उस की पेशानी पे जो बल आए

दो-जहाँ में उथल-पुथल आए

ख़्वाब का बोझ इतना भारी था
नींद पलकों पे हम कुचल आए

इस क़दर जज़्ब हो गए दोनों
दर्द खेंचूँ तो दिल निकल आए

रूह का नंगापन छिपाने को
जिस्म कपड़े बदल बदल आए

जिस पे हर चीज़ टाल रक्खी है
जाने किस रोज़ मेरा कल आए

गुलमोहर की तलाश थी मुझ को
मेरे हिस्से मगर कँवल आए

— Abbas Qamar

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