Ada Jafarey

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Ada Jafarey shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ada Jafarey's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher(16)
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Sher

मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ तुम मुझ से पूछते हो मिरा हौसला है क्या — Ada Jafarey
वर्ना इंसान मर गया होता कोई बे-नाम जुस्तुजू है अभी — Ada Jafarey
एक आईना रू-ब-रू है अभी उस की ख़ुश्बू से गुफ़्तुगू है अभी — Ada Jafarey
जिस की बातों के फ़साने लिक्खे उस ने तो कुछ न कहा था शायद — Ada Jafarey
हाथ काँटों से कर लिए ज़ख़्मी फूल बालों में इक सजाने को — Ada Jafarey
मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ तुम मुझ से पूछते हो मिरा हौसला है क्या — Ada Jafarey
कोई ताइर इधर नहीं आता कैसी तक़्सीर इस मकाँ से हुई — Ada Jafarey
अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना — Ada Jafarey
बड़े ताबाँ बड़े रौशन सितारे टूट जाते हैं सहर की राह तकना ता सहर आसाँ नहीं होता — Ada Jafarey
जिस की जानिब 'अदा' नज़र न उठी हाल उस का भी मेरे हाल सा था — Ada Jafarey
जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा ये सुकूँ का दौर-ए-शदीद है कोई बे-क़रार कहाँ रहा — Ada Jafarey
हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना — Ada Jafarey
होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए आए तो सही बर-सर-ए-इल्ज़ाम ही आए — Ada Jafarey
काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या — Ada Jafarey
आ देख कि मेरे आँसुओं में ये किस का जमाल आ गया है — Ada Jafarey
ख़ामुशी से हुई फ़ुग़ाँ से हुई इब्तिदा रंज की कहाँ से हुई — Ada Jafarey

Ghazal

ये हुक्म है तिरी राहों में दूसरा न मिले शमीम-ए-जाँ तुझे पैराहन-ए-सबा न मिले बुझी हुई हैं निगाहें ग़ुबार है कि धुआँ वो रास्ता है कि अपना भी नक़्श-ए-पा न मिले जमाल-ए-शब मिरे ख़्वाबों की रौशनी तक है ख़ुदा-ना-कर्दा चराग़ों की लौ बढ़ा न मिले क़दम क़दम मिरी वीरानियों के रंग-महल दिलों को ज़ख़्म की सौग़ात-ए-ख़ुसरवाना मिले तुम इस दयार में इंसाँ को ढूँढती हो जहाँ वफ़ा मिले तो ब-एहसास-ए-मुजरिमाना मिले गए दिनों के हवाले से तुम को पहचाना हम आज ख़ुद से मिले और वालिहाना मिले किधर से संग चला था 'अदा' कहाँ पहुँचा जो एक ठेस से टूटें उन्हें बहा न मिले — Ada Jafarey
आगे हरीम-ए-ग़म से कोई रास्ता न था अच्छा हुआ कि साथ किसी को लिया न था दामान-ए-चाक चाक गुलों को बहाना था दिल का जो रंग था वो नज़र से छुपा न था रंग-ए-शफ़क़ की धूप खिली थी क़दम क़दम मक़्तल में सुब्ह-ओ-शाम का मंज़र जुदा न था क्या बोझ था कि जिस को उठाए हुए थे लोग मुड़ कर किसी की सम्त कोई देखता न था कुछ इतनी रौशनी में थे चेहरों के आइने दिल उस को ढूँढ़ता था जिसे जानता न था कुछ लोग शर्मसार ख़ुदा जाने क्यूँँ हुए अपने सिवा हमें तो किसी से गिला न था हर इक क़दम उठा था नए मौसमों के साथ वो जो सनम तराश था बुत पूजता न था जिस दर से दिल को ज़ौक़-ए-इबादत अता हुआ उस आस्तान-ए-शौक़ पे सज्दा रवा न था आँधी में बर्ग-ए-गुल की ज़बाँ से अदा हुआ वो राज़ जो किसी से अभी तक कहा न था — Ada Jafarey
