वो वक़्त का जहाज़ था करता लिहाज़ क्या
मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया
मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया
9
16 Likes
लहू से अपने ज़मीं लाला-ज़ार देखते थे
बहार देखने वाले बहार देखते थे
बहार देखने वाले बहार देखते थे
सुरूर एक झलक का तमाम उम्र रहा
हवस-परस्त थे जो बार बार देखते थे
कभी कभी हमें दुनिया हसीन लगती थी
कभी कभी तिरी आँखों में प्यार देखते थे
चला वो दौर-ए-सितम घर में छुप के बैठ गए
जो हर सलीब को मर्दाना-वार देखते थे
7
0 Likes
Hafeez Merathi
6
0 Likes
Hafeez Merathi
5
0 Likes
ज़िक्र छिड़ जाए अगर क़ौम की बद-बख़्ती का
रहनुमाओं की तरफ़ कोई इशारा न करो
ज़ेहन संजीदा मसाइल से हटाने के लिए
रोज़ ये शैख़ ओ बरहमन का तमाशा न करो
एक भी लफ़्ज़ हटाने की नहीं गुंजाइश
मेरे पैग़ाम-ए-मोहब्बत का ख़ुलासा न करो
ये तअल्लुक़ की ख़राशें भी मज़ा देती हैं
रूठ जाए कोई तुम से तो मनाया न करो
आज भी मैं नहीं इंसाँ से मायूस कि जब
लोग कहते हैं ख़ुदा पर भी भरोसा न करो
4
0 Likes
तकोगे यूँही हवाओं का मुँह भला कब तक
ये ना-ख़ुदाओं से इक रोज़ बादबाँ बोला
चमन में सब की ज़बाँ पर थी मेरी मज़लूमी
मिरे ख़िलाफ़ जो बोला तो बाग़बाँ बोला
यही बहुत है कि ज़िंदा तो हो मियाँ-साहब
ज़माना सुन के मिरे ग़म की दास्ताँ बोला
हिसार-ए-जब्र में ज़िंदा बदन जलाए गए
किसी ने दम नहीं मारा मगर धुआँ बोला
असर हुआ तो ये तक़रीर का कमाल नहीं
मिरा ख़ुलूस मुख़ातब था मैं कहाँ बोला
कहा न था कि नवाज़ेंगे हम 'हफ़ीज़' तुझे
उड़ा के वो मिरे दामन की धज्जियाँ बोला
3
0 Likes
बे-सहारों का इंतिज़ाम करो
या'नी इक और क़त्ल-ए-आम करो
या'नी इक और क़त्ल-ए-आम करो
ख़ैर-ख़्वाहों का मशवरा ये है
ठोकरें खाओ और सलाम करो
दब के रहना हमें नहीं मंज़ूर
ज़ालिमो जाओ अपना काम करो
ख़्वाहिशें जाने किस तरफ़ ले जाएँ
ख़्वाहिशों को न बे-लगाम करो
मेज़बानों में हो जहाँ अन-बन
ऐसी बस्ती में मत क़याम करो
आप छट जाएँगे हवस वाले
तुम ज़रा बे-रुख़ी को आम करो
ढूँडते हो गिरों पड़ों को क्यूँ
उड़ने वालों को ज़ेर-ए-दाम करो
देने वाला बड़ाई भी देगा
तुम समाई का एहतिमाम करो
बद-दुआ दे के चल दिया वो फ़क़ीर
कह दिया था कि कोई काम करो
ये हुनर भी बड़ा ज़रूरी है
कितना झुक कर किसे सलाम करो
सर-फिरों में अभी हरारत है
इन जियालों का एहतिराम करो
साँप आपस में कह रहे हैं 'हफ़ीज़'
आस्तीनों का इंतिज़ाम करो
2
0 Likes
आबाद रहेंगे वीराने शादाब रहेंगी ज़ंजीरें
जब तक दीवाने ज़िंदा हैं फूलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें
जब तक दीवाने ज़िंदा हैं फूलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें
आज़ादी का दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोलेंगी ज़ंजीरें
टुकड़े टुकड़े हो जाएँगी जब हद से बढ़ेंगी ज़ंजीरें
जब सब के लब सिल जाएँगे हाथों से क़लम छिन जाएँगे
बातिल से लोहा लेने का एलान करेंगी ज़ंजीरें
अंधों बहरों की नगरी में यूँ कौन तवज्जोह करता है
माहौल सुनेगा देखेगा जिस वक़्त बजेंगी ज़ंजीरें
जो ज़ंजीरों से बाहर हैं आज़ाद उन्हें भी मत समझो
जब हाथ कटेंगे ज़ालिम के उस वक़्त कटेंगी ज़ंजीरें
ज़ंजीरें तो कट जाएँगी हाँ उन के निशाँ रह जाएँगे
मेरा क्या है ज़ालिम तुझ को बदनाम करेंगी ज़ंजीरें
ये दौर भी हैं सय्यादी के ये ढंग भी हैं जल्लादी के
सिमटेगी सिकुड़ेंगी ज़ंजीरें फैलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें
ले दे के 'हफ़ीज़' उन से ही थी उम्मीद-ए-वफ़ा दीवानों को
क्या होगा जब दीवानों से नाता तोड़ेंगी ज़ंजीरें
1
0 Likes










