Bano Tahira Sayeed

Bano Tahira Sayeed

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Bano Tahira Sayeed shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Bano Tahira Sayeed's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कारवाँ जिन का लुटा राह में आज़ादी की क़ौम का मुल्क का उन दर्द के मारों को सलाम — Bano Tahira Sayeed

Ghazal

तक़ाज़े हैं शायद यही आज-कल के बहारों में रख दें गुलों को मसल के मिरी तल्ख़ थी मुस्कुराहट कुछ ऐसी ग़म-ए-ज़िंदगी रह गया हाथ मल के हमें क्या डराते हो मिटने के डर से ज़माना न रख दे तुम्हें ख़ुद कुचल के फ़ज़ा में ये धीमी सी आहट है कैसी सबा है कि उन के क़दम हल्के हल्के ये दिल है शिकस्ता उमीदों की बस्ती यहाँ आइएगा सँभल के सँभल के अजब है ये दुनिया अजब उस की रस्में कहीं पर उजाले कहीं पर धुँदलके न की मैं ने तक़लीद-ए-शैख़-ओ-बरहमन ख़ुदा मिल गया इस भँवर से निकल के सुना है बहिश्त-ए-ज़मीं मै-कदा है चलो 'ताहिरा' देख लें क्यूँ न चल के — Bano Tahira Sayeed
बीसवीं सदी के हम शाइ'र-ए-परेशाँ हैं मसअलों में उलझे हैं फ़िक्र-ओ-ग़म में ग़लताँ हैं डूब कर उभर आए मौत से गले मिल कर अपनी सख़्त-जानी के ख़ुद ही हम निगहबाँ हैं हम तो ठहरे दीवाने हम तो ठहरे सहराई अहल-ए-फ़हम-ओ-दानिश के चाक क्यूँँ गरेबाँ हैं कब हिसाब माँगा था आप की जफ़ाओं का क्यूँँ झुकी झुकी नज़रें किस लिए पशेमाँ हैं आज तक है ग़म ताज़ा दोस्त से बिछड़ने का अब भी आँखें रोती हैं ज़ख़्म-ए-दिल-फरोज़ाँ हैं सब के हम रहे अपने कौन है मगर अपना ढूँढ़ते हैं अपनों को हम भी कितने नादाँ हैं 'ताहिरा' ज़माने की करवटों का क्या कहना होंगे ये भी वीराने आज जो गुलिस्ताँ हैं — Bano Tahira Sayeed
मर मर के जिए यूँँ दुनिया में जीने का सलीक़ा भूल गए बेनाम-ओ-निशाँ कुछ ऐसे हुए हम नाम भी अपना भूल गए सहरा से हुई निस्बत जब से वीरानों में महफ़िल जमती है ऐ जोश जुनूँ तेरे सदक़े आबादी से रिश्ता भूल गए सब हौसले दिल के पस्त हुए साहिल पे सफ़ीना क्या पहुँचा मौजों से उलझना छोड़ दिया तूफ़ानों से लड़ना भूल गए इक ख़्वाब सा जैसे देखा था ता'बीर न थी कोई जिस की आवाज़ है कुछ कुछ याद मगर नक़्श-ए-रुख़-ए-ज़ेबा भूल गए अब किस का सहारा बाक़ी है अब किस से शिफ़ा माँगे कोई बीमारी ने अपना काम किया तुम जब से मसीहा भूल गए इतना है हमारा अफ़्साना ऐ 'ताहिरा' इतना याद रहे मुरझाए हुए ग़ुंचे की तरह खिलने की तमन्ना भूल गए — Bano Tahira Sayeed
