agar sach itna zalim hai to ham se jhooth hi bolo | अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो

  - Ada Jafarey

अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो
हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना

  - Ada Jafarey

Dhokha Shayari

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    अब इन हुदूद में लाया है इंतिज़ार मुझे
    वो आ भी जाएँ तो आए न ऐतबार मुझे
    Khumar Barabankvi
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    फ़रेब-ए-साक़ी-ए-महफ़िल न पूछिए 'मजरूह'
    शराब एक है बदले हुए हैं पैमाने
    Majrooh Sultanpuri
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    मैंने बोला था याद मत आना
    झूठ बोला था याद आओ मुझे
    Ali Zaryoun
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    मैं पहले झूठ पर हकलाया उससे
    फिर उस के बाद माहिर हो गया था
    Shadab Javed
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    ऐ मुझ को फ़रेब देने वाले
    मैं तुझ पे यक़ीन कर चुका हूँ
    Athar Nafees
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    खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें
    न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें
    Qateel Shifai
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    फ़रेब दे के उसे जीतना गवारा नहीं
    अगर वो दिल से हमारा नहीं हमारा नहीं
    Azhar Nawaz
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    वो नशा है के ज़बाँ अक़्ल से करती है फ़रेब
    तू मिरी बात के मफ़्हूम पे जाता है कहाँ
    Pallav Mishra
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    खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है
    अजब कमाल है उस बेवफ़ा के लहजे में
    Iftikhar Arif
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    धोखा है इक फ़रेब है मंज़िल का हर ख़याल
    सच पूछिए तो सारा सफ़र वापसी का है
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    एक आईना रू-ब-रू है अभी
    उस की ख़ुश्बू से गुफ़्तुगू है अभी
    Ada Jafarey
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    क्या जानिए किस बात पे मग़रूर रही हूँ
    कहने को तो जिस राह चलाया है चली हूँ

    तुम पास नहीं हो तो अजब हाल है दिल का
    यूँ जैसे मैं कुछ रख के कहीं भूल गई हूँ

    फूलों के कटोरों से छलक पड़ती है शबनम
    हँसने को तिरे पीछे भी सौ बार हँसी हूँ

    तेरे लिए तक़दीर मिरी जुम्बिश-ए-अबरू
    और मैं तिरा ईमा-ए-नज़र देख रही हूँ

    सदियों से मिरे पाँव तले जन्नत-ए-इंसाँ
    मैं जन्नत-ए-इंसाँ का पता पूछ रही हूँ

    दिल को तो ये कहते हैं कि बस क़तरा-ए-ख़ूँ है
    किस आस पे ऐ संग-ए-सर-ए-राह चली हूँ

    जिस हाथ की तक़्दीस ने गुलशन को सँवारा
    उस हाथ की तक़दीर पे आज़ुर्दा रही हूँ

    क़िस्मत के खिलौने हैं उजाला कि अँधेरा
    दिल शो'ला-तलब था सो बहर-हाल जली हूँ
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    Ada Jafarey
    चाक-ए-दिल भी कभी सिलते होंगे
    लोग बिछड़े हुए मिलते होंगे

    रोज़-ओ-शब के उन्ही वीरानों में
    ख़्वाब के फूल तो खिलते होंगे

    नाज़-परवर वो तबस्सुम से कहीं
    सिलसिले दर्द के मिलते होंगे

    हम भी ख़ुशबू हैं सबा से कहियो
    हम-नफ़स रोज़ न मिलते होंगे

    सुब्ह ज़िंदाँ में भी होती होगी
    फूल मक़्तल में भी खिलते होंगे

    अजनबी शहर की गलियों में 'अदा'
    दिल कहाँ लोग ही मिलते होंगे
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    Ada Jafarey
    काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या
    घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या
    Ada Jafarey
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    होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए
    आए तो सही बर-सर-ए-इलज़ाम ही आए

    हैरान हैं लब-बस्ता हैं दिल-गीर हैं ग़ुंचे
    ख़ुश्बू की ज़बानी तिरा पैग़ाम ही आए

    लम्हात-ए-मसर्रत हैं तसव्वुर से गुरेज़ाँ
    याद आए हैं जब भी ग़म-ओ-आलाम ही आए

    तारों से सजा लेंगे रह-ए-शहर-ए-तमन्ना
    मक़्दूर नहीं सुब्ह चलो शाम ही आए

    क्या राह बदलने का गिला हम-सफ़रों से
    जिस रह से चले तेरे दर-ओ-बाम ही आए

    थक-हार के बैठे हैं सर-ए-कू-ए-तमन्ना
    काम आए तो फिर जज़्बा-ए-नाकाम ही आए

    बाक़ी न रहे साख 'अदा' दश्त-ए-जुनूँ की
    दिल में अगर अंदेशा-ए-अंजाम ही आए
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    Ada Jafarey

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