Alam Khursheed

Top 10 of Alam Khursheed

    वक़्त से पहले दरख़्तों पे समर आने लगे
    रात आई भी नहीं ख़्वाब-ए-सहर आने लगे

    मैं ने पहला ही क़दम रक्खा है दरिया में अभी
    ख़ैर-मक़्दम के लिए कितने भँवर आने लगे

    क्या ख़ता हो गई सरज़द मैं इसी सोच में हूँ
    संग के बदले मिरी सम्त गुहर आने लगे

    इस लिए ज़िल्ल-ए-इलाही से ख़फ़ा हैं रातें
    उन के ऐवान में क्यूँ ख़ाक-बसर आने लगे

    आप कुछ और हैं आशिक़ इसे कहते हैं मियाँ
    जिस को हर चीज़ में महबूब नज़र आने लगे

    ख़ैर माँगे किसी दुश्मन के लिए अब 'आलम'
    ऐन मुमकिन है दु'आओं में असर आने लगे
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    मैं जिस जगह भी रहूँगा वहीं पे आएगा
    मिरा सितारा किसी दिन ज़मीं पे आएगा

    लकीर खींच के बैठी है तिश्नगी मिरी
    बस एक ज़िद है कि दरिया यहीं पे आएगा

    मुहीब साए बढ़े आते हैं हमारी तरफ़
    कब ए'तिबार हमें दूर-बीं पे आएगा

    अब इस अदास हवाएँ दिए बुझाएँगी
    कि इत्तिहाम भी ख़ाना-नशीं पे आएगा

    कमान-ए-वक़्त ने हम को हदफ़ बनाया है
    कहीं से तीर चलेगा हमीं पे आएगा

    उड़ा रहा हूँ ग़ुबारा मगर ख़बर है मुझे
    ज़रा सी देर में वापस ज़मीं पे आएगा
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    ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से
    मैं जी उठा हूँ ज़रा ताज़गी के आने से

    उदास हो गए इक पल में शादमाँ चेहरे
    मिरे लबों पे ज़रा सी हँसी के आने से

    दुखों के यार बिछड़ने लगे हैं अब मुझ से
    ये सानेहा भी हुआ है ख़ुशी के आने से

    करख़्त होने लगे हैं बुझे हुए लहजे
    मिरे मिज़ाज में शाइस्तगी के आने से

    बहुत सुकून से रहते थे हम अँधेरे में
    फ़साद पैदा हुआ रौशनी के आने से

    यक़ीन होता नहीं शहर-ए-दिल अचानक यूँ
    बदल गया है किसी अजनबी के आने से

    मैं रोते रोते अचानक ही हँस पड़ा 'आलम'
    तमाश-बीनों में संजीदगी के आने से
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    सियाह रात के बदन पे दाग़ बन के रह गए
    हम आफ़्ताब थे मगर चराग़ बन के रह गए

    किसी को इश्क़ में भी अब जुनूँ से वास्ता नहीं
    ये क्या हुआ कि सारे दिल दिमाग़ बन के रह गए

    वो शाख़ शाख़ नीले पीले लाल रंग क्या हुए
    तमाम दश्त के परिंद ज़ाग़ बन के रह गए

    जिन्हें ये ज़ो'म था ज़मीं से तिश्नगी मिटाएँगे
    अजब हुआ वही तही-अयाग़ बन के रह गए

    मिलेगा सब को अपना हक़ रहेंगे सब सुकून से
    मगर वो सारे वा'दे सब्ज़ बाग़ बन के रह गए

    उजाड़ते हैं रोज़ हम बसी-बसाई बस्तियाँ
    ख़ुशा वो लोग जो मकीन-ए-राग़ बन के रह गए
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    तह-ब-तह है राज़ कोई आब की तहवील में
    ख़ामुशी यूँ ही नहीं रहती है गहरी झील में

    मैं ने बचपन में अधूरा ख़्वाब देखा था कोई
    आज तक मसरूफ़ हूँ उस ख़्वाब की तकमील में

    हर घड़ी अहकाम जारी करता रहता है ये दिल
    हाथ बाँधे मैं खड़ा हूँ हुक्म की तामील में

    कब मिरी मर्ज़ी से कोई काम होता है तमाम
    हर घड़ी रहता हूँ मैं क्यूँ बे-सबब ताजील में

    माँगती है अब मोहब्बत अपने होने का सुबूत
    और मैं जाता नहीं इज़हार की तफ़्सील में

