क्या जानिए किस बात पे मग़रूर रही हूँ
कहने को तो जिस राह चलाया है चली हूँ
कहने को तो जिस राह चलाया है चली हूँ
तुम पास नहीं हो तो अजब हाल है दिल का
यूँ जैसे मैं कुछ रख के कहीं भूल गई हूँ
फूलों के कटोरों से छलक पड़ती है शबनम
हँसने को तिरे पीछे भी सौ बार हँसी हूँ
तेरे लिए तक़दीर मिरी जुम्बिश-ए-अबरू
और मैं तिरा ईमा-ए-नज़र देख रही हूँ
सदियों से मिरे पाँव तले जन्नत-ए-इंसाँ
मैं जन्नत-ए-इंसाँ का पता पूछ रही हूँ
दिल को तो ये कहते हैं कि बस क़तरा-ए-ख़ूँ है
किस आस पे ऐ संग-ए-सर-ए-राह चली हूँ
जिस हाथ की तक़्दीस ने गुलशन को सँवारा
उस हाथ की तक़दीर पे आज़ुर्दा रही हूँ
क़िस्मत के खिलौने हैं उजाला कि अँधेरा
दिल शो'ला-तलब था सो बहर-हाल जली हूँ
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वही ख़ाना-ब-दोश उम्मीदें
वही बे-सब्र दिल की ख़ू है अभी
दिल के गुंजान रास्तों पे कहीं
तेरी आवाज़ और तू है अभी
ज़िंदगी की तरह ख़िराज-तलब
कोई दरमाँदा आरज़ू है अभी
बोलते हैं दिलों के सन्नाटे
शोर सा ये जो चार-सू है अभी
ज़र्द पत्तों को ले गई है हवा
शाख़ में शिद्दत-ए-नुमू है अभी
वर्ना इंसान मर गया होता
कोई बे-नाम जुस्तुजू है अभी
हम-सफ़र भी हैं रहगुज़र भी है
ये मुसाफ़िर ही कू-ब-कू है अभी
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होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए
आए तो सही बर-सर-ए-इलज़ाम ही आए
आए तो सही बर-सर-ए-इलज़ाम ही आए
हैरान हैं लब-बस्ता हैं दिल-गीर हैं ग़ुंचे
ख़ुश्बू की ज़बानी तिरा पैग़ाम ही आए
लम्हात-ए-मसर्रत हैं तसव्वुर से गुरेज़ाँ
याद आए हैं जब भी ग़म-ओ-आलाम ही आए
तारों से सजा लेंगे रह-ए-शहर-ए-तमन्ना
मक़्दूर नहीं सुब्ह चलो शाम ही आए
क्या राह बदलने का गिला हम-सफ़रों से
जिस रह से चले तेरे दर-ओ-बाम ही आए
थक-हार के बैठे हैं सर-ए-कू-ए-तमन्ना
काम आए तो फिर जज़्बा-ए-नाकाम ही आए
बाक़ी न रहे साख 'अदा' दश्त-ए-जुनूँ की
दिल में अगर अंदेशा-ए-अंजाम ही आए
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हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना
कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना
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हाथ काँटों से कर लिए ज़ख़्मी
फूल बालों में इक सजाने को
फूल बालों में इक सजाने को
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मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ
तुम मुझ से पूछते हो मिरा हौसला है क्या
तुम मुझ से पूछते हो मिरा हौसला है क्या
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काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या
घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या
घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या
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अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो
हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना
हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना
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