तेरी आग़ोश में सर रक्खा सिसक कर रोए
मेरे सपने मेरी आँखों से छलक कर रोए
सारी ख़ुशियों को सरे आम झटक कर रोए
हम भी बच्चों की तरह पाँव पटक कर रोए
रास्ता साफ़ था मंज़िल भी बहुत दूर न थी
बीच रस्ते में मगर पाँव अटक कर रोए
जिस घड़ी क़त्ल हवाओं ने चराग़ों का किया
मेरे हमराह जो जुगनू थे फफक कर रोए
क़ीमती ज़िद थी ग़रीबी भी भला क्या करती
माँ के जज़्बात दुलारों को थपक कर रोए
अपने हालात बयाँ करके जो रोई धरती
चाँद तारे किसी कोने में दुबक कर रोए
बा-मशक्कत भी मुकम्मल न हुई अपनी ग़ज़ल
चंद नुक्ते मेरे काग़ज़ से सरक कर रोए
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