लम्हा-दर-लम्हा तिरी राह तका करती है
एक खिड़की तिरी आमद की दुआ करती है
सिलवटें चीख़ती रहती हैं मिरे बिस्तर की
करवटों में ही मिरी रात कटा करती है
वक़्त थम जाता है अब रात गुज़रती ही नहीं
जाने दीवार-घड़ी रात में क्या करती है
चाँद खिड़की में जो आता था नहीं आता अब
तीरगी चारों तरफ़ रक़्स किया करती है
मेरे कमरे में उदासी है क़यामत की मगर
एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है
अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए
आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए
रोना इलाज-ए-ज़ुल्मत-ए-दुनिया नहीं तो क्या
कम-अज़-कम एहतिजाज-ए-ख़ुदाई है रोइए
तस्लीम कर लिया है जो ख़ुद को चराग़-ए-हक़
दुनिया क़दम क़दम पे सबाई है रोइए
ख़ुश हैं तो फिर मुसाफ़िर-ए-दुनिया नहीं हैं आप
इस दश्त में बस आबला-पाई है रोइए
हम हैं असीर-ए-ज़ब्त इजाज़त नहीं हमें
रो पा रहे हैं आप बधाई है रोइए
किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है
कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है
न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ
मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है
वो सवाल जिसका जवाब है मेरी ज़िन्दगी
मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है
मैं बिछड़ के तुझसे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ
ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है