सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप

आप का में'यार देखा कितने मे'यारी हैं आप

सारे दरिया सब समुंदर मुंतज़िर हैं आप के
जाइए बहिए मिरी आँखों से क्यूँ जारी हैं आप

उफ़ तलक करते नहीं ज़िल्ल-ए-इलाही के ख़िलाफ़
आप को दरबार की आदत है दरबारी हैं आप

आप की आज़ादियाँ हैं आप ही के हाथ में
जिस पे क़ुदरत भी है नाज़ाँ वो गिरफ़्तारी हैं आप

जिस्म के पिंजरे में ले कर घूमिए नन्ही सी जान
चंद साँसों की मिरे प्यारे अदाकारी हैं आप

— Abbas Qamar

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