हद से गुज़र गया ग़म-ए-दौराँ कभी कभी दामन में अश्क हो गए ग़लताँ कभी कभी जब ज़ो'म-ए-अक़्ल-ओ-होश से कुछ भी न बन सका काम आ गई है जुरअत-ए-रिंदाँ कभी कभी आते हैं इंक़लाब कभी बहर-ए-इंक़लाब कश्ती को पार करते हैं तूफ़ाँ कभी कभी सर दे दिया दिया न मगर ग़ैर-ए-हक़ का साथ दुनिया में आए ऐसे भी इंसाँ कभी कभी क्या कल्बा-ए-हज़ीं में नहीं रौनक़-ए-हयात होता है दिल यहाँ भी ग़ज़ल-ख़्वाँ कभी कभी घबरा के ज़िंदगी से तलाश-ए-क़रार में छानी है ख़ाक-ए-दश्त-ओ-बयाबाँ कभी कभी हर चंद है दकन से मुझे प्यार 'ताहिरा' आती है याद महफ़िल-ए-तहराँ कभी कभी — Bano Tahira Sayeed
न जाने आज क्यूँ उन के लबों पर मेरा नाम आया ये कैसा इंक़लाब आया सलाम आया पयाम आया मिरी ख़ामोशियाँ उनवाँ बनी हैं कितने क़िस्सों का ज़बाँ अब खोलना होगी अजब मुश्किल मक़ाम आया जलाईं ख़ुद ही शमएँ मैं ने और ख़ुद ही बुझा डालीं कभी जब याद मुझ को मेरा ख़्वाब-ए-ना-तमाम आया बिगाड़े काम दुनिया के चला अफ़्लाक सर करने बशर के सर में बैठे बैठे क्या सौदा-ए-ख़ाम आया जवानी कहते हैं लग़्ज़िश है लेकिन मा'रिफ़त भी है कई राहें निकलती हैं जहाँ से वो मक़ाम आया अज़ीज़-ओ-अक़रिबा जितने थे सब इशरत के साथी थे बुरा जब वक़्त आया 'ताहिरा' कोई न काम आया — Bano Tahira Sayeed
सद-रश्क-ए-अंजुमन हैं ये तन्हाइयाँ मिरी सूरज मिरा सितारे मिरे कहकशाँ मिरी माना कि क़हक़हे नहीं मेरे नसीब में सरमाया-ए-नशात है आह-ओ-फ़ुग़ाँ मिरी हर तल्ख़ तजरबे ने कहा हँस के मुझ से यूँँ आएँगी काम तेरे यही तल्ख़ियाँ मिरी रंग-ए-बहार रंग-ए-ग़ज़ल रंग-ए-ख़ून-ए-दिल डूबी हर एक रंग में है दास्ताँ मिरी झुकता नहीं ये सर किसी सरकश के सामने पाइंदा बाद-ए-रिफ़अत-ए-फ़िक्र-ए-जवाँ मिरी तूफ़ान-ओ-इंक़लाब के अफ़्साने बन गए उल्टा असर दिखा गईं ख़ामोशियाँ मिरी जब 'ताहिरा' मिलेगा न नेमुल-बदल मिरा याद आएँगी ज़माने को तब ख़ूबियाँ मिरी — Bano Tahira Sayeed
मुझे तड़पा के शरमाता तो होगा किए पर अपने पछताता तो होगा न लगता होगा दिल बाग़-ए-इरम में कभी घर मेरा याद आता तो होगा शिकस्त-ए-ज़िंदगी दे कर मुझे यूँँ वो फ़ातेह बन के इतराता होगा कभी याद आ ही जाते होंगे वो दिन तेरा दिल भी तड़प जाता तो होगा नहीं तर्क-ए-मोहब्बत इतना आसाँ तसव्वुर मेरा रुलवाता तो होगा सुकून-ए-ज़िंदगी में होगी हलचल दिल-ए-मग़्मूम घबराता तो होगा तबस्सुम छिन गया होगा लबों से वो दिल ही दिल में ग़म खाता तो होगा बहार-ए-रफ़्ता आती होगी जब याद जुनूँ में सर को टकराता तो होगा ब-ज़ाहिर ख़ुश सही लेकिन कहाँ ख़ुश बनावट कर के थक जाता तो होगा वफ़ाएँ मेरी याद आती न होंगी तिरी आँखों में अश्क आता होगा ये माना बे-मुरव्वत संग-दिल है मगर पत्थर पिघल जाता तो होगा न जानी बे-वफ़ा ने क़द्र-ए-ने'मत मुझे अब खो के पछताता तो होगा दिल-ए-महज़ूँ में टीस उठती न होगी ख़याल-ए-'ताहिरा' आता तो होगा — Bano Tahira Sayeed

