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Bano Tahira Sayeed

Top 10 of Bano Tahira Sayeed

Bano Tahira Sayeed

Top 10 of Bano Tahira Sayeed

    पुजारन
    तेरी थाली के फूल
    सूरज की किरनों से कुम्हला जाएँगे
    माला भी सूख जाएगी मूर्ती की गर्दन में
    प्रेम की माला गूँध
    आँसुओं के मोती से
    अपनी मध-भरी तानों में कोई ब्याकुल राग अलाप
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    Bano Tahira Sayeed
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    आकाश पे दीप सितारों के
    धरती पर फूल बहारों के
    सब्ज़े पर शबनम के मोती
    सावन की हवा ठंडी ठंडी
    ये मेरे बिखरे सपने हैं

    लहराते हुए बहते चश्में
    चश्मों के नशात-आगीं नग़्में
    कोहसार के रंगीं शाम-ओ-सहर
    जंगल के हसीं दिलकश मंज़र
    ये मेरे बिखरे सपने हैं

    बिजली की कड़क बादल की गरज
    ख़ूँ-बार शफ़क़ ढलता सूरज
    महताब में नींद जवानी की
    और ख़ुशबू रात की रानी की
    ये मेरे बिखरे सपने हैं

    दरिया साहिल कश्ती लंगर
    हीरे मोती कंकर पत्थर
    परियों के महल इन्दर की सभा
    तीखी चितवन बाँका चेहरा
    ये मेरे बिखरे सपने हैं

    नज़्में ग़ज़लें आहें नग़्में
    ख़ून-ए-जिगर कुछ दल के टुकड़े
    भूली-बिसरी बीती बातें
    ग़म की अनोखी सी सौग़ातें
    ये मेरे बिखरे सपने हैं
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    Bano Tahira Sayeed
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    सोते सोते जो यकायक कभी खुल जाती है आँख
    नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र
    कहकशाँ से भी ज़ियादा है लताफ़त उस में
    आख़िर-ए-शब के मह-ए-नीम-फ़रोज़ाँ की तरह
    ख़्वाब-आवर सी शुआ'ओं में है लिपटी लिपटी
    फिर भी इस नर्म निगाही में हैं क्या तीर छुपे
    तंज़ है तल्ख़ी-ए-दौराँ का इक अफ़्साना है
    इस में हसरत भी शिकायत भी ग़म-ए-फ़ुर्क़त भी
    दिल लरज़ जाता है और होती है वहशत तारी
    मुझ को महसूस ये होता है कि मुजरिम मैं हूँ
    ऐसा लगता है कि तोड़ा है किसी के दिल को
    दिल जो मासूम था बे-लौस था पाकीज़ा था
    क्या करूँ क्या न करूँ कोई मुदावा भी नहीं
    कुछ समझ में नहीं आता ये मुअ'म्मा क्या है
    नींद से उठते ज़रा डर सा मुझे लगता है
    नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र
    आह वो मीठी नज़र तल्ख़ नज़र पाक नज़र
    तीर-ओ-नश्तर हैं छुपे कितनी है सफ़्फ़ाक नज़र
    याद कुछ भी नहीं आता मुझे उस के आगे
    हाँ किसी युग में किसी ने मिरी पूजा की थी
    मैं ने उस को तो मगर ग़ौर से देखा भी नहीं
    प्यार की भेंट चढ़ाने कभी आया था कोई
    मैं ने मुँह फेर लिया देवी थी मैं पत्थर की
    लेकिन इस बात को कितने ही जनम बीत गए
    फिर भी पीछा मिरा करने से न वो बाज़ आया
    यूँ ही सदियों से है मेरे ही लिए आवारा
    नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र
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    Bano Tahira Sayeed
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    कितनी मीठी ज़बाँ कैसी प्यारी ज़बाँ
    मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ
    इस में राधा के पायल की झंकार है
    ज़ुल्फ़-ए-ज़ेब-उन-निसा की भी महकार है
    इस में झांसी की रानी की ललकार है
    साज़-ओ-नग़्मा के हम-राह तलवार है
    उस के दामन में हैं कितनी रंगीनियाँ
    मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ

