इक मक़ाम ऐसा भी जज़्ब-ए-शौक़ की मंज़िल में है फ़स्ल-ए-गुल में बे-तहाशा हँसने वालो होशियार इज़्तिराब-ए-दिल का पहलू भी सुकून-ए-दिल में है जिस को दूरी से हुज़ूरी में सिवा हो इज़्तिराब वो परेशान-ए-मोहब्बत किस क़दर मुश्किल में है दहर के हंगामा-ए-शैख़-ओ-बरहमन से बुलंद और भी हंगामा इक गिर्दाब-ए-नूह-ए-दिल में है अब कोई शायान-ए-जल्वा है न शायान-ए-कलाम तू उसी मंज़िल में बेहतर है कि जिस मंज़िल में है ना-सज़ा है इस के जल्वों की नज़ाकत के लिए वो ग़म-ए-हासिल जो तेरे इश्क़ के हासिल में है मैं तो ख़ुद उठने को हूँ बदलो न अंदाज़-ए-नज़र तुम जो कहते हिचकिचाते हो वो मेरे दिल में है अपने मरकज़ से सितारों पर जो करता हूँ नज़र जिस को जिस मंज़िल में छोड़ा था उसी मंज़िल में है मोम कर देती है जो फ़ौलाद-ओ-आहन का जिगर वो भी इक झंकार आवाज़-ए-शिकस्त-ए-दिल में है कौन है 'एहसान' मेरी ज़िंदगी का राज़दार क्या कहूँ किस तरह मरने की तमन्ना दिल में है — Ehsan Danish