ये जानते हैं ठीक नहीं माँग रहे हैंहम एक खंडहर को मकीं माँग रहे हैंसब माँग रहे हैं ख़ुदा से तेरा जिस्म औरहम हैं, कि फ़क़त तेरी जबीं माँग रहे हैं— Siddharth Saaz