    हिन्द माता की बेटी है उर्दू ज़बाँ
    साँवली चुलबुली नौजवाँ गुल-फ़िशाँ
    हिन्दू मुस्लिम के इख़्लास की दास्ताँ
    इत्तिहाद-ओ-मोहब्बत का क़ौमी निशाँ
    क्यूँ इसे ग़ैर कहता है ना-क़दर-दाँ
    मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ

    इस में सरमस्ती-ए-जाम-ए-शीराज़ है
    नज्द का सोज़ है हिन्द का साज़ है
    अपनी हर-दिल-अज़ीज़ी में मुम्ताज़ है
    अहल-ए-हिन्दोस्ताँ की ये आवाज़ है
    इस को कहते हैं सब दिल-कश-ओ-ख़ुश-बयाँ
    मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ

    बोली जाती है कश्मीर से रास तक
    समझी जाती है गुजरात मद्रास तक
    ग़ैरियत की नहीं इस में बू-बास तक
    नफ़रतों का नहीं इस को एहसास तक
    ख़ास हिन्दोस्तानी है उर्दू ज़बाँ
    मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ

    कह रही है ये भारत से उर्दू ज़बाँ
    मुझ से नाराज़ क्यूँ मादर-ए-मेहरबाँ
    तू मिरी मैं तिरी हमदम-ओ-राज़-दाँ
    फिर लगा ले गले से मुझे मेरी माँ
    'ताहिरा' कुछ परेशाँ है उर्दू ज़बाँ
    मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ
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    Bano Tahira Sayeed
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    मेरे आज़ाद वतन तेरी बहारों को सलाम
    तेरी पुर-कैफ़ फ़ज़ा तेरे नज़ारों को सलाम
    जिन की ख़िदमात से चमकी है वतन की क़िस्मत
    जगमगाते हुए उन चाँद सितारों को सलाम
    कारवाँ जिन का लुटा राह में आज़ादी की
    क़ौम का मुल्क का उन दर्द के मारों को सलाम
    लिख गए अपने लहू से जो वफ़ा के क़िस्से
    उन शहीदों पे दरूद उन के मज़ारों को सलाम
    'ताहिरा' सालगिरह आज है आज़ादी की
    हिन्द के ख़ुर्द-ओ-कलाँ साथियों प्यारों को सलाम
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    Bano Tahira Sayeed
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    बे-ख़बर हूँ होश का आलम नहीं
    ये भी कुछ उस की इनायत कम नहीं

    मेरे होंटों पर तबस्सुम देख कर
    क्यूँ समझते हो कि दिल में ग़म नहीं

    शान-ए-ग़म इस में नहीं आँसू बहें
    क़हक़हे भी आँसुओं से कम नहीं

    जल उठा है दिल में इक ऐसा चराग़
    रौशनी जिस की कभी मद्धम नहीं

    चश्म-ए-शाइर चश्म है नर्गिस नहीं
    इस का हासिल ख़ून है शबनम नहीं

    'ताहिरा' जिस में न हो सोज़-ए-दरूँ
    सिर्फ़ इक हैवान है आदम नहीं
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    Bano Tahira Sayeed
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    फिर याद आ गई किसी शीरीं-दहन की बात
    जिस की हर एक बात है शेर-ओ-सुख़न की बात

    अंजान बन के हाल-ए-ग़म-ए-दिल न पूछिए
    आ जाएगी ज़बान पे ज़ख़्म-ए-कुहन की बात

    सुब्ह-ए-बहार लुत्फ़-ए-सुख़न रंग-ए-रू-ए-गुल
    हर हुस्न में निहाँ है तिरे बाँकपन की बात

    क्यूँ अंदलीब चुप है सबा माजरा है क्या
    गुलशन में हो रही है जो ज़ाग़-ओ-ज़ग़न की बात

    दिल्ली बहुत हसीन है दिलकश है लखनऊ
    लेकिन ये और ही है हमारे दकन की बात

    सुनते रहे ज़माने की कड़वी कड़ी मगर
    कहने न पाए 'ताहिरा' हम अपने मन की बात
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    Bano Tahira Sayeed
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    सद-रश्क-ए-अंजुमन हैं ये तन्हाइयाँ मिरी
    सूरज मिरा सितारे मिरे कहकशाँ मिरी

