Tehzeeb Hafi

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    मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा
    तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा

    तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं
    मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा

    चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है
    हाँ अगर मुझ से पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा

    तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से
    तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
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    Tehzeeb Hafi
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    ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे
    अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे

    मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी
    उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे

    मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है
    ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे

    बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा
    अगर किसी को चाहिए तो मुझ से राब्ता करे
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    Tehzeeb Hafi
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    "हम मिलेंगे कहीं"
    हम मिलेंगे कहीं
    अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में
    एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए
    एक ही जैसे आँसू बहाते हुए
    हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे
    हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे
    हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर
    बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए
    जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया
    हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे
    संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए
    आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे
    हम मिलेंगे कहीं नार
    मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर
    मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए
    इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे
    हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे
    हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में
    इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में
    और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में
    हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को
    हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर
    हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे
    और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है?
    हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में
    कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर
    जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
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    आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था
    एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था

    एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी
    रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था

    मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो
    मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था

    मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती
    मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था

    हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए
    एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था

    वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से
    मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था
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    थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया
    आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया

    तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री
    तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया

    लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं
    फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया

    रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है
    जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया

    बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर
    और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
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    मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता
    तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता

    लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में
    मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता

    मैं ने भी ज़िंदगी और शबहिज्र काटी है सबकी तरह
    वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता

    तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने
    क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता

    कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो
    जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता
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    Tehzeeb Hafi
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    तुम्हें हुस्न पर दस्तरस है मोहब्बत वोहब्बत बड़ा जानते हो
    तो फिर ये बताओ कि तुम उस की आँखों के बारे में क्या जानते हो

    ये जुग़राफ़िया फ़ल्सफ़ा साईकॉलोजी साइंस रियाज़ी वग़ैरा
    ये सब जानना भी अहम है मगर उस के घर का पता जानते हो
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    Tehzeeb Hafi
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    उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे
    पलट के आए तो सब से पहले तुझे मिलेंगे

    अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो
    हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे

    तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं
    तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
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