हुजूम-ए-रंज से दिल को मसर्रत होती जाती है
कि मुझ पर आइना अपनी हक़ीक़त होती जाती है
ये किस ता'मीर-ए-नाक़िस की भरी जाती हैं बुनियादें
कि दुनिया बे-चराग़-ए-आदमियत होती जाती है
वो बे-पर्दा हरीम-ए-शाइ'री में आते जाते हैं
मुरत्तब मेरी तारीख़-ए-मोहब्बत होती जाती है
मैं जितना उन के अस्बाब-ए-जफ़ा पर ग़ौर करता हूँ
मुझे अपनी वफ़ाओं पर नदामत होती जाती है
ब-ईं हालात-ए-मायूसी ब-ईं औसाफ़-ए-महरूमी
मोहब्बत है कि मुहताज-ए-मोहब्बत होती जाती है
ज़बाँ सी लें तिरे कहने से लेकिन इस को क्या कीजे
शिकायत जब नहीं होती हिकायत होती जाती है
है मेरा 'इश्क़ यक दर-गीर मोहकम-गीर से बाला
मिरी नज़रों में दुनिया ख़ूबसूरत होती जाती है
अरे तौबा गुनाहों के सियह-ख़्वाबों से बेदारी
कि आँखें खुलती जाती हैं नदामत होती जाती है
यूँँही तज्दीद-ए-पैमान-ए-वफ़ा कीजे मिरे हम-दम
बड़ी आसान तशरीह-ए-मोहब्बत होती जाती है
मोहब्बत रफ़्ता रफ़्ता ढल रही है वज़ा-दारी में
ये किस रफ़्तार से बरपा क़यामत होती जाती है
जिसे तस्वीर कहना कुफ़्र है आईन-ए-उल्फ़त में
वही तनवीर मा'बूद-ए-मोहब्बत होती जाती है
मआल-ए-रंज-ओ-राहत देखता जाता है दिल जितना
तमन्ना मावरा-ए-रंज-ओ-राहत होती जाती है
न हो मेरे न तुम मुझ को किसी का होने देते हो
क़यामत क्या ये बाला-ए-क़यामत होती जाती है
बेहम-दिल्लाह मैं 'एहसान' इस मंज़िल पे आ पहुँचा
मुसीबत जब नहीं होती मुसीबत होती जाती है
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