    मुद्दआ' तेरा समझ लेता हूँ तेरी चाल से
    तू परेशाँ है अबस अल्फ़ाज़ की तावील में

    अपनी ख़ातिर भी तो 'आलम' चीज़ रखनी थी कोई
    अब कहाँ कुछ भी बचा है तेरी इस ज़म्बील में
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    एक अजब सी दुनिया देखा करता था
    दिन में भी मैं सपना देखा करता था

    एक ख़याल-आबाद था मेरे दिल में भी
    ख़ुद को मैं शहज़ादा देखा करता था

    सब्ज़ परी का उड़न-खटोला हर लम्हे
    अपनी जानिब आता देखा करता था

    उड़ जाता था रूप बदल कर चिड़ियों के
    जंगल सहरा दरिया देखा करता था

    हीरे जैसा लगता था इक इक पत्थर
    हर मिट्टी में सोना देखा करता था

    कोई नहीं था तिश्ना रेगिस्तानों में
    हर सहरा में दरिया देखा करता था

    हर जानिब हरियाली थी ख़ुश-हाली थी
    हर चेहरे को हँसता देखा करता था

    बचपन के दिन कितने अच्छे होते हैं
    सब कुछ ही मैं अच्छा देखा करता था

    आँख खुली तो सारे मंज़र ग़ाएब हैं
    बंद आँखों से क्या क्या देखा करता था
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    हम को लुत्फ़ आता है अब फ़रेब खाने में
    आज़माएँ लोगों को ख़ूब आज़माने में

    दो-घड़ी के साथी को हम-सफ़र समझते हैं
    किस क़दर पुराने हैं हम नए ज़माने में

    तेरे पास आने में आधी उम्र गुज़री है
    आधी उम्र गुज़रेगी तुझ से ऊब जाने में

    एहतियात रखने की कोई हद भी होती है
    भेद हमीं ने खोले हैं भेद को छुपाने में

    ज़िंदगी तमाशा है और इस तमाशे में
    खेल हम बिगाड़ेंगे खेल को बनाने में
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    याद करते हो मुझे सूरज निकल जाने के बा'द
    इक सितारे ने ये पूछा रात ढल जाने के बा'द

    मैं ज़मीं पर हूँ तो फिर क्यूँ देखता हूँ आसमाँ
    ये ख़याल आया मुझे अक्सर फिसल जाने के बा'द

    दोस्तों के साथ चलने में भी ख़तरे हैं हज़ार
    भूल जाता हूँ हमेशा मैं सँभल जाने के बा'द

    अब ज़रा सा फ़ासला रख कर जलाता हूँ चराग़
    तजरबा ये हाथ आया हाथ जल जाने के बा'द

    वहशत-ए-दिल को है सहरा से बड़ी निस्बत अजीब
    कोई घर लौटा नहीं घर से निकल जाने के बा'द
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    Alam Khursheed
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    हाथ पकड़ ले अब भी तेरा हो सकता हूँ मैं
    भीड़ बहुत है इस मेले में खो सकता हूँ मैं

    पीछे छूटे साथी मुझ को याद आ जाते हैं
    वर्ना दौड़ में सब से आगे हो सकता हूँ मैं

    कब समझेंगे जिन की ख़ातिर फूल बिछाता हूँ
    राह-गुज़र में काँटे भी तो बो सकता हूँ मैं

    इक छोटा सा बच्चा मुझ में अब तक ज़िंदा है
    छोटी छोटी बात पे अब भी रो सकता हूँ मैं

    सन्नाटे में दहशत हर पल गूँजा करती है
    इस जंगल में चैन से कैसे सो सकता हूँ मैं

    सोच समझ कर चट्टानों से उलझा हूँ वर्ना
    बहती गंगा में हाथों को धो सकता हूँ मैं
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    हमेशा दिल में रहता है कभी गोया नहीं जाता
    जिसे पाया नहीं जाता उसे खोया नहीं जाता

    कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जिन को सभी शादाब लगते हैं
    कुछ ऐसे दाग़ हैं जिन को कभी धोया नहीं जाता

    अजब सी गूँज उठती दर-ओ-दीवार से हर-दम
    ये ख़्वाबों का ख़राबा है यहाँ सोया नहीं जाता

    बहुत हँसने की आदत का यही अंजाम होता है
    कि हम रोना भी चाहें तो कभी रोया नहीं जाता
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