Abbas Qamar

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@abbas-qamar

Abbas Qamar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Abbas Qamar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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Sher

मैं पीछे भागने वालों में सब से आगे हूँ ये मेरी आख़िरी कोशिश है ख़ुद को पाने की — Abbas Qamar
तन्हाई से चौंके जो कभी ख़ुद को पुकारा ख़ामोशी से घबराए तो ज़ंजीर हिला दी — Abbas Qamar
हालत-ए-हाल से बेगाना बना रक्खा है ख़ुद को माज़ी का निहाँ-ख़ाना बना रक्खा है — Abbas Qamar
मेरे कमरे में उदासी है क़यामत की मगर एक तस्वीर पुरानी सी हँसा करती है — Abbas Qamar
अश्कों को आरज़ू-ए-रिहाई है रोइए आँखों की अब इसी में भलाई है रोइए — Abbas Qamar
जब तक जला ये हम भी जले इस के साथ साथ जब बुझ गया चराग़ तो सोना पड़े हमें — Abbas Qamar
जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे वहाँ भी हम दिया बनने की कोशिश कर रहे थे — Abbas Qamar
एक सोफ़ा है जिसे तेरी ज़रूरत है बहुत एक कुर्सी है जो मायूस रहा करती है — Abbas Qamar
कट गई उम्र हमारी ये शिकायत करते अपने जैसा कोई मिलता तो मुहब्बत करते — Abbas Qamar
उन्हें आँखों ने बे-दर्दी से बे-घर कर दिया है ये आँसू क़हक़हा बनने की कोशिश कर रहे थे — Abbas Qamar
हम हैं असीर-ए-ज़ब्त इजाज़त नहीं हमें रो पा रहे हैं आप बधाई है रोइए — Abbas Qamar
इस क़दर जज़्ब हो गए दोनों दर्द खेंचूँ तो दिल निकल आए — Abbas Qamar
हम आसमाँ के लोग थे जन्नत से आए थे ख़ुद को मगर ज़मीं में बोना पड़ा हमें — Abbas Qamar
मंज़िल मिली तो उस की कमी हम को खा गई सामान रास्ते में जो खोना पड़ा हमें — Abbas Qamar
आप की सादा दिली ख़ुद आप की तौहीन है हुस्न वालों को ज़रा मग़रूर होना चाहिए — Abbas Qamar
किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है — Abbas Qamar

Ghazal

मेरी परछाइयाँ गुम हैं मेरी पहचान बाक़ी है सफ़र दम तोड़ने को है मगर सामान बाक़ी है अभी तो ख़्वाहिशों के दरमियाँ घमासान बाक़ी है अभी इस जिस्म-ए-फ़ानी में ज़रा सी जान बाक़ी है इसे तारीकियों ने क़ैद कर रक्खा है बरसों से मेरे कमरे में बस कहने को रौशनदान बाक़ी है तुम्हारा झूट चेहरे से अयाँ हो जाएगा इक दिन तुम्हारे दिल के अंदर था जो वो शैतान बाक़ी है गुज़ारी उम्र जिस की बंदगी में वो है ला-हासिल अजब सरमाया-कारी है नफ़ा'-नुक़सान बाक़ी है अभी ज़िंदा है बूढ़ा बाप घर की ज़िन्दगी बनकर फ़क़त कमरे जुदा हैं बीच में दालान बाक़ी है ग़ज़ल ज़िंदा है उर्दू के अदब-बरदार ज़िंदा हैं हमारी तर्बियत में अब भी हिंदोस्तान बाक़ी है — Abbas Qamar
क्यूँ ढूँढ़ रहे हो कोई मुझ सा मेरे अंदर कुछ भी न मिलेगा तुम्हें मेरा मेरे अंदर गवारा-ए-उम्मीद सजाए हुए हर रोज़ सो जाता है मासूम सा बच्चा मेरे अंदर बाहर से तबस्सुम की क़बा ओढ़े हुए हूँ दरअस्ल हैं महशर कई बरपा मेरे अंदर ज़ेबाइश-ए-माज़ी में सियह-मस्त सा इक दिल देता है बग़ावत को बढ़ावा मेरे अंदर सपनों के तआक़ुब में है आज़ुर्दा हक़ीक़त होता है यही रोज़ तमाशा मेरे अंदर मैं कितना अकेला हूँ तुम्हें कैसे बताऊँ तन्हाई भी हो जाती है तन्हा मेरे अंदर अंदोह की मौजों को इन आँखों में पढ़ो तो शायद ये समझ पाओ है क्या क्या मेरे अंदर — Abbas Qamar
हम ऐसे सर-फिरे दुनिया को कब दरकार होते हैं अगर होते भी हैं बे-इंतिहा दुश्वार होते हैं ख़मोशी कह रही है अब ये दो-आबा रवाँ होगा हवा चुप हो तो बारिश के शदीद आसार होते हैं ज़रा सी बात है इस का तमाशा क्या बनाएँ हम इरादे टूटते हैं हौसले मिस्मार होते हैं शिकायत ज़िंदगी से क्यूँँ करें हम ख़ुद ही थम जाएँ जो कम-रफ़्तार होते हैं वो कम-रफ़्तार होते हैं गले में ज़िंदगी के रीसमान-ए-वक़्त है तो क्या परिंदे क़ैद में हों तो बहुत हुश्यार होते हैं जहाँ वाले मुक़य्यद हैं अभी तक अहद-ए-तिफ़्ली में यहाँ अब भी खिलौने रौनक़-ए-बाज़ार होते हैं गुलू-ए-ख़ुश्क उन को भेजता है दे के मश्कीज़ा कुछ आँसू तिश्ना-कामों के अलम-बरदार होते हैं बदन उन को कभी बाहर निकलने ही नहीं देता 'क़मर-अब्बास' तो बा-क़ाएदा तय्यार होते हैं — Abbas Qamar