आईने आँख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था

एक याद बसर करती थी मुझे मैं साँस नहीं ले पाता था

एक शख़्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी
रोता था तो रात उजड़ जाती हँसता था तो दिन बन जाता था

मैं रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो
मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जा कर वो फोन उठाता था

मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती
मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था

हम एक ज़िंदान में ज़िंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए
एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था

वो जिस्म नज़र-अंदाज़ नहीं हो पाता था इन आँखों से
मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था

— Tehzeeb Hafi

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Gulshan Shayari

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