    माना कि क़हक़हे नहीं मेरे नसीब में
    सरमाया-ए-नशात है आह-ओ-फ़ुग़ाँ मिरी

    हर तल्ख़ तजरबे ने कहा हँस के मुझ से यूँ
    आएँगी काम तेरे यही तल्ख़ियाँ मिरी

    रंग-ए-बहार रंग-ए-ग़ज़ल रंग-ए-ख़ून-ए-दिल
    डूबी हर एक रंग में है दास्ताँ मिरी

    झुकता नहीं ये सर किसी सरकश के सामने
    पाइंदा बाद-ए-रिफ़अत-ए-फ़िक्र-ए-जवाँ मिरी

    तूफ़ान-ओ-इंक़लाब के अफ़्साने बन गए
    उल्टा असर दिखा गईं ख़ामोशियाँ मिरी

    जब 'ताहिरा' मिलेगा न नेमुल-बदल मिरा
    याद आएँगी ज़माने को तब ख़ूबियाँ मिरी
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    Bano Tahira Sayeed
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    मर मर के जिए यूँ दुनिया में जीने का सलीक़ा भूल गए
    बेनाम-ओ-निशाँ कुछ ऐसे हुए हम नाम भी अपना भूल गए

    सहरा से हुई निस्बत जब से वीरानों में महफ़िल जमती है
    ऐ जोश जुनूँ तेरे सदक़े आबादी से रिश्ता भूल गए

    सब हौसले दिल के पस्त हुए साहिल पे सफ़ीना क्या पहुँचा
    मौजों से उलझना छोड़ दिया तूफ़ानों से लड़ना भूल गए

    इक ख़्वाब सा जैसे देखा था ता'बीर न थी कोई जिस की
    आवाज़ है कुछ कुछ याद मगर नक़्श-ए-रुख़-ए-ज़ेबा भूल गए

    अब किस का सहारा बाक़ी है अब किस से शिफ़ा माँगे कोई
    बीमारी ने अपना काम किया तुम जब से मसीहा भूल गए

    इतना है हमारा अफ़्साना ऐ 'ताहिरा' इतना याद रहे
    मुरझाए हुए ग़ुंचे की तरह खिलने की तमन्ना भूल गए
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    Bano Tahira Sayeed
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    मुझे तड़पा के शरमाता तो होगा
    किए पर अपने पछताता तो होगा

    न लगता होगा दिल बाग़-ए-इरम में
    कभी घर मेरा याद आता तो होगा

    शिकस्त-ए-ज़िंदगी दे कर मुझे यूँ
    वो फ़ातेह बन के इतराता होगा

    कभी याद आ ही जाते होंगे वो दिन
    तेरा दिल भी तड़प जाता तो होगा

    नहीं तर्क-ए-मोहब्बत इतना आसाँ
    तसव्वुर मेरा रुलवाता तो होगा

    सुकून-ए-ज़िंदगी में होगी हलचल
    दिल-ए-मग़्मूम घबराता तो होगा

    तबस्सुम छिन गया होगा लबों से
    वो दिल ही दिल में ग़म खाता तो होगा

    बहार-ए-रफ़्ता आती होगी जब याद
    जुनूँ में सर को टकराता तो होगा

    ब-ज़ाहिर ख़ुश सही लेकिन कहाँ ख़ुश
    बनावट कर के थक जाता तो होगा

    वफ़ाएँ मेरी याद आती न होंगी
    तिरी आँखों में अश्क आता होगा

    ये माना बे-मुरव्वत संग-दिल है
    मगर पत्थर पिघल जाता तो होगा

    न जानी बे-वफ़ा ने क़द्र-ए-ने'मत
    मुझे अब खो के पछताता तो होगा

    दिल-ए-महज़ूँ में टीस उठती न होगी
    ख़याल-ए-'ताहिरा' आता तो होगा
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    Bano Tahira Sayeed
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Balmohan PandeyBalmohan PandeyWaheed AkhtarWaheed AkhtarKhurram AfaqKhurram AfaqQamar JameelQamar JameelTajdeed QaiserTajdeed QaiserMunawwar RanaMunawwar RanaJaun EliaJaun EliaKhalil Ur Rehman QamarKhalil Ur Rehman QamarTahir FarazTahir FarazIbrahim AshkIbrahim Ashk