काँटा सा जो चुभा था वो लौ दे गया है क्या घुलता हुआ लहू में ये ख़ुर्शीद सा है क्या पलकों के बीच सारे उजाले सिमट गए साया न साथ दे ये वही मरहला है क्या मैं आँधियों के पास तलाश-ए-सबा में हूँ तुम मुझ से पूछते हो मिरा हौसला है क्या सागर हूँ और मौज के हर दाएरे में हूँ साहिल पे कोई नक़्श-ए-क़दम खो गया है क्या सौ सौ तरह लिखा तो सही हर्फ़-ए-आरज़ू इक हर्फ़-ए-आरज़ू ही मिरी इंतिहा है क्या इक ख़्वाब-ए-दिल-पज़ीर घनी छाँव की तरह ये भी नहीं तो फिर मिरी ज़ंजीर-ए-पा है क्या क्या फिर किसी ने क़र्ज़-ए-मुरव्वत अदा किया क्यूँँ आँख बे-सवाल है दिल फिर दुखा है क्या — Ada Jafarey
क्या जानिए किस बात पे मग़रूर रही हूँ कहने को तो जिस राह चलाया है चली हूँ तुम पास नहीं हो तो अजब हाल है दिल का यूँँ जैसे मैं कुछ रख के कहीं भूल गई हूँ फूलों के कटोरों से छलक पड़ती है शबनम हँसने को तिरे पीछे भी सौ बार हँसी हूँ तेरे लिए तक़दीर मिरी जुम्बिश-ए-अबरू और मैं तिरा ईमा-ए-नज़र देख रही हूँ सदियों से मिरे पाँव तले जन्नत-ए-इंसाँ मैं जन्नत-ए-इंसाँ का पता पूछ रही हूँ दिल को तो ये कहते हैं कि बस क़तरा-ए-ख़ूँ है किस आस पे ऐ संग-ए-सर-ए-राह चली हूँ जिस हाथ की तक़्दीस ने गुलशन को सँवारा उस हाथ की तक़दीर पे आज़ुर्दा रही हूँ क़िस्मत के खिलौने हैं उजाला कि अँधेरा दिल शो'ला-तलब था सो बहर-हाल जली हूँ — Ada Jafarey
गुलों को छू के शमीम-ए-दुआ नहीं आई खुला हुआ था दरीचा सबा नहीं आई हवा-ए-दश्त अभी तो जुनूँ का मौसम था कहाँ थे हम तिरी आवाज़-ए-पा नहीं आई अभी सहीफ़ा-ए-जाँ पर रक़म भी क्या होगा अभी तो याद भी बे-साख़्ता नहीं आई हम इतनी दूर कहाँ थे कि फिर पलट न सकें सवाद-ए-शहरस कोई सदा नहीं आई सुना है दिल भी नगर था रसा बसा भी था जला तो आँच भी अहल-ए-वफ़ा नहीं आई न जाने क़ाफ़िले गुज़रे कि है क़याम अभी अभी चराग़ बुझाने हवा नहीं आई बस एक बार मनाया था जश्न-ए-महरूमी फिर इस के बा'द कोई इब्तिला नहीं आई हथेलियों के गुलाबों से ख़ून रिसता रहा मगर वो शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना नहीं आई ग़यूर दिल से न माँगी गई मुराद 'अदा' बरसने आप ही काली घटा नहीं आई — Ada Jafarey
अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना दुआ आसाँ नहीं रहना सुख़न दुश्वार हो जाना तुम्हें देखें निगाहें और तुम को ही नहीं देखें मोहब्बत के सभी रिश्तों का यूँँ नादार हो जाना अभी तो बे-नियाज़ी में तख़ातुब की सी ख़ुशबू थी हमें अच्छा लगा था दर्द का दिलदार हो जाना अगर सच इतना ज़ालिम है तो हम से झूट ही बोलो हमें आता है पतझड़ के दिनों गुल-बार हो जाना अभी कुछ अन-कहे अल्फ़ाज़ भी हैं कुंज-ए-मिज़्गाँ में अगर तुम इस तरफ़ आओ सबा-रफ़्तार हो जाना हवा तो हम-सफ़र ठहरी समझ में किस तरह आए हवाओं का हमारी राह में दीवार हो जाना अभी तो सिलसिला अपना ज़मीं से आसमाँ तक था अभी देखा था रातों का सहर-आसार हो जाना हमारे शहर के लोगों का अब अहवाल इतना है कभी अख़बार पढ़ लेना कभी अख़बार हो जाना — Ada Jafarey
आँखों में रूप सुब्ह की पहली किरन सा है अहवाल जी का ज़ुल्फ़-ए-शिकन-दर-शिकन सा है कुछ यादगार अपनी मगर छोड़ कर गईं जाती रुतों का हाल दिलों की लगन सा है आँखें बरस गईं तो निखार और आ गया यादों का रंग भी तो गुल-ओ-यासमन सा है किस मोड़ पर हैं आज हम ऐ रहगुज़ार-ए-नाज़ अब दर्द का मिज़ाज किसी हम-सुख़न सा है है अब भी रंग रंग-ए-तमन्ना का पैरहन ख़्वाबों के साथ अब भी वही हुस्न-ए-ज़न सा है किन मंज़िलों लुटे हैं मोहब्बत के क़ाफ़िले इंसाँ ज़मीं पे आज ग़रीब-उल-वतन सा है वो जिस का साथ छोड़ चुका नाज़-ए-आगही अब भी तलाश-ए-रह में वही राहज़न सा है शाख़ों का रंग-रूप ख़िज़ाँ ले गई मगर अंदाज़ आज भी वही अर्बाब-ए-फ़न सा है ख़ुशबू के थामने को बढ़ाए हैं हाथ 'अदा' दामान-ए-आरज़ू भी सबा-पैरहन सा है — Ada Jafarey
