Abbas Qamar
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क्यूँ ढूँढ़ रहे हो कोई मुझ सा मेरे अंदर
कुछ भी न मिलेगा तुम्हें मेरा मेरे अंदर
कुछ भी न मिलेगा तुम्हें मेरा मेरे अंदर
गवारा-ए-उम्मीद सजाए हुए हर रोज़
सो जाता है मासूम सा बच्चा मेरे अंदर
बाहर से तबस्सुम की क़बा ओढ़े हुए हूँ
दरअस्ल हैं महशर कई बरपा मेरे अंदर
ज़ेबाइश-ए-माज़ी में सियह-मस्त सा इक दिल
देता है बग़ावत को बढ़ावा मेरे अंदर
सपनों के तआक़ुब में है आज़ुर्दा हक़ीक़त
होता है यही रोज़ तमाशा मेरे अंदर
मैं कितना अकेला हूँ तुम्हें कैसे बताऊँ
तन्हाई भी हो जाती है तन्हा मेरे अंदर
अंदोह की मौजों को इन आँखों में पढ़ो तो
शायद ये समझ पाओ है क्या क्या मेरे अंदर
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अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए
आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए
आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए
रोना इलाज-ए-ज़ुल्मत-ए-दुनिया नहीं तो क्या
कम-अज़-कम एहतिजाज-ए-ख़ुदाई है रोइए
तस्लीम कर लिया है जो ख़ुद को चराग़-ए-हक़
दुनिया क़दम क़दम पे सबाई है रोइए
ख़ुश हैं तो फिर मुसाफ़िर-ए-दुनिया नहीं हैं आप
इस दश्त में बस आबला-पाई है रोइए
हम हैं असीर-ए-ज़ब्त इजाज़त नहीं हमें
रो पा रहे हैं आप बधाई है रोइए
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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है
कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है
कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है
न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ
मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है
वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी
मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है
मैं बिछड़ के तुझ से बुलंदियों पे जो पस्त हूँ
ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है
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मेरे कमरे में उदासी है क़यामत की मगर
एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है
एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है
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अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए
आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए
आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए
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हम आसमाँ के लोग थे जन्नत से आए थे
ख़ुद को मगर ज़मीं में बोना पड़ा हमें
ख़ुद को मगर ज़मीं में बोना पड़ा हमें
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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है
कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है
कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है
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