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ख़ुशी तन्हा नहीं आती जिलौ में ग़म भी होता है
जहाँ हँसती हैं कलियाँ गिर्या-ए-शबनम भी होता है
नई तहज़ीब के में'मार शायद उस से ग़ाफ़िल हैं
ब-ईं आसार-ए-आलम दरहम-ओ-बरहम भी होता है
जो आँखें घूंघटों में रोज़ के फ़ाक़ों से पुर-नम हैं
उन आँखों में फुसून-ए-इस्मत-ए-मरियम भी होता है
ब-ईमा-ए-ख़िरद तुम देखते हो जिस को नफ़रत से
वो दीवाना ख़िरद की अस्ल का महरम भी होता है
रबाब-ए-ज़ि़ंदगी के ज़मज़मों पर झूमने वाले
हर इक नग़्में में ना-मालूम सा मातम भी होता है
वो इंसाँ नाज़ करता है जो अव्वल से शराफ़त पर
बहकता है तो नंग-ए-अज़्मत-ए-आदम भी होता है
जवानी सैल-ए-शेर-ओ-बादा-ए-नग़्मा सही लेकिन
ये तूफ़ान-ए-लताफ़त ख़ुद-ब-ख़ुद मद्धम भी होता है
जिसे कोई समझ ले सादगी से हासिल-ए-हस्ती
वो जब हासिल नहीं होता तो आख़िर ग़म भी होता है
तबस्सुम फूल बरसाता है जिन रंगीन होंटों से
उन्हीं होंटों पे इक दिन नाला-ए-पैहम भी होता है
ब-जुज़ ज़ात-ए-ख़ुदा 'एहसान' कोई भी नहीं अपना
सुना था लाख दुश्मन हों तो इक हमदम भी होता है
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हक़ीक़त-दर-हक़ीक़त बुत-कदे में है न काबे में
निगाह-ए-शौक़ धोके दे रही है रहनुमा हो कर
मआल-ए-कार से गुलशन की हर पत्ती लरज़ती है
कि आख़िर रंग-ओ-बू उड़ जाएँगे इक दिन हवा हो कर
अभी कल तक जवानी के ख़ुमिस्ताँ थे निगाहों में
ये दुनिया दो ही दिन में रह गई है क्या से क्या हो कर
मिरे सज्दों की या रब तिश्ना-कामी क्यूँ नहीं जाती
ये क्या बे-ए'तिनाई अपने बंदे से ख़ुदा हो कर
सिरिश्त-ए-दिल में किस ने कूट कर भर दी है बे-ताबी
अज़ल में कौन या रब मुझ से बैठा था ख़फ़ा हो कर
ये पिछली रात ये ख़ामोशियाँ ये डूबते तारे
निगाह-ए-शौक़ बहकी फिर रही है इल्तिजा हो कर
बला से कुछ हो हम 'एहसान' अपनी ख़ू न छोड़ेंगे
हमेशा बे-वफ़ाओं से मिलेंगे बा-वफ़ा हो कर
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आया नहीं है राह पे चर्ख़-ए-कुहन अभी
ख़तरे में देखता हूँ चमन का चमन अभी
ख़तरे में देखता हूँ चमन का चमन अभी
उट्ठेंगे अपनी बज़्म से मंसूर सैकड़ों
काम अहल-ए-हक़ के आएँगे दार-ओ-रसन अभी
रंज-ओ-मेहन निगाह जो फेरें तो फेर लें
लेकिन मुझे अज़ीज़ हैं रंज-ओ-मेहन अभी
बढ़ने दो और शौक़-ए-शहादत अवाम में
कुछ बाँझ तो नहीं है ये ख़ाक-ए-वतन अभी
आँखों की सुर्ख़ियाँ हैं अज़ाएम का इश्तिहार
सीने सुलग रहे हैं लगी है लगन अभी
ये कारवाँ शनावर-ए-तूफ़ाँ तो है मगर
चेहरों पे बोलती है सफ़र की थकन अभी
हैं सामने हमारे रिवायात-ए-कार-ज़ार
बाँधे हुए हैं सर से मुजाहिद कफ़न अभी
बन बन के जाने कितने फ़ना होंगे सोमनात
बस्ते हैं हर गली में यहाँ बुत-शिकन अभी
ऐ शहरयार हम से शिकस्ता-दिलों में आ
तेरी तरफ़ से ख़ल्क़ को है हुस्न-ए-ज़न अभी
रक़्साँ अभी हैं शाम-ए-ग़रीबाँ की झलकियाँ
रौशन नहीं है ख़ंदा-ए-सुब्ह-ए-वतन अभी
जीते रहें उमीद पे रिंदान-ए-तिश्ना-काम
चलता नहीं है दौर-ए-शराब-ए-कुहन अभी
जिन के लहू से क़स्र-ए-वफ़ा में जले चराग़
इन ग़म-ज़दों में आम हैं रंज-ओ-मेहन अभी
गुलशन से फूल चल के मज़ारों तक आ गए
लेकिन है बाग़बाँ की जबीं पर शिकन अभी
है इल्म की निगाह से पिन्हाँ रह-ए-अमल
कहते नहीं कफ़न को यहाँ पैरहन अभी
नब्ज़-ए-बहार पर हैं बगूलों की उँगलियाँ
चलने को चल रही है नसीम-ए-चमन अभी
शबनम के अश्क सूखने देती नहीं फ़ज़ा
