ये दिल मलूल भी कम है उदास भी कम है
    कई दिनों से कोई आस पास भी कम है

    हमें भी यूँ ही गुजरना पसंद है और फिर
    तुम्हारा शहर मुसाफ़िर-शनास भी कम है
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    Farhat Abbas Shah
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    कहीं से दुख तो कहीं से घुटन उठा लाए
    कहाँ-कहाँ से न दीवानापन उठा लाए

    अजीब ख़्वाब था देखा के दर-ब-दर हो कर
    हम अपने मुल्क से अपना वतन उठा लाए
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    Farhat Abbas Shah
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    बदल गए मेरे मौसम तो यार अब आए
    ग़मों ने चाट लिया ग़म-गुसार अब आए
    Farhat Abbas Shah
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    कहा मैं कहाँ हो तुम
    जवाब आया जहाँ हो तुम

    मिरे जीवन से ज़ाहिर हो
    मिरे ग़म में निहाँ हो तुम

    मिरी तो सारी दुनिया हो
    मिरा सारा जहाँ हो तुम

    मिरी सोचों के मेहवर हो
    मिरा ज़ोर-ए-बयाँ हो तुम

    मैं तो लफ़्ज़-ए-मोहब्बत हूँ
    मगर मेरी ज़बाँ हो तुम
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    Farhat Abbas Shah
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    आग हो तो जलने में देर कितनी लगती है
    बर्फ के पिघलने में देर कितनी लगती है

    चाहे कोई रुक जाए चाहे कोई रह जाए
    काफिलो को चलने में देर कितनी लगती है

    चाहे कोई जैसा भी हम सफ़र हो सदियों से
    रास्ता बदलने में देर कितनी लगती है

    ये तो वक़्त के बस में है के कितनी मोहलत दे
    वरना वक़्त ढलने में देर कितनी लगती है
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    Farhat Abbas Shah
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    इसी से होता है ज़ाहिर जो हाल दर्द का है
    सभी को कोई न कोई वबाल दर्द का है

    सहर सिसकते हुए आसमान से उतरी
    तो दिल ने जान लिया ये भी साल दर्द का है

    ये झाँक लेती है दिल से जो दूसरे दिल में
    मेरी निगाह में सारा कमाल दर्द का है

    अब इस के बा'द कोई राब्ता नहीं रखना
    ये बात तय हुई लेकिन सवाल दर्द का है

    ये दिल ये उजड़ी हुई चश्म-ए-नम ये तन्हाई
    हमारे पास तो जो भी है माल दर्द का है

    न तुम में सुख की कोई बात है न मुझ में है
    तुम्हारा और मेरा मिलना विसाल दर्द का है

    किसी ने पूछा के 'फ़रहत' बहुत हसीन हो तुम
    तो मुस्कुरा के कहा सब जमाल दर्द का है
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    Farhat Abbas Shah
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    इसी से जान गया मैं कि बख़्त ढलने लगे
    मैं थक के छाँव में बैठा तो पेड़ चलने लगे

    मैं दे रहा था सहारे तो इक हुजूम में था
    जो गिर पड़ा तो सभी रास्ता बदलने लगे
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    Farhat Abbas Shah
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    तू ने देखा है कभी एक नज़र शाम के बा'द
    कितने चुप-चाप से लगते हैं शजर शाम के बा'द

    इतने चुप-चाप कि रस्ते भी रहेंगे ला-इल्म
    छोड़ जाएँगे किसी रोज़ नगर शाम के बा'द

    मैं ने ऐसे ही गुनह तेरी जुदाई में किए
    जैसे तूफ़ाँ में कोई छोड़ दे घर शाम के बा'द

    शाम से पहले वो मस्त अपनी उड़ानों में रहा
    जिस के हाथों में थे टूटे हुए पर शाम के बा'द

    रात बीती तो गिने आबले और फिर सोचा
    कौन था बाइस-ए-आग़ाज़-ए-सफ़र शाम के बा'द

    तू है सूरज तुझे मा'लूम कहाँ रात का दुख
    तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बा'द

    लौट आए न किसी रोज़ वो आवारा-मिज़ाज
    खोल रखते हैं इसी आस पे दर शाम के बा'द
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    Farhat Abbas Shah
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