आलम ही और था जो शनासाइयों में था जो दीप था निगाह की परछाइयों में था वो बे-पनाह ख़ौफ़ जो तन्हाइयों में था दिल की तमाम अंजुमन-आराइयों में था इक लम्हा-ए-फ़ुसूँ ने जलाया था जो दिया फिर उम्र भर ख़याल की रानाइयों में था इक ख़्वाब-गूँ सी धूप थी ज़ख़्मों की आँच में इक साएबाँ सा दर्द की पुरवाइयों में था दिल को भी इक जराहत-ए-दिल ने अता किया ये हौसला कि अपने तमाशाइयों में था कटता कहाँ तवील था रातों का सिलसिला सूरज मिरी निगाह की सच्चाइयों में था अपनी गली में क्यूँँ न किसी को वो मिल सका जो एतिमाद बादिया-पैमाइयों में था इस अहद-ए-ख़ुद-सिपास का पूछो हो माजरा मसरूफ़ आप अपनी पज़ीराइयों में था उस के हुज़ूर शुक्र भी आसाँ नहीं 'अदा' वो जो क़रीब-ए-जाँ मिरी तन्हाइयों में था — Ada Jafarey
गुलों सी गुफ़्तुगू करें क़यामतों के दरमियाँ हम ऐसे लोग अब मिलें हिकायतों के दरमियाँ लहू-लुहान उँगलियाँ हैं और चुप खड़ी हूँ मैं गुल ओ समन की बे-पनाह चाहतों के दरमियाँ हथेलियों की ओट ही चराग़ ले चलूँ अभी अभी सहर का ज़िक्र है रिवायतों के दरमियाँ जो दिल में थी निगाह सी निगाह में किरन सी थी वो दास्ताँ उलझ गई वज़ाहतों के दरमियाँ सहीफ़ा-ए-हयात में जहाँ जहाँ लिखी गई लिखी गई हदीस-ए-जाँ जराहतों के दरमियाँ कोई नगर कोई गली शजर की छाँव ही सही ये ज़िंदगी न कट सके मसाफ़तों के दरमियाँ अब उस के ख़ाल-ओ-ख़द का रंग मुझ से पूछना अबस निगह झपक झपक गई इरादतों के दरमियाँ सबा का हाथ थाम कर 'अदा' न चल सकोगी तुम तमाम उम्र ख़्वाब ख़्वाब साअ'तों के दरमियाँ — Ada Jafarey
जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा ये सुकूँ का दौर-ए-शदीद है कोई बे-क़रार कहाँ रहा जो दुआ को हाथ उठाए भी तो मुराद याद न आ सकी किसी कारवाँ का जो ज़िक्र था वो पस-ए-ग़ुबार कहाँ रहा ये तुलू-ए-रोज़-ए-मलाल है सो गिला भी किस से करेंगे हम कोई दिलरुबा कोई दिल-शिकन कोई दिल-फ़िगार कहाँ रहा कोई बात ख़्वाब-ओ-ख़याल की जो करो तो वक़्त कटेगा अब हमें मौसमों के मिज़ाज पर कोई ए'तिबार कहाँ रहा हमें कू-ब-कू जो लिए फिरी किसी नक़्श-ए-पा की तलाश थी कोई आफ़्ताब था ज़ौ-फ़गन सर-ए-रहगुज़ार कहाँ रहा मगर एक धुन तो लगी रही न ये दिल दुखा न गिला हुआ कि निगह को रंग-ए-बहार पर कोई इख़्तियार कहाँ रहा सर-ए-दश्त ही रहा तिश्ना-लब जिसे ज़िंदगी की तलाश थी जिसे ज़िंदगी की तलाश थी लब-ए-जूएबार कहाँ रहा — Ada Jafarey
आख़िरी टीस आज़माने को जी तो चाहा था मुस्कुराने को याद इतनी भी सख़्त-जाँ तो नहीं इक घरौंदा रहा है ढाने को संग-रेज़ो में ढल गए आँसू लोग हँसते रहे दिखाने को ज़ख़्म-ए-नग़्मा भी लौ तो देता है इक दिया रह गया जलाने को जलने वाले तो जल बुझे आख़िर कौन देता ख़बर ज़माने को कितने मजबूर हो गए होंगे अन-कही बात मुँह पे लाने को खुल के हँसना तो सब को आता है लोग तरसे हैं इक बहाने को रेज़ा रेज़ा बिखर गया इंसाँ दिल की वीरानियाँ जताने को हसरतों की पनाह-गाहों में क्या ठिकाने हैं सर छुपाने को हाथ काँटों से कर लिए ज़ख़्मी फूल बालों में इक सजाने को आस की बात हो कि साँस 'अदा' ये खिलौने थे टूट जाने को — Ada Jafarey