Nazm

सोते सोते जो यकायक कभी खुल जाती है आँख नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र कहकशाँ से भी ज़ियादा है लताफ़त उस में आख़िर-ए-शब के मह-ए-नीम-फ़रोज़ाँ की तरह ख़्वाब-आवर सी शुआ'ओं में है लिपटी लिपटी फिर भी इस नर्म निगाही में हैं क्या तीर छुपे तंज़ है तल्ख़ी-ए-दौराँ का इक अफ़्साना है इस में हसरत भी शिकायत भी ग़म-ए-फ़ुर्क़त भी दिल लरज़ जाता है और होती है वहशत तारी मुझ को महसूस ये होता है कि मुजरिम मैं हूँ ऐसा लगता है कि तोड़ा है किसी के दिल को दिल जो मासूम था बे-लौस था पाकीज़ा था क्या करूँँ क्या न करूँँ कोई मुदावा भी नहीं कुछ समझ में नहीं आता ये मुअ'म्मा क्या है नींद से उठते ज़रा डर सा मुझे लगता है नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र आह वो मीठी नज़र तल्ख़ नज़र पाक नज़र तीर-ओ-नश्तर हैं छुपे कितनी है सफ़्फ़ाक नज़र याद कुछ भी नहीं आता मुझे उस के आगे हाँ किसी युग में किसी ने मिरी पूजा की थी मैं ने उस को तो मगर ग़ौर से देखा भी नहीं प्यार की भेंट चढ़ाने कभी आया था कोई मैं ने मुँह फेर लिया देवी थी मैं पत्थर की लेकिन इस बात को कितने ही जनम बीत गए फिर भी पीछा मिरा करने से न वो बाज़ आया यूँँ ही सदियों से है मेरे ही लिए आवारा नीम-बेदारी में आती है नज़र एक नज़र — Bano Tahira Sayeed
आकाश पे दीप सितारों के धरती पर फूल बहारों के सब्ज़े पर शबनम के मोती सावन की हवा ठंडी ठंडी ये मेरे बिखरे सपने हैं लहराते हुए बहते चश्में चश्मों के नशात-आगीं नग़्में कोहसार के रंगीं शाम-ओ-सहर जंगल के हसीं दिलकश मंज़र ये मेरे बिखरे सपने हैं बिजली की कड़क बादल की गरज ख़ूँ-बार शफ़क़ ढलता सूरज महताब में नींद जवानी की और ख़ुशबू रात की रानी की ये मेरे बिखरे सपने हैं दरिया साहिल कश्ती लंगर हीरे मोती कंकर पत्थर परियों के महल इन्दर की सभा तीखी चितवन बाँका चेहरा ये मेरे बिखरे सपने हैं नज़्में ग़ज़लें आहें नग़्में ख़ून-ए-जिगर कुछ दल के टुकड़े भूली-बिसरी बीती बातें ग़म की अनोखी सी सौग़ातें ये मेरे बिखरे सपने हैं — Bano Tahira Sayeed
कितनी मीठी ज़बाँ कैसी प्यारी ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ इस में राधा के पायल की झंकार है ज़ुल्फ़-ए-ज़ेब-उन-निसा की भी महकार है इस में झांसी की रानी की ललकार है साज़-ओ-नग़्मा के हम-राह तलवार है उस के दामन में हैं कितनी रंगीनियाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ हिन्द माता की बेटी है उर्दू ज़बाँ साँवली चुलबुली नौजवाँ गुल-फ़िशाँ हिन्दू मुस्लिम के इख़्लास की दास्ताँ इत्तिहाद-ओ-मोहब्बत का क़ौमी निशाँ क्यूँ इसे ग़ैर कहता है ना-क़दर-दाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ इस में सरमस्ती-ए-जाम-ए-शीराज़ है नज्द का सोज़ है हिन्द का साज़ है अपनी हर-दिल-अज़ीज़ी में मुम्ताज़ है अहल-ए-हिन्दोस्ताँ की ये आवाज़ है इस को कहते हैं सब दिल-कश-ओ-ख़ुश-बयाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ बोली जाती है कश्मीर से रास तक समझी जाती है गुजरात मद्रास तक ग़ैरियत की नहीं इस में बू-बास तक नफ़रतों का नहीं इस को एहसास तक ख़ास हिन्दोस्तानी है उर्दू ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ कह रही है ये भारत से उर्दू ज़बाँ मुझ से नाराज़ क्यूँ मादर-ए-मेहरबाँ तू मिरी मैं तिरी हमदम-ओ-राज़-दाँ फिर लगा ले गले से मुझे मेरी माँ 'ताहिरा' कुछ परेशाँ है उर्दू ज़बाँ मेरी उर्दू ज़बाँ फ़ख़्र-ए-हिन्दोस्ताँ — Bano Tahira Sayeed