हँसता है ख़ुद बहार-ए-चमन पर चमन अभी
हर गाम हर मक़ाम पे कोशिश के बावजूद
'दानिश' न आ सका मुझे जीने का फ़न अभी
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नज़र फ़रेब-ए-क़ज़ा खा गई तो क्या होगा
हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा
हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा
ब-ज़ोम-ए-होश तजल्ली की जुस्तुजू बे-सूद
जुनूँ की ज़द पे ख़िरद आ गई तो क्या होगा
नई सहर के बहुत लोग मुंतज़िर हैं मगर
नई सहर भी जो कजला गई तो क्या होगा
न रहनुमाओं की मज्लिस में ले चलो मुझ को
मैं बे-अदब हूँ हँसी आ गई तो क्या होगा
शबाब-ए-लाला-ओ-गुल को पुकारने वालो
ख़िज़ाँ-सरिश्त बहार आ गई तो क्या होगा
ख़ुशी छनी है तो ग़म का भी ए'तिमाद न कर
जो रूह ग़म से भी उकता गई तो क्या होगा
ये फ़िक्र कर कि इन आसूदगी के धोकों में
तिरी ख़ुदी को भी मौत आ गई तो क्या होगा
लरज़ रहे हैं जिगर जिस से कोहसारों के
अगर वो लहर यहाँ आ गई तो क्या होगा
वो मौत जिस की हम 'एहसान' सुन रहे हैं ख़बर
रुमूज़-ए-ज़ीस्त भी समझा गई तो क्या होगा
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बँधा हुआ है बहारों का अब वहीं ताँता
जहाँ रुका था मैं काँटे निकालने के लिए
कोई नसीम का नग़्मा कोई शमीम का राग
फ़ज़ा को अम्न के क़ालिब में ढालने के लिए
ख़ुदा न कर्दा ज़मीं पाँव से अगर खिसकी
बढ़ेंगे तुंद बगूले सँभालने के लिए
उतर पड़े हैं किधर से ये आँधियों के जुलूस
समुंदरों से जज़ीरे निकालने के लिए
तिरे सलीक़ा-ए-तरतीब-ए-नौ का क्या कहना
हमीं थे क़र्या-ए-दिल से निकालने के लिए
कभी हमारी ज़रूरत पड़ेगी दुनिया को
दिलों की बर्फ़ को शो'लों में ढालने के लिए
ये शो'बदे ही सही कुछ फ़ुसूँ-गरों को बुलाओ
नई फ़ज़ा में सितारे उछालने के लिए
है सिर्फ़ हम को तिरे ख़ाल-ओ-ख़द का अंदाज़ा
ये आइने तू हैं हैरत में डालने के लिए
न जाने कितनी मसाफ़त से आएगा सूरज
निगार-ए-शब का जनाज़ा निकालने के लिए
मैं पेश-रौ हूँ इसी ख़ाक से उगेंगे चराग़
निगाह-ओ-दिल के उफ़ुक़ को उजालने के लिए
फ़सील-ए-शब से कोई हाथ बढ़ने वाला है
फ़ज़ा की जेब से सूरज निकालने के लिए
कुएँ में फेंक के पछता रहा हूँ ऐ 'दानिश'
कमंद थी जो मिनारों पर डालने के लिए
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आज भड़की रग-ए-वहशत तिरे दीवानों की
क़िस्मतें जागने वाली हैं बयाबानों की
क़िस्मतें जागने वाली हैं बयाबानों की
फिर घटाओं में है नक़्क़ारा-ए-वहशत की सदा
टोलियाँ बंध के चलीं दश्त को दीवानों की
आज क्या सूझ रही है तिरे दीवानों को
धज्जियाँ ढूँढ़ते फिरते हैं गरेबानों की
रूह-ए-मजनूँ अभी बेताब है सहराओं में
ख़ाक बे-वजह नहीं उड़ती बयाबानों की
उस ने 'एहसान' कुछ इस नाज़ से मुड़ कर देखा
दिल में तस्वीर उतर आई परी-ख़ानों की
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लोग यूँ देख के हँस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे
इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूँ न मिल हम से ख़ुदा हो जैसे
मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ
मुझ पे एहसान किया हो जैसे
ऐसे अंजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे
हिचकियाँ रात को आती ही रहीं
तू ने फिर याद किया हो जैसे
ज़िंदगी बीत रही है 'दानिश'
एक बे-जुर्म सज़ा